आज अपने आप में क्या हो गया है आदमी ,
जागने का वक़्त है तो सो गया है आदमी ।
भूख की दहलीज़ पर जगता रहा जो रात- दिन ,
चंद रोटी खोजने में खो गया है आदमी ।
यह हमारा मुल्क है या स्वार्थ का बाज़ार है ,
सेठियों के हाथ गिरवी हो गया है आदमी ।
पेट की थी आग या कि बोझ बस्तों का उसे ,
छोड़ करके पाठशाला जो गया है आदमी ।
कुर्सियों की होड़ में बस दौड़ने के बास्ते ,
नफ़रतों का बीज आकर बो गया है आदमी ।

() रवीन्द्र प्रभात



7 comments:

  1. अच्छी पंक्तियाँ है, पढ़कर अच्छा लगा,

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  2. बहुत ही सुंदर सामयिक कविता इन शब्दों में सब कुछ एक साथ आ गया…।

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  3. रवीन्द्र जी,

    अच्छा लगा पढ़कर ...दिल से सच्चाई कह रही है आपकी कविता ...बधाई

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  4. गागर में सागर वाली बात है. बहुत बढ़िया.

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  5. बहुत सुंदर . अच्छी भावनाओं के साथ, अच्छी रचना....बधाई !

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  6. कितनी बार लिखना पडेगा बहुत बढिया. हर बार आप बढिया ही लिख रहे है. इसलिए इस बार कह रहा हूं -----------भौत ब.....ढि.....या

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  7. आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

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