ग़ज़ल
शीशमहल हैं शीशे के औ ' पत्थर के हैं द्वार ,
कैसे - कैसे लोग बसे हैं महानगर में यार ?
राधा द्वारे राह निहारे, फिर भी मोहन प्यारे-
चकला - चकला घूम रहे , खोज रहे हैं प्यार ।
हाट -हाट नीलाम चढ़ी प्रेमचंद की धनिया-
और उधर ' होरी ' करता है लमही में चित्कार ।
दूध युरिया, घी में चर्वी, सुर्खी वाली मिर्ची -
गली - मुहल्ले बेची जाती ढोल पीट ,सरकार ।
दूर - दूर तक कोई किनारा नही दिखाई देता-
बीच भंवर में खींचतान करते मांझी - पतवार ।
अस्त -व्यस्त है पूजा- पोखर , घायल ताल- तलैइया,
शायद कोई महानगर से आया गाँव - जबार ।
अस्त हुआ '' प्रभात'' उदय होने से पहले - पहले ,
ख़ौफ़जदा हैं लोग , हिचकते जाने से बाज़ार ।
() रवीन्द्र प्रभात

5 comments:

  1. vah ravindraji , kya gazhal kahi hai. dil ko choo gai. aapne bahut sahi chitrit kiyaa hai. man prasann ho gaya

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  2. आपकी कविताएँ बिल्कुल "देखन में छोटो लगे, घाव करे गम्भीर" जैसी हैं। वस्तुतः भावों के उमड़ाव के साथ उपयुक्त शब्द चयन, छन्द संयोजन में काफी परिश्रम करना पड़ता होगा आपको। आपकी रचनाएँ उत्तम साहित्य में संग्रहणीय हैं।

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  3. उपयुक्त शब्द चयन के साथ,अच्छा लिखा है !

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  4. वाह वाह! क्या खूब कहा
    शीशमहल है शीशे के और पत्थर के है द्वार

    बधाई
    अतुल

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