आजकल हर तरफ धूम है नवरात्रि की । अन्य हिंदू परिवारों की तरह मेरे भी परिवार में नवरात्रि में उपवास रखकर व्रत करने की परम्परा है। उपवास की इस परम्परा में ऊत्साहवश बच्चे भी शामिल हो जाते हैं, मगर मेरी सबसे छोटी बिटिया उर्वशी कभी भी शामिल नही होती । है तो मात्र दस वर्ष की मगर शरारत बडों जैसी । उसकी हमेशा से ये आदत रही है कि वह किसी न किसी वहाने अपने से बडों के या फिर अपनी सखी- सहेलियों के उपवास तुड़वा देती । शरारती, जिद्दी, नास्तिक कुछ भी कह लें उसे कोई फर्क नही पङता। कल देवी के नौ रूपों की अराधना का पहला दिन था, कलश स्थापना कराई जा रही थी । मैं किसी न किसी वहाने उसे अपने पास बुलाने का यत्न करता और वह भागने की कोशिश करती । कहती नौ दिनों तक आप लोग मेरा साथ देंगे नही और मुझे अपने लिए खुद खाना बनाना होगा , इसलिये किचेन में पूरी व्यवस्था रहनी चाहिए ....... । वैसे मैं भी सांस्कृतिक - मर्यादा की आड़ में अपने बच्चों को जबरदस्ती शामिल करने का पक्षधर नही रहा हूँ, किन्तु यह कोशिश अवश्य रहती है कि मेरे बच्चों में संस्कार जीवित रहे।
चुलबुली, शरारती और उत्पाती प्रवृति के बावजूद उसके भीतर एक सबसे अच्छा गुण है तो वह है हर छोटी से छोटी बातों को ग्रहण करने की क्षमता। इसलिये जब भी अवसर प्राप्त होता मैं उसे मन की पवीत्रता का एहसास कराता , ताकी ज़िंदा रह सके उसकी सात्विक भावनाएं। कल अचानक उसने मुझसे प्रश्न किया कि, पापा! यह बताईये कि नवरात्रि में उपवास रखकर व्रत क्यों किया जाता है?
मैं जानता था कि उसे समझाने के लिए तर्क संगत बातें करनी होगी, नही तो फिर साक्षात महामाया से सामना करना पड़ सकता है । मैंने कहा कि बेटा! असुरता और देवत्व के सम्मिश्रण से मनुष्य बना है , इसलिये मनुष्य में दोनों हीं प्रवृतियां विद्यमान रहती है। दोनों के बीच संघर्ष चलता रहता है। कभी असुरता उभरती है तो कभी देवत्व ऊपर उठाना चाहता है । दोनों में वर्चस्व स्थापित करने के लिए प्रतिद्वंदिता ठनी रहती है , इसी का नाम है देवासुर संग्राम। इस संग्राम में जो हारता है उसका जीवन निरर्थक चला जाता है और जो जीतता है उसे जीवन की सार्थकता का एहसास होता है। गर्व और गौरव का अनुभव होता है।
'' तो इसका मतलब हुआ पापा! कि दसहरा भी देवासुर संग्राम का ही एक रुप है? '' उसने पलटकर प्रश्न किया। मैंने बात बनते देख मुस्करा कर कहा- हाँ! फिर वह कुछ देर तक मौन रही और मेरे बगल में बैठते हुये धीरे से कहा '' पापा! सचमुच हमारे मन में संग्राम होता रहता है ?'' '' हाँ बेटा! असुर यानी बुराई और देवत्व यानी अच्छाई के बीच .... । '' मैंने धीरे से कहा। '' तो इसका मतलब है पापा, कि पूजा करने से देवत्व जीत जाता है ?'' उसने बड़ी मासूमियत से पूछा । मैंने कहा- हाँ!उसकी खुशी का ठीकाना नही था , वह खुश थी कि सारी बातें उसके जेहन में आ चुकी थी और मैं संतोष का अनुभव कररहा था तो इसलिये कि मेरी सारी बातें उसके समझ में आ गयी और देर से ही सही उसे बोध हो गया कि व्रत मन की पवित्रता को बनाए रखने के लिए ही रखा जाता है ।

4 comments:

  1. मानव में दोनों - असुर और सुर - के प्लस प्वाइण्ट हैं। तभी दोनो मानव योनि को तरसते हैं! :-)

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  2. बिटिया उर्वशी को बहुत स्नेह. बिल्कुल हमारी तरह ही है-हम से भाई व्रत नहीं रखा जाता हालाँकि संस्कार ठीक ठाक ही हैं. :)

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  3. आलेख का संदर्भ बहुत बढ़िया रहा.बधाई.

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  4. नवरात्रि मे बिटिया की चर्चा बहुत अच्छी लगी. मेरे घर भी पिछले दिनो एक बिटिया आयी. ये ही तो दुर्गा लक्षमी और सरस्वती है. ये हमे जीना सीखाती है. रहना सीखाती है. बेटियो पर आपकी कोई गजल आ इंतजार रहेगा.वैसे समाज मे थोडी उहा पोह है तभी तो मुझे संजय ग्रोवर का ये शेरे बरबस याद आता है

    लडके वाले नाच रहे थे लडकी वाले गुमसुम थे याद करो इस वारदात मे शामिल दोनो हम तुम थे.

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