ज़िंदगी के श्वेत पन्नों को न काला कीजिये
आस्तिनों में संभलकर सांप पाला कीजिये।

चंद शोहरत के लिए ईमान अपना बेचकर -
हादसों के साथ खुदको मत उछाला कीजिये।

रोशनी परछाईयों में क़ैद हो जाये अगर -
आत्मा के द्वार से कुछ तो उजाला कीजिये।

खोट दिल में हर किसी के पास है थोडी-बहुत
दूसरों के सर नही इलज़ाम डाला कीजिये ।

ताकती मासूम आँखें सर्द चूल्हों की तरफ ,
सो न जाये तब तलक पानी उबाला कीजिये।

जब तलक '' प्रभात'' तेरे घर की है मजबूरियाँ ,
शायरी की बात तब तक आप टाला कीजिये ।

() रवीन्द्र प्रभात
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6 comments:

  1. चंद शोहरत के लिए ईमान अपना बेचकर -
    हादसों के साथ खुदको मत उछाला कीजिये।


    --वाह रविन्द्र भाई, बहुत खूब. बधाई.

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  2. ताकती मासूम आँखें सर्द चूल्हों की तरफ ,
    सो न जाये तब तलक पानी उबाला कीजिये।

    कटु सत्य……मार्मिक

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  3. एक बहुत अच्छी बन पड़ी रचना।

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  4. ''रोशनी परछाईयों में क़ैद हो जाये अगर -
    आत्मा के द्वार से कुछ तो उजाला कीजिये। ''

    अच्छी लगी, ऐसे ही लिखते रहें .

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  5. सच है गरीब बच्चों को रोटी के किस्से सुना कर ही सुला देता है. आपने मार्मिक शेर कहा है.
    ताकती मासूम आँखें सर्द चूल्हों की तरफ ,
    सो न जाये तब तलक पानी उबाला कीजिये।

    उत्तर देंहटाएं

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