पिछले इतवार की शाम , मेरी जुवां सेयकायक निकला - हे राम ! दुनिया के ग़मों से गुरेज होकर , मेरा मन पूर्णत: निश्तेज़ होकर, मेरे अस्तित्व को शून्यवत कर गया और मैं उसी क्षण मर गया .
मेरे मरने का समाचार सबसे पहले मेरे एक कवि मित्र को मिला . उसका चेहरा पहले तो मायुश हो चला फिर चहका , फिर मुरझाया , फिर वह मन - ही - मन मुस्कुराया और दौड़ कर मेरी लाश के पास आया . मेरे बदन से लिपटकर रोया - गाया , जितना भी बन पडा मेरी पत्नी को समझाया , मगर अन्दर - ही - अन्दर बड़बड़ाया- " अच्छा हुआ साला मर गया , धरती का बोझ कुछ हल्का कर गया . अच्छी - अच्छी कवितायें कर रहा था , ब्लोग पर अच्छे - अच्छे पोस्ट डालकर मेरी खटिया खडी कर रहा था , अब तो मेरे रास्ते का काँटा नि: संदेह साफ हो जाएगा , भगवान् ने चाहा तो अगले ही हफ्ते कोई बड़ा सा पुरस्कार मिल जाएगा !"
फिर किसी ने जाकर मेरे एक हमदर्द को बताया , मेरे मरने का सुखद समाचार सुनाया . उसके चहरे पर एक हल्की सी लालिमा दौड़ गयी , जिस्म में एक सिहरन सी फ़ैल गयी . वह किसी भी प्रकार अपनी आंखों को रुलाया और मेरी अन्तिम यात्रा में शामिल होने आया , यह सोचते हुए कि - " क्योंकर उसके ह्रदय की बत्ती बूझी है , साले को इसी समय मरने की सूझी है ? वैसे तो उसकी मौत मुझे बहुत रूला रही है , मगर टी वी पर अभी फिल्म चल रही ,है , थोडी देर और रूक जाता तो क्या होता ? जहाँ तक मेरा अनुमान है कि वहाँ अभी चिल-पों मच रही होगी, औपचारिकताएं पूरी की जा रही होगी . पहले फिर देख लेताहूँ फिर जाऊंगा , भाई ! रिवाज़ है तो उसके जनाजे को कंधा भी लगाऊंगा !"
मेरी लाश के पास इकट्ठी भीड़ देखकर , मेरे टीचर ने पूछा लोगों से ठिठक कर - " अरे , यह तो मेरा चेला है , मगर क्यों लगा हुआ यहाँ पर मेला है ?" जब उन्हें आभास हो गया कि मर गया , स्वयं को दुनिया से जुदा कर गया . तो वह भी मेरे पास आये , मेरे शव से लिपट कर बद्बदाये - " बेटा ! मरने को तो मर गया , मगर पूरी की पूरी फ़ीस हजम कर गया ."
फिर उसके बाद ठहाका वाला बसंत आर्य मुम्बई से आया , सहानभूति जताया , रोतीहुई मेरी पत्नी के बालों को सहलाया , आंसू पोछे और बताया - " जाने वाला तो चला गया वह लौटकर कैसे आयेगा , किसके लिए रोतीहो भाभी जी क्या वह मरने के बाद तेरी किस्मत बना पाएगा ? जो हुआ उसे भूल जाओ और मन की शांति के लिए चलो मुम्बई से घूम आओ ."
सभी आंसू तो खूब बहाते थे मगर अन्दर ही अन्दर बड़बड़ातेथे . आंसू भी ऐसे कि घडियाली और हाँथ भी सबके खाली . झुंझलातेहुए किसी ने कहा -" यार! कफ़न का बंदोबस्त करवाओ और दुर्गन्ध आने से पहले शमशान पहून्चाओ ."
जब कफ़न का बंदोबस्त नही हो पाया तो मेरा एक मित्र बड़बड़ाया-" साला दिन भर शायरी करता था , रात को उलूल - जुलूल लिख कर डायरी भरता था . जो भी कमाता पुसतकें खरीद लेता बाकी जो बचता कर देता संस्था को दान, कभी भी नही आया इसे अपने भविष्य की सुरक्षा का ध्यान ? "



फिर कहीं से खोजकर कवि सम्मेलन का एक पुराना सा बैनर लाया गया और मेरे शव परओढ़ाया गया .फिर कोई मुखातिव हुआ मेरी पत्नी से और चिल्लाया - " तेरा पति था क्या तू भी कुछ बतायेगी , सोचो चिता की लकडी कहाँ से आयेगी ? " एकाएक मेरी पत्नी को याद आयी , उसने मेरी अन्तिम इच्छा बताई - " मेरे पति ने अपने लिए चिता का बंदोबस्त कर रखा है , उनके द्वारा संग्रहित पुस्तकों की चिता सजाईये, पुन: चिता में आग लगाईये . मुझे यकीन है हम सभी की भ्रांति मिटेगी और भगवान् ने चाहा तो उसकी आत्मा को अवश्य शांति मिलेगी ."
फिर सब ने दिखाया अपना जोश और होने लगा राम नाम सत्य है का उद्घोष . कुछ दूर जाने के बाद एक व्यक्ति बड़बड़ाया- " मुझे क्या पता था कि साला मरने के बाद भारी हो जाएगा ." तो दूसरे ने कहा- " यार! लगता है शमशान जाते - जाते कचूमर निकल जाएगा . " तीसरे ने कहा - " यार ! इसे जल्दी शमशानपहुँचाओ , नही तो फिर किसी गटर में फेंक जाओ ." चौथे ने कहा - " यह दाह - संस्कार का कैसा दस्तूर है, भारी लगाने के बावजूद भी लोग कंधा लगाने को मजबूर है . "
खैर, किसी भी प्रकार मुझे शमशान पहुंचाया गया , पुस्तकों की चिता पर सुलाया गया और जब आग लगाने की बारी आयी तो यह समाचार सुनकर मेरी माँ दौड़ी - दौड़ी आयी . आते ही मेरे जिस्म से लिपट कर जोर - जोर से चिल्लाई - " खबरदार जो मेरे बच्चे को हाँथ लगाए, भगवान् करे इसे मेरी भी उम्र लग जाये ." रोती - विलखती - कराती हुई बोली , अपने थरथराते होठों को खोली - " मैं यमराज के पास जाऊंगी , अपने बच्चे को अवश्य वापस लाऊँगी ." कहते -कहते हुआ उसका हार्ट - अटैक . दोस्तों यही था मेरी मृत्यु के वरन का प्ले - बैक .
जब -जब मैं दुनिया की स्वार्थ परता को देख कर डर जाता हूँ उसी क्षण मैं मर जाता हूँ .माँ के आशीर्वाद से पुन: जन्म लेता हूँ दुनिया की स्वार्थ परता को देखने के लिए , समझने के लिए और परखने के लिए ।

6 comments:

  1. बहुत अच्छा। अपने पर किया व्यंग सदैव उच्च कोटि का होता है।
    आप उस लोक से लौटे हैं, वहां के संस्मरण सुनाइये। यहां का खटराग चलता रहेगा! :)

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  2. वाह साहब वाह. कितना उच्चकोटि का मारक व्यंग्य लिखा है आपने. पढ़ते -पढ़ते जितनी हँसी आ रही थी उतनी ही मन मे एक उदासी भी छा रही थी. वाकई आपने बहुत जोरदार लिखा है.

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  3. सालिड व्यंग्य,एकदम मारक,उच्च कोटि का!

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  4. सच कहा जाए तो आपका लिखा हुआ पढ़ना आनंद और तर्क दोनों को मजबूत करता है…
    गहरा व्यंग किया है…।

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  5. गहरा व्यंग्य दिल को गहरे तक छू गया अंतिम पद....
    " मैं यमराज के पास जाऊंगी , अपने बच्चे को अवश्य वापस लाऊँगी ."

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  6. बहुत गहरे उतर लिये..अति मारक..ये बात हुई न कुछ.जारी रहें, शुभकामनायें.

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