बडे ढोल म पोल बड़ी , यही मुकद्दस बात !

जिसका दिल जितना बड़ा , वही "चकल्लस " गात !!



नीरव की यह "वाटिका " देती है सन्देश !
अनवरत साहित्य बढे , प्रगति करे यह देश !!


"घुघूती बासूती" को, " कथाकार" की राय !
उत्तरोत्तर सोपान पे , नया साल ले जा य !!


" आलोक पुराणिक " बोले, " नीरज " जी को छोड़ !
चिट्ठा- चिट्ठा घूम के , लगा रहे हो होड़ !!



कुछ विनोद भी सुस्त है , निकल गया "अरमान"
"
मंगलम " कहते रहे, सबको दो सम्मान !!


" अनूप शुक्ल " श्रधेय हैं, करते नहीं" भदेस" !

सबको देते स्नेह से , शांति- सुख- सन्देश !!


अपना चिंतन बांचिये , देकर सबको प्यार !
सदीच्छा से भरा रहे, यह सुन्दर संसार !!


कुछ चिट्ठे नाराज हैं, अंकित नही है नाम !
खास-खास को छोड़ के , जोड़े हो क्यूं आम ? ?


भाई मेरे यह सोचो, कुछ तो हुआ कमाल !
पढा है जिसको मैंने , पूछा उसका हाल !!


बस इतनी सी बात है , ना समझे तो ठीक!
समझदार तो सबहीं हैं,समझ गए तो ठीक

() रवीन्द्र प्रभात
(इन्हीं काव्य टिप्पणियों के साथ शुभ विदा स्मृति वर्ष-2007 )

3 comments:

  1. बंधु - नव वर्ष आपको/ स्वजनों / प्रियजनों [यानी हम सबको :-)] सभी को शुभ हो - ये हम सब की तरफ़ से

    परिकल्पन घनघोर है, तंत्र तरंगित तात
    किरणें जोडीं आपने, पत्र प्रफुल्ल प्रभात

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  2. "कुछ चिट्ठे नाराज हैं, अंकित नही है नाम !
    खास-खास को छोड़ के , जोड़े हो क्यूं आम ? ?"

    अपना नाम देखना हरेक को अच्छा लगता है. एकाछ महीने के बाद किसी लेख में उनका समावेश जरूर करें जो अनजाने छूट गये हों. प्रशंसा करने में आपको को कोई नुक्सान नहीं होगा, लेकिन शायद कुछ नये चिट्ठाकारों को बहुत प्रोत्साहन मिल जाये.

    उत्तर देंहटाएं

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