एक
गजल
तसलीमा
के
बहाने
प्रसंगवश -



कहीं
आँगन , कहीं छप्पर नहीं दिखता ।
कोई सदभाव सा मंज़र नहीं दिखता ।।
यहाँ हैवानियत का है घना कोहरा -
कि जिसमें आदमी अक्सर नहीं दिखता ।।
करें किससे सनद हम बेगुनाही की -
सभी शैतान हैं , परवर नहीं दिखता ।।
बड़ी मुश्किल यहाँ घर ढूँढना महबूब का -
कि मुझको भीड़ में रहबर नहीं दिखता ।।
करे जारी सभी फतबा उसी पर क्यों -
कि जिसके हाँथ में खंज़र नहीं दिखता ?
हमारी बात सुन न हंस सके न रो सके -
वही नेता बना , अजगर नहीं दिखता ?
आंधियां आती सहम करके " प्रभात "
कि हर सूं रेत का अब घर नहीं दिखता ।।
() रवीन्द्र प्रभात

5 comments:

  1. अरे वाह। बहुत अच्छा लिखा। तसलीमा के लेखन से बहुत बेहतर।

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  2. सुंदर! अति सुंदर!
    बहुत ही अच्छी गजल लिखी आपने. सच्चाई से भरपूर. जारी रहें.

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  3. अरे वाह भाई कमाल की ग़ज़ल लिखी है आपने. बधाई. ऐसे ही लिखते रहें.
    नीरज

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  4. करे जारी सभी फतबा उसी पर क्यों
    जिसके हाँथ में खंज़र नहीं दिखता
    --------------------
    वैसे तो पूरी गजल ही गजब की है पर यह पंक्तिया एक सन्देश लिए हुए हैं
    दीपक भारतदीप

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  5. सुन्दर रचना, विचारणीय प्रश्न! बहुत खूब!

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