आये दिन कहीं -न - कहीं ऐसा सुनने को मिल ही जाता है , कि फलां जगह आतंकवादियों ने ब्लास्ट करके जान माल की हानि करदी । भाई मेरे , यदि मज़हब को ढाल बनाकर ये कुकृत्य किये जा रहे हैं तो गलत है , क्योंकि आतंकवाद का कोई मज़हब नही होता । पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में एक साथ तीन ब्लास्ट किये गए थे , उस समय मैं वाराणसी में ही था . वाराणसी की जानकारी तो तत्क्षण हो गयी , बाद में फैजाबाद और लखनऊ के बारे में ज्ञात हुआ तो रौंगटे खडे हो गए । उन घटनाओं को बाद में मैंने दृश्य मीडिया में भी बार -बार देखा , फलत: मेरा कवि मन चित्कार कर उठा , उस घटना को शब्दों में बांधने की पूरी कोशिश की जिसका परिणाम है यह पोस्ट-. . .

।। मज़हवी उन्माद और हम ।।

अकस्मात नि:स्तब्धता को चीरती हुई
मानव अस्तित्व को धूमिल करती हुई
एक आबाज़ गूंजी / एक ठहाका हुआ
दूर कहीं दूर ..../फिर आसपास के वातावरण में धुआं ही धुआं
पुन: एक धमाका हुआ और डूब गया सारा शहर दहशत में
धुन्धुआती एक अस्पष्ट चेतना में
सबकी निगाहें हुई बरबस खामोश।

लहू से लथपथ शरीर को मैंने अपनी आगोश में लेकर
बीभत्स दृश्यों को देख हुआ बेहोश
पुन: जब होश में आया तो मैं अपने आपको पाया
जलते हुए वाराणसी की सडकों पर / लाशों के ढेर के ऊपर - असहाय ...अधनंगा
जैसे हिमालय के ऊपर अवस्थित हो हिमनद / फिर शरीर की गंगोत्री से -

फूटकर
बहने लगी एक गंगा /जी हाँ खून की गंगा , जिसमें नहा रहे थे /
परस्पर दूबकियां लगा रहे थे सभी जाति-धर्म-मज़हब के लोग,
क्या वह था महज एक संयोग?

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आज भूल गए हैं हम / गुरुनानक के अमर उपदेश को -" अब्बल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बन्दे ,एक नूर तो सब जग उपज्या कौन भले कौन भंदे!"

भूल गए हैं हम अलामा इकबाल के उस संदेश को -" मज़हब नही सिखाता आपस में बैर रखना , हिन्दी हैं हम वतन हैं हिन्दुस्तान हमारा !"

भूल गए हैं हम गांधी की अमर वाणी को -" प्रभु भक्त कहलाने का अधिकारी वही है , जो दूसरों के कष्ट को समझे !"

भूल गए हैं हम योगीराज कृष्ण के उपदेश को -" कर्मनये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन "

भूल गए हैं हम तुलसीदास के धर्म की परिभाषा को -" परहित सरिस धर्म नही भाई !"

इसप्रकार-मन्दिर,मस्जिद,गिरजा,गुरुद्वारा तो शक्ति का साधन स्थल है / परस्पर प्रेम, सौहार्य,एकता और धार्मिक-सांस्कृतिक सहिष्णुता का पूज्य स्थल है / सर्व-धर्म-समभाव ही हमारी सभ्यता और संस्कृति का मूल प्राण है ...!

अनेकता में एकता ही हमारी आन-बान-शान है!निष्काम कर्म ही मनुष्य का धर्म है / मानवता का मूल मन्त्र है ....!

याद करो राष्ट्रीय कवि मैथिली शरण गुप्त की वह कविता -"यह पशु-प्रवृति है कि आप ही आप चरे, मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे !"

याद करो रहीम के सत्य के प्रतिपादन को / सच्ची मानवता के दर्शन को -" यो रहीम सुख होत है उपकारी के संग, बाटन वारे के लगे ज्यों मेहदी के रंग "

सलीब पर चढ़ते हुए / अपने हत्यारों के लिए दुआ माँगते हुए ईसाईयों के प्रबर्तक /धर्म के पथ-प्रदर्शक ईसा ने क्या कहा था-" प्रभु इन्हें सुबुद्धि दे , सुख-शांति दे / ये नहीं जानते कि क्या कराने जारहे हैं !"

याद करो - कर्बला के मैदान में / प्राणों की बलि देने वाले / अन्तिम साँस तक मानव कल्याण हेतु दुआ मांगने वाले/ धर्म का मर्म बताने वाले मोहम्मद साहब ने क्या कहा था?

ज़रा सोंचिये - आर्य समाज के प्रबर्तक महर्षि दयानंद ने / अभय दान क्यों दे दिया अपने हत्यारों को / महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म के प्रचार में / अन्य धर्मों के विरूद्ध द्वेष का प्रदर्शन क्यों नही किया ? स्वामी विवेकानंद, रामतीर्थ ,रामकृष्ण परमहंश ने किसी धर्म के लिए अपशब्द क्यों नही कहे ? सूफी संत अमीर खुसरो, हज़रत निजामुद्दीन , संत कवीर और नामदेव ने क्यों सर्वस्व नेओछावर कर दिया मज़हवी एकता के लिए अर्थात " सर्व धर्म समन्वय " के लिए !

फ़िर धर्म के नाम पर हिंसा का तांडव क्यों ? भाई-भाई के बीच मज़हवी दीवार क्यों? आज विलुप्त हो रहे हमारे मानवीय आचार-व्यवहार क्यों?

आपने कभी सोचा है - इस आतंक के पीछे कौन होता है ?

जब वोट की चोट से राजनीतिक महकमे में हमे बांटने की तैयारी की जाती है , तब फिरकापरस्ती के तबे पर रोटी सेंकने का सिलसिला शुरू हो जाता है और किसी न किसी रूप में बलि का बकरा बनते हैं हम और आखिरकार उन्मादों को हवा देकर हमारा ही घोंट दिया जाता है गला , क्योंकि धर्म जब राजनीति को बिस्तर पर लेटाकर रात को रंगीन बनाने की कोशिश करेगा तो आखिरकार वही होगा जो आज़कल देखने को कहीं न कहीं , किसी न किसी शहर में मिल ही जाता है....!

5 comments:

  1. बहुत बढिया एवं प्रभावपूर्ण
    दीपक भारतदीप

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  2. आपका विश्लेशण प्रभावशाली है और उससे किसी भी कारण से असहमति नहीं हो सकती।

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  3. कविता, दृश्यों का वर्णन और गुरुओं की वाणी अद्भुत समिश्रण किया आपने.
    मार्मिक और सोचने को विवश करती हुई कविता.
    जैसे लगता है कि समाज के सामने आपने आइना रख दिया हो.
    आप बधाई के पात्र है.

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  4. बहुत अच्छा लिखा है । साथ में एक मार्मिक कविता भी ।
    घुघूती बासूती

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  5. मयंक मिश्रा12 दिसंबर 2007 को 8:35 pm

    भाई मैं तो अभी तक आपको एक अच्छा कवि ही मानता था , आज विवश हो गया एक अच्छे विचारक के रूप में आपको जानने के लिए !

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