बिक गया स्वाभिमान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !
देश और सम्मान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !!


ऐसी लड़ी है आंख पश्चिम से कि देखो खो गयी-
मनमोहनी मुस्कान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !!


एक-दूजे पे उछाले खूब कीचड, बेच दी नेताओं ने -
गुजरात का अभियान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !!


मिलाई लीद घोडें की धनिया में वो चर्बी तेल में -
बिक गया इंसान सस्ते में , मोगैम्बो खुश हुआ !!


भरोसे राम के ही चल रही संसद हमारे देश की -
नेता बना भगवान सस्ते में , मोगैम्बो खुश हुआ !!


बेचकर सरे-आम अबला की यहाँ अस्मत कोई -
कर
रहा उत्थान सस्ते में , मोगैम्बो खुश हुआ !!


मिल गए "करूणा" से "बुद्ध" रामसेतु के बहाने -
कर गए अपमान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !!


कर दिए खारीज़ हमारे राम के अस्तित्व को ही-
खो गयी पहचान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ !!


अब बचा क्या बिल्लोरानी जान हीं तो शेष है -
कहो तो दे दूं जान सस्ते में, मोगैम्बो खुश हुआ!!

() रवीन्द्र प्रभात
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6 comments:

  1. इतने सुन्दर ढ़ंग से इतना सशक्त व्यंग! मजा आ गया।

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  2. bahut hi achha laga. saral shabdon mein aapne apni baat kah di hai.

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  3. मयंक मिश्रा13 दिसंबर 2007 को 2:38 pm

    जबरदस्त व्यंग्य लिखा है आपने व्यवस्था पर. सच्ची तस्वीर पेश कर दी. बहुत अच्छे.मजा आ गया।

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  4. व्यंग्य अच्छा है. जब तक दिल को चुभे न तब तक व्यंग्य कैसा.... बड़ी सार्थक परिकल्पना है.

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