आज मैं अपनी बात की शुरुआत नए वर्ष में नए लक्ष्य , संकल्प और परिणाम से शुरू करना चाहता था , किन्तु चिट्ठा पर नए पोस्ट पढ़ने के क्रम में मैंने पाया कि एक दिन पूर्व परिकल्पना पर मेरे द्वारा नव वर्ष की शुभकामनाओं के क्रम में प्रयुक्त किये गए पोस्ट को दूसरे दिन ज्यों का त्यों उद्धृत कर दिया गया है अनिल पांडे के द्वारा "आपका पन्ना " पर , तो थोडा अजीब सा लगा । मुझे इस बात की तकलीफ नही हुई कि मेरे विचारों को किसी के द्वारा बिना मेरी इजाजत लिए अथवा बिना उल्लेख किये ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया गया है , अपितु इस बात की तकलीफ हुई कि क्या हमारे पास विचारों की इतनी कमी हो गयी है कि दूसरों के पोस्ट , दूसरों के विचार अथवा दूसरो के चिंतन का चोरी-चोरी सहारा लिया जाये । अगर ऐसा है तो ब्लोग लेखन करने की क्या आवश्यकता?
क्या औचित्य ? कम से कम मौलिकता तो रहनी ही चाहिए ।
ब्लोग लेखन एक प्रकार का सार्वजनिक लेखन है , जो डायरी की मानिंद मौलिक चिंतन को प्राथमिकता देता है , यदि आपके पास कोई मौलिक विचार नही आ रहे हों तो कम से कम अपनी बात अपनी शैली , अपने शब्दों में तो करें । वैसे मैं आज लिखने कुछ और बैठा था , मगर अनिल पांडे के द्वारा किये गए इस पोस्ट , जिसे नक़ल की भी संज्ञा नही दी जा सकती , क्योकि असल ही टिपिया लिया गया , वह भी परिकल्पना का बिना उल्लेख किये , तो मुझे थोडा अटपटा लगा । मैं आज अपने इस पोस्ट के माध्यम से श्री अनिल पांडे को यह नेक मशविरा देना चाहूंगा कि आगे यदि लेखन में स्वयं को स्थापित करना हो तो इस प्रकार के कृत्यों से अवश्य बचें , यह अच्छी बात नही है ।

12 comments:

  1. जब ब्लॉग ही "आपका पन्ना" है तो इमीटेशन तो उसके नाम में निहित है! क्या परेशान होना। :-)
    खैर, आपने सही समस्या की ओर इंगित किया।

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  2. काश! कि इतना ही जोड़ देते "रवीन्द्र जी की एक और mirror site"

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  3. कलाकारी के साथ फोटोस्टेट का कारनामा
    जिसे आपका पन्ना ने करतूत बना डाला

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  4. मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं । इस मसले पर लोगों के अपने अपने विचार हैं, मेरा मानना है कि बिना पूर्व स्‍वीकृति या नाम का उल्‍लेख किए बिना ऐसा करना सर्वथा उनुचित है, ऐसे में हमारे छत्‍तीसगढ की एक कहावत याद हो आती है - 'खीरा चोर, जोंधरी चोर, धीरे धीरे सेंध फोर ।' प्रदर्शन के लिए ऐसी प्रवृत्ति निंदनीय है ।

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  5. रविंद्र जी नमस्‍कार अभी अभी आपका ब्‍लॉग देखा और फिर अनिज की गलती का पता चला, जब उससे बात की तो उसने बताया कि उसके मन में आपको ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन आपको ठेस पहुंची है। इसके लिए मैं अनिल की ओर से आपसे माफी मांगता हूं। उसने आपकी कविता को अपने ब्‍लॉग से हटा लिया है। अब ऐसे में आपसे विनम्र निवेदन की अनिल को छोटा भाई मानकर पुरानी बातों को भूलकर गुस्‍सा थूंक दें।

    आपका
    आशीष

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  6. आशीष भाई ,
    आपकी विनम्रता प्रशंसनीय है , वैसे मैंने तो केवल नेक मशविरा दिया था अनिल को कि ऐसा न करें ! इससे लेखन के प्रति सदैव ही भ्रम की स्थिति बनी रहती है , सकारात्मक लेखन समाज का आईना होता है , उसे चिट्ठा के माध्यम से आईना का स्वरूप ही बनाए रखा जाए तो अच्छा होगा ! जहाँ तक मेरी विनम्र मान्यता है , कि आपको कोई चीज यदि पसंद आ जाए तो पूरी इमानदारी के साथ दर्शायें , इससे विश्वास का माहौल बना रहता है !

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  7. sir ji.
    apki rachna mujhe bahut achhi aur prerak lagi..isliye maine use upyog kiya.. par apko isse thes pahunchi hai to maafee chahta hoon. maine apko email bhi kiya hai is bawat..ummed hai ki aap apne nausikhiye bhai ko maaf karenge.

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  8. आपका एहसास , आपकी मन:स्थिति को बयान कर रहा है , मन की पवित्रता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है ! कहा गया है की वाणी ,बुद्धि ,वस्त्र ,विवेक और व्यवहार ही मनुष्य का सबसे बड़ा अलंकार है , इसपर हमेशा ध्यान दिया करें ! कोई बात नहीं भाई , लिखना जारी रखें , मैं आपके ब्लॉग पर यदा -कदा आता-जाता रहूँगा !

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  9. सुखवीर राणा3 जनवरी 2008 को 6:37 pm

    अनिल जी के द्वारा अपनी भूल मान लेना बहुत बड़ी बात है !व्यक्ति अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है तो उसका व्यक्तित्व और बड़ा हो जाता है !

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  10. मैं आपकी बात से सहमत हूँ
    दीपक भारतदीप

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