मिथिकीय उद्धरण में ऐसा कहा जाता रहा है , कि यह विशाल ब्रह्माण्ड ईश्वर के संकल्प का प्रतिफल है । ईश्वर में इच्छा जगी " एको अहं बहुस्याम " अर्थात् मैं अकेला हूँ - बहुत हो जाऊं । उसी संकल्प के परिणाम स्वरूप तीन गुण , पंचतत्व उपजे और सारा संसार बन कर तैयार हो गया । मैं यह नही जानता कि यह उद्धरण सही है या नही , बचपन में मेरी माँ सदैव ऐसे उद्धरणों के माध्यम से मेरा मार्गदर्शन किया करती थी , अर्थात मेरे भीतर संस्कार भरती, ताकि भविष्य में जब मैं कर्तव्य - पथ पर चलूँ तो बिपरीत परिस्थितियों में भी मेरे कदम न
डगमगाए । मेरी माँ अक्सर कहा करती रही कि -" जब मन का केन्द्रीकरण किसी संकल्प पर हो जाता है , तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नही रहती । " अर्थात इच्छा जब योग्यता द्वारा परिष्कृत होकर दृढ निश्चय का रुप धारण कर लेती है , तो वह संकल्प कहलाती है ।

आप यह कहेंगे कि मैंने उपदेश देना शुरू कर दिया , सच तो यह है कि उपदेश देने वाले से महान वह होता है जो उपाय बताता है । ऐसा ही उपाय बताता हुआ एक पोस्ट आज मैंने देखा , आदरणीय शाष्त्री जे सी फिलिप जी के चिट्ठे "सारथी" पर 2008 टिप्पणी न करें: चिट्ठा छापते रहें ! पहले तो मेरे भीतर इसे पढ़ने की जिज्ञासा जगी , फिर जैसे-जैसे पढ़ता गया , खोता चला गया विचारों की दुनिया में । उनकी यह बात मुझे बहुत भाइ कि "अभी भी बहुत लोगों को यह गलतफहमी है कि यदि वे चाहे कुछ भी लिखते रहें तो भी उनको पाठक मिलेंगे। " इस विचार से सहमत होना लाजमी है ।
मेरा भी यही मानना है कि चिट्ठा विषयाधारित हो या न हो ,परविषयकेंन्द्रित अवश्य हो । इससे आप अपने भीतर की यात्रा करने में सफल हो जाते हैं ।
विचार मानव जीवन के उत्कर्ष और अभ्युदय का आधार है। विधेयात्मक विचार से जीवन शक्तिपुंज हो उठता है । विचार एक संसाधन है , जिसे नियंत्रित , सयंमित और उपयोगी बनाकर जीवन में अनेक चमत्कार एवं आश्चर्य जनक परिणाम उत्पन्न किये जा सकते हैं । विचार चाहे जो हों , शक्तिशाली होते हैं । इसलिए यह जरूरी है कि अपने चिट्ठों को विचारों से आबद्ध कर दें और नए वर्ष में संकल्पित मन से नव वर्ष का वरन करते हुए इसे एक लक्ष्य का स्वरूप दे दें , मुझे उम्मीद हीं नही वरन पूर्ण विश्वास है कि वर्ष -2008 समाप्त होते-होते इसके चमत्कारिक परिणाम देखने को मिलेंगे ।
इस संदर्भ में "ज्ञान दत्त पांडे जी की मानसिक हलचल " प्रासंगिक प्रतीत होती है , आज उनका भी पोस्ट पढा -"जोड़ों के दर्द में लाभप्रद वनस्पतीय प्रयोग " । उन्होंने अपने पोस्ट में पंकज अवधिया के पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियो का लाभप्रद विचारों को समाहित किया है , जो प्रशंसनीय है । इसी क्रम में आज एक और पोस्ट पर मेरी नजरें गयी , श्री रवि रतलामी जी के हिन्दी ब्लोग पर । उन्होंने चिट्ठाकारों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प की चर्चा की है । उनके द्वारा जो सुझाव दिए गए है , वह सही मायनों में संकल्प है । एक ऐसा संकल्प जिसका कोई विकल्प नही होता । श्री रवि रतलामी जी के द्वारा प्रस्तावित संकल्पों में जो मैंने महसूस किया है , वह यह है कि उनके संकल्प में निहित है संस्कार,संवेदना , कार्यानुभूति और रचनात्मकता ।
कहा जाता है कि व्यक्ति जब लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छा करता है , तो उसके संस्कार , कर्म , लगन तथा परोपकार की भावना उसकी उपलब्धियों के ढाल बनते हैं और व्यक्ति सफलता को वरन करता है । संकल्प का कोई विकल्प नही होता , संकल्प जब सार्वजनिक/सामुहिक हो जाता है तो प्रतिबद्धता का रुप ले लेता है । जहाँ प्रतिबद्धता है वहीं सृजन और जहाँ सृजन है वहीं आयाम ।
इसलिए आईये ज्यादा से ज्यादा चिट्ठे को सामूहिक विचारधारा में आवद्ध करते हुए नए वर्ष में ज्यादा से ज्यादा चिट्ठों का संजाल विकसित करें , सभी चिट्ठाकारों को प्रेरित करें कि वे अपने होने का एहसास कराएँ । साथ ही रवि रतलामी जी के 10 टॉप संकल्पों पर अमल करें । निश्चित रुप से कल आपका होगा ।

6 comments:

  1. आपने मेरे ब्लॉग और ब्लॉग पोस्ट - जो वस्तुत अवधिया जी ने लिखी है - को उपयुक्त पाया है; उसके लिये बहुत धन्यवाद।
    असल में मैं भी अपने ब्लॉग को किसी खांचे में फिट नहीं कर पा रहा हूं। यह शायद दशकों के अभिव्यक्त न किये गये मानसिक मन्थन का एक माध्यम मिलने पर प्रकटन है। मुझे भी नहीं मालुम कि यह कुछ समय बाद चुक न जाये। पर मैं उसकी बहुत चिन्ता नहीं करता।

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति , सारगर्भित चिंतन !

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  3. रवीन्द्र जी, आपकी पोस्ट का विषय एक में अनेक जैसा है. जहाँ से बहुत कुछ ग्रहण किया जा सकता है.

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  4. बहुत ही सार्थक विश्लेषण और एक उत्साहवर्धक आलेख ! बधाई हो, इससे वाकई मेरे एकला चोलो रे को बल मिला । एक थीम , एक मुद्दा आपको और आपके लेखन को लम्बे अरसे तक याद रखने योग्य बनाता है,मैं प्रयासरत हूँ कि अपनी अपेक्षाओं पर टिक सकूँ ।

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  5. कहा जाता है कि व्यक्ति जब लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छा करता है , तो उसके संस्कार , कर्म , लगन तथा परोपकार की भावना उसकी उपलब्धियों के ढाल बनते हैं और व्यक्ति सफलता को वरन करता है ।
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    बहुत बढिया चिंतन है
    दीपक भारतदीप

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  6. " इसलिए आईये ज्यादा से ज्यादा चिट्ठे को सामूहिक विचारधारा में आवद्ध करते हुए नए वर्ष में ज्यादा से ज्यादा चिट्ठों का संजाल विकसित करें , सभी चिट्ठाकारों को प्रेरित करें कि वे अपने होने का एहसास कराएँ । साथ ही रवि रतलामी जी के 10 टॉप संकल्पों पर अमल करें । निश्चित रुप से कल आपका होगा ।"


    मैं आपका समर्थन करता हूँ !!

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