पिछले दिनों सिडनी में जो हुआ , उसे बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसे पूरा विश्व जानता है . मगर इस कुकृत्य के बारे में जानकर जो मैंने महसूस किया उसे चार पंक्तियों में प्रस्तुत कर रहा हूँ ।




देश के बाहर : मेरी राय में-




(एक)
चोर ने ऊंगली उठाई, न्याय ने करवट लिए ,
दो दोगले अम्पायरों ने फैसले झटपट किये ,
एक ही उल्लू काफी था बरबादे-क्रिकेट करने को-
कुल तेरह मिल गए साथ और खेल को चौपट किये !
(दो)
हमने अपनी सभ्यता का दे दिया प्रमाण फिर से ,
जिस सभ्यता पर देश को है गर्व और अभिमान फिर से ,
अम्पायारों से हारकर क्रिकेट है शर्मसार देखो -
हारकर भी कर लिए हम जीत का उनमान फिर से !



ये चित्र शनिवार की रात करीब नौ बजे के हैं , लखनऊ के आकाशवाणी केंद्र से चंद कदम की दूरी पर यातायात नियंत्रित करने के लिए तैनात पुलिस का एक सिपाही खुद नशे में धुत सड़क के किनारे पडा आयं-बायं बक रहा था , हमदर्दी के नाते कुछ लोग आगे बढे , उस सिपाही के चहरे पर पानी छिड़का....एक मारुति कार में कुछ खाकी वर्दीवाले आए मगर वे भी थाने को फोन करके आगे बढ़ गए ! काफी देर तक थाने की पुलिस नही पहुँची तो तो जिम्मेदारों को अपना नागरिक धर्म याद आया और सौ नंबर पर फोन हुआ...फिर क्या वही ढाक के तीन पात , बताने की कोई जरूरत नही, आप खुद समझदार हैं . मेरी तरफ से चार पंक्तियाँ इन्हीं पुलिस वालों को समर्पित --



देखिए कैसे हैं अफलातुन , प्रहरी देश के
बेसुरे राग के गंदे धुन , प्रहरी देश के
लोगों को सुरक्षा क्या देंगे ये भाई लोग-
जो वेहोश पी के हैं टुन , प्रहरी देश के !




वो बातें देश के बाहर की थी , ये देश के भीतर की , सभी जगह है चोरी फ़िर भी सीनाजोरी ! एक जगह क्रिकेट शर्मसार तो दूसरी जगह बर्दी , मुझे तो यही लग रहा की सभ्यता को लग गयी है सर्दी !








1 comments:

  1. बामुलाहिजा में भट्ट जी के इस विषय पर जितने बढ़िया कार्टून थे, उतनी बढ़िया यहां कविता पढ़ने को मिली। बहुत खूब!

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