"सारथी " ने हिन्दी के ब्लोग का मूल्यांकन करने की एक नई परम्परा की शुरुआत करने की घोषणा पिछले दिनों की और इसी कड़ी में उन्होने हिन्दी के श्रेष्ठ चिट्ठे का चुनाव भी कर डाला , प्रस्तुत है उनके इस श्रेष्ठ मूल्यांकन की व्यंग्य परक समीक्षा -

कल कुछ ब्लोगर भाइयों की चौपाल लगी थी , गजोधर ने तफरी लेते हुए कहा कि - हमरे एक ब्लोगर मित्र फोनवा पर अइसन बतकही किये कि पूछो मत धरीछन भाई, उ कहै कि ई पूरी दुनिया में अपने गुरु जी को एकै ब्लोगरवा दिखाई दिया का ? कवन गुरु जी गजोधर ? अरे वही " जे सी फीलिप शास्त्री " कहत रहें कि " ज्ञान दत्त पांडे " से बढिया ब्लोगर कोई है हीं नहीं !

त एह में तोहके का बात का कष्ट है गजोधर ? बहुत बड़ा कष्ट है , नाही समझोगे ! फिर भी बताओ तो ? देखो, जब सच बोलना ही था , तो घुमा-फिराके बोलते, सीधे-सीधे सच बोलने की का जरूरत थी ? धरिछन थोडा सकपकाया और इस शेर के साथ गजोधर की बोलती बंद करने की कोशिश की,कि-
" वो शख्स बहुत पिछडे हुए गाँव का होगा, इस दौर में देखिए सच बोल रहा है !"

सबकी अपनी-अपनी समस्या है , अपने दु:ख से व्यक्ति दु:खी नही है, वल्कि दूसरों के सुख से दु:खी है ! तभी कूद पडा दोनो की बतकही में अपना राम भरोसे , कहने लगा- जानते हो गजोधर भैया ! इस संदर्भ में अकवर और बीरबल का एक किस्सा बहुत मशहूर है ।
गजोधर सकपकाया और टेढीया के बोला कि कवन किस्सा के बात करत हाउ राम भरोसे , ज़रा हमके भी सुनाओ तो जाने ! राम भरोसे पालथी मारके बैठा और लगा अकवर बीरबल का किस्सा सुनाने ।

अकवर से एक दिन बिरबल बोले कि साहब हम आपको अल्लाह मियाँ से मिलावायेंगे ! अकवर खुश हुए उसीप्रकार जैसे शान फिलिम में मोगैम्बो खुश हुआ था ! तभी गजोधर उसे बोलने से रोका, ई बताओ राम भरोसे कि तुम अकवर की तुलना मोगैम्बो से क्यों करते हो ? इसीलिए गजोधर भाई कि तुम ज्ञानदत्त जी की तुलना अन्यछुटभैये ब्लोगर से करते हो ! बेचारे गजोधर की बोलती बंद हो गयी । झुंझलाते हुए कहा- ठीक है किस्सा आगे बढाओ ! राम भरोसे ने किस्सा आगे बढाया -

अकवर मियाँ लगे अगोरने - कब दिन आयेगा ! छटपटाके छुछमाछर हो रहे थे . एक दिन बिरबल एक मोची से एक पैर का नया जूता मांगकर ले आये कि दो-तीन दिन में लौटादेंगे. मोची ने सोचा कि ठीक है जब ग्राहक आयेगा तो माँग लायेंगे। उधर बिरबल रात में खाना-पीना खाके सो गया और जूता को विस्तार के पास रख लिया सबैरबैं उठिके घर में सीकड़-धड़ के दरवाजा बंद कर लिए और घरवा में भोंकर-भोंकरके रोने लगे ! घर वाले दरवाजा खोलने को कहते तो वे और जोर से रोने लगते ! बहुत समय बीत गया । उधर जब अकवर का दरवार लगा तो बिरबल गायब । खोजहरिया हुई तो असली किस्सा पता लगा !

अकवर गए और दरवाजा खोलवाने लगे ! कैसों-कैसों दरवाजा खुला , अकवर ने देखा कि
बिरबल एक पैर का जूता सीने से लगाए रो रहे हैं! अकवर ने पूछा- कि क्या माजरा है जनाब ? नाक सुनकते बिरबल बोले- रात अल्लाह मियाँ आये थे , हमने कहा बादशाह सलामत को दर्शन दे दीजिए तो लगे भागने ! हम भी कसके पैर छान लिए , उ तडाके भागे ! ओही में उनके एक पैर का जूता हमरे हाँथ में रह गया ! अकवर ने सबके सामने अल्लाह मियाँ का जूता अपने हाँथ में लिया और लगा चूमने ! फिर उस जूते को बादशाह सलामत अपने दरबार में ले गए, पूरी जनता बारी-बारी से आती और जूते को चूमकर चली जाती । जब ग्राहक मोची के पास आया तो वह भागते हुए दरवार में दाखिल हुआ । बिरबल से बात की , बिरबल ने सिंहासन से जूता देने में हीलाहवाली करने लगे! जब अकवर ने पूछा तो बिरबल ने सच्ची कथा बता दी !

बेचारा गजोधर परेशान, कि राम भरोसे ने बिना सिर-पैर की कहानी सुना दी, इस कहानी का " ज्ञानदत्त पांडे के मानसिक हलचल " से क्या लेना-देना ? राम भरोसे को गुस्सा आ गया और कहा, कि- गजोधर भाई, जैसे तुमने इस किस्से को नही समझा उसीप्रकार " सारथी " की समीक्षा को भी नही समझ पाए ! कहने का मतलब यह है कि ज्ञानदत्त जी के पास है बिरबल की तरह ही अनुभवों का पिटारा जो अन्य ब्लोगर के पास नही है और इसी कारण से उन्हें शास्त्री जी ने " श्रेष्ठ ब्लोगर " कहा है , समझे गजोधर भाई ?

यह सुनकर बेचारे गजोधर की बोलती बंद हो गयी ....! चौपाल में बैठे एक ब्लोगर ने कहा कि तुम ठीक कहत हाउ राम खेलावन , हम तोहरे बतकही से संतुष्ट हैं, लेकिन अब जब बसंत का आगमन हो ही गया है तो क्यों न बसंत की चर्चा की जाये ? सबने एक स्वर से कहा - कल होगी परिकल्पना पर बसंत की चर्चा ..........इसप्रकार चौपाल कल तक के लिए स्थगित कर दी गयी ...!

4 comments:

  1. समीक्षा की व्यंग्य समीक्षा पढ़कर आनन्द आ गया. आप भी भाई प्रभात में ही एक समानांतर समीक्षा चालू कर दो.मज़ा भी तो आना ही चाहिये. समीक्षा को गुदगुदाना भी तो चाहिये.

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  2. चलो जी, जल्दी वसन्त चर्चा ठेलो! इससे पहले कि वसन्त जाये, पूरा वासन्ती स्टॉक उडेंल दो ब्लॉग पर।

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