विगत एक सप्ताह के अपने अनुभवों को बांटने में यदि गद्य का सहारा लिया जाए तो काफ़ी समय की जरूरत होगी , तो मैंने सोचा कि क्यों न आज उस बात की चर्चा की जाए जो विगत एक सप्ताह की सबसे महत्वपूर्ण है ।विगत एक सप्ताह से उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के कुछ क्षेत्रों की यात्रा पर था , कहीं कवि -सम्मेलन तो कहीं व्यक्तिगत आमंत्रण । अत्यन्त थकाऊ और भागमभाग भरी यात्रा । बहुत दिनों के बाद आज जब ब्लॉग पर आया तो सोचा क्यों न विगत एक सप्ताह की अपनी भडास निकाल लूँ , मगर यात्रा की थकान के बाद का रविबार अत्यन्त व्यस्त होता है और उसमें कुछ लिखने हेतु समय भी कम । बिहार की यात्रा के क्रम में मैं जहाँ भी जाता लोग मुम्बई में चल रही उत्तर भारतीय और मराठियों के बीच के मतभेद की बातें करते रहे , जितनी मुंह उतनी बातें । राज ठाकरे ने ऐसा किया , बाला साहब ने ऐसा किया .....आदि-आदि । लेकिन यदि देखा जाए तो यह स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित होता है कि यह विवाद और कुछ नही राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई की उपज है । इस विवाद को हवा देने का काम हमारे नेताओं ने खुलकर किया है , चाहे वह महाराष्ट्र के हों अथवा बिहार के या फ़िर उत्तर प्रदेश के , सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं । अफ़सोस तो इस बात का है कि इसमें आखिरकार नुकसान आम नागरिकों का होता है , नेताओं का नही । प्रस्तुत है उन सभी नेताओं को कोसती हुयी एक ग़ज़ल , जिसने राजनीति की रोटी हमारे पेट की आग पर सेंकने की कोशिश कर रहे हैं , चाहे वह महाराष्ट्र के हों चाहे उत्तर भारतीय -


बहुत है नाज तुमको आजकल अपनी उड़ान पर ।


पछताओगे जब आओगे एक दिन ढलान पर ॥



फर्क इतना है कि हम उन पत्थरों को तोड़ते -


जिन पत्थरों को फेंकते हो तुम किसी इंसान पर ॥



ठोकरें खाने से पहले जो संभल जाते नहीं -


लड़खडा जाते अचानक टूटते अरमान पर ॥



परछाईयाँ भी छोड़ देती साथ गर्दिश में -


सख्त हो जाती हवाएं उम्र के अवसान पर ॥



कर गया "प्रभात"गैरों के हवाले जो चमन -


देखिये उस पासवां को फक्र है ईमान पर ॥


इसी बीच कुछ और बातें यात्रा के क्रम में अखबार पढ़ते हुए ज्ञात हुई , जिसे मैंने ग़ज़ल का रूप दे दिया । ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है-


रो रही पूरी आबादी मुल्क के अपमान पर ।


आप कहते हो मियाँ सब छोड़ दो भगवान पर ?



बेचकर सरेआम अबला की यहाँ अस्मत कोई -


दे रहा है मंच से भाषण दलित उत्थान पर ॥



क्या जरूरत आ पडी सत्कर्म से पहले कि अब -


उंगलिया उठने लगी है देश में भगवान पर ?



अम्न मेरे मुल्क की तहजीब है बस इसलिए -


बच गए हैं ठेस पहुँचाकर मेरे सम्मान पर ॥



हम गरीबों की यही फितरत रही है दोस्तों -


हो गयी बेटी बड़ी नज़रें है छप्पर-छान पर ॥


आज बस इतना हीं ........ ।



8 comments:

  1. अच्छा है सर. बस रुकना मत. कहते रहना. ये यकी़न कभी न छूटे कि कुछ लोग हैं जो सुन रहे हैं.

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  2. बहुत बेहतरीन...कम समय में भी क्या बात है..कम ही रहे.. :)

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  3. bahut hi umada behtarin,aaj kal ke poltics par bahut hi achha likha hai.wah

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  4. अपनी संवेदनाओं को रचना के माध्यम से बखूबीप्रस्तुत किया है।बहुत बढिया!

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  5. हम गरीबों की यही फितरत रही है दोस्तों -
    हो गयी बेटी बड़ी नज़रें है छप्पर-छान पर ॥

    अच्छा लगा रवीन्द्र जी ...बधाई

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  6. रवीन्द्र जी, ऊंट कभी न कभी पहाड़ के नीचे आता ही है! ये बड़े लोग भी आयेंगे।

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  7. बहुत खूब। आपने लखनऊ का नाम ऊंचा किया है। बहुत-बहुत बधाई।

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  8. रो रही पूरी आबादी मुल्क के अपमान पर ।
    आप कहते हो मियाँ सब छोड़ दो भगवान पर ?
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    हाकी में भारत की दुर्दशा पर यह पंक्तियां सटीक लगतीं हैं।
    दीपक भारतदीप

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