कहा गया है, कि मन और बुद्धि के समर्पण की दिशा में एकता का रंग भरते हुए जीवन रूपी प्रवृतियों के कलश में संस्कार की मर्यादा को उतारना और आपसी प्यार व विश्वास के पवित्र पलों की अनुभूति कराते हुए एक-दूसरे के साथ मिलकर सादगीपूर्ण जीवन को रंगमय कर देना ही होली है ......फागुनी वयार बहने लगी है और वातावरण धीरे-धीरे होलीमय होता जा रहा है , तो आईये परिकल्पना के संग महसूस कीजिये फागुन को -
तन पे सांकल फागुनी, नेह लुटाये मीत !
पके आम सा मन हुआ , रची पान सी प्रीत !!
महुआ पीकर मस्त है, रंग भरी मुस्कान !
झूम रहे हैं आँगने, बूढे और जवान !!
धुप चढी आकाश में , मन में ले उपहास !
पानी-पानी कर गयी , बासंती एहसास !!
चूनर- चूनर टांकती , हिला-हिला के पाँव !
शहर से चलकर आया, जबसे साजन गाँव !!
मंगलमय हो आपको , होली का त्यौहार !
रसभीनी शुभकामना, मेरी बारम्बार !!
() रवीन्द्र प्रभात

6 comments:

  1. तन पे सांकल फागुनी, नेह लुटाये मीत !
    पके आम सा मन हुआ , रची पान सी प्रीत !!

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  2. रविन्द्र जी
    बहुत सुंदर दोहे हैं...किसकी तारीफ करूँ जब सब एक से बढ़ कर एक हैं...वाह...
    नीरज

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  3. भाई बड़ी अच्छी बयार है आपके यहाँ, अब तो थोड़ा सुरूर भी बनने लगा है होली का..मज़ा आ गया

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  4. भाई बहुत बढ़िया. एकदम छा गया सुरूर. कमाल के दोहे. मस्त कर दिया आपने.

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  5. न केवल चित्र वरन पंक्तियां भी रंग मय है! पूरा फागुन का अन्दाज।

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  6. आपकी कविता पढ कर मन होली के रंगों में भीग गया। बधाई स्वीकारें।

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