कहते हैं शराब, लोग या तो ग़म को भूलने या फिर ख़ुशी मनाने के लिए पीते हैं।वैसे सच तो यह है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए। शराब के सन्दर्भ में लोगों की अपनी-अपनी दलीलें होती हैं । मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि यार शराब सदियों से शायरों की पसंदीदा रही है , चाहे गालिब रहे हों चाहे .......सब के सब शराब की ईज़त अफजाई की है , तारीफ़ में कशीदे पढे हैं, तू कैसा शायर है यार कि अभी तक शराब पर कुछ भी नही लिखा? उसने ऐसी -ऐसी बातें की , कि मेरे भीतर का शायर जाग उठा । मैंने कहा आज कुछ लिख ही डालते हैं , तू मुझे बता शराब पीने के क्या-क्या फायदे हैं ? उसने कहा पहले पिलाओ फ़िर बताते हैं , भाई , अपनी गरज थी सो मैंने सोचा कि यार रवीन्द्र ! इसकी बातों में वजन है,आज इसे दिल खोलकर पिलादे , ताकि इसकी कही हुई बातों पर गौर करके तुम अपनी शायरी को धार दे सको , बरना तुम्हे इस बात का हमेशा मलाल ही रहेगा कि सभी विषयों पर लिखा , शराब पर नही लिखा । भाई, यकीं मानिए मेरे उस मित्र ने शराब के शुरुर के साथ ऐसी गोपनीयता पर से परदा हटाया कि मैं हतप्रभ रह गया एकबारगी , फ़िर मैंने सहज अनुमान लगा लिया कि आख़िर क्यों स्व हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला खंड काव्य लिखा होगा ? चलिए मैंने भी इस विषय पर एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है , मगर अंदाज़ ज़रा हटकर है -
चौंकिए मत जाम इतना पी रहे हैं , इसलिए ।
एक मुकम्मल जिंदगी हम जी रहे हैं , इसलिए ।।
मैंने मयखाने को समझा पाकगाहों की तरह -
साथ में पंडित कभी मौलवी रहे हैं , इसलिए ।।
शर्म क्या हम डूब ही गए इश्क - दरिया में अगर -
डूबने को आप भी राजी रहे हैं , इसलिए ।।
जानते हैं हम कि जलना खुदकुशी होती नही -
एक चरागे-अंजुमन हम भी रहे हैं , इसलिए ।।
फ़िर कोई महफ़िल में नंगा हो नही मेरे "प्रभात" -
कुछ फटे कपडों को लेकर सी रहे हैं , इसलिए ।।
() रवीन्द्र प्रभात

7 comments:

  1. मैंने मयखाने को समझा पाकगाहों की तरह -
    साथ में पंडित कभी मौलवी रहे हैं , इसलिए ।।

    फ़िर कोई महफ़िल में नंगा हो नही मेरे "प्रभात" -
    कुछ फटे कपडों को लेकर सी रहे हैं , इसलिए

    बहुत खूब..ये दोनों शेर खास पसंद आए...

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  2. मुझे एक डॉक्टर साहब ने बतया था - ऑपरेशन के बाद जब अनेस्थीसीया का प्रभाव कम होने लगता है तो मरीज बड़बड़ाते हुये अपने अन्धेरे-उजले व्यक्तित्व की न जाने कितनी परतें खोलता है। बहुत कुछ हिप्नॉटिज्म की तरह।
    बेहतर है कि सरल चरित्र बना जाये। बहुत सारे गुप्त पॉकेट्स ही न हों!

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  3. वाह वाह!! बहुत खूब..क्या शेर कहे हैं, वाह!!

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  4. "मैंने मयखाने को समझा पाकगाहों की तरह -साथ में पंडित कभी मौलवी रहे हैं , इसलिए"

    रवीन्द्र जी,

    आपके खजाने से एक और अच्छी पोस्ट ...उम्दा शेरों के साथ....बधाई

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  5. शर्म क्या हम डूब ही गए इश्क - दरिया में अगर -
    डूबने को आप भी राजी रहे हैं , इसलिए ।।


    ye sher khas taur par pasand aaya..
    bahut hi umda sher hai baki bhi..

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