मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा है, की – “ व्यक्ति जिसका अन्तर-मन प्रशांत हो, कभी भी सच्चे मायनों में हिंसा नहीं अपना सकता. मुझे उम्मीद है कि पूर्व साइड में चांदनी की सरजमीं कहलाये जाने वाले भारत का उजाला शान्ति की चेतना को वैसे हीं दूर तक पहुंचायेगा , जैसे चाँद की शीतल किरणें दोपहर की चिल चिलाती गरमी से राहत पहुंचाती है. एक निर्विकार शांतिमय दिल से विनम्रता उपजती है. विनम्रता से दूसरों की बात सुनने की क्षमता उपजती है, सुनने की क्षमता से पारस्परिक संवेदना और पारस्परिक संवेदना से शांतिपूर्ण समाज….!”
भारत के सन्दर्भ में उपरोक्त विचार किसी भारतीय का नहीं , अपितु एक गैर भारतीय विचारक का है, जिसने गांधी के इस देश को समूचे विश्व के लिए प्रेरणा प्रद माना। भारत को महात्मा बुद्ध, गुरुनानक देव, महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद का देश कहा जाता है। जिनके अनुयायी समूचे विश्व में फैले हैं।भारत को जगत पिता की संज्ञा से भी नवाजा जाता है, क्योंकि भारत के अहिंसावादी विचार समूचे विश्व के लिए अनुकरणीय है।
विगत दिनों जो कुछ भी महाराष्ट्र में हुआ वह हमारे समाज के लिए कहीं से भी शुभ नही कहा जा सकता। घर-वार, जमीन-खेती छोड़, दूर शहर में नौकरी का पर्चा देने आए बेरोजगार लड़कों का स्वागत पत्थरों- हौकियों से करना , उन्हें पीटना , जान से मारने की कोशिश करना , हिंसा करना क्या एक सभ्य समाज के लिए उचित है?
कोई भी समाज हिंसा को महत्त्व नही दे सकता । अगर देता है तो वह समाज कभी भी सभ्य कह लाने का अधिकारी नहीं हो सकता॥ईशाई धर्म के प्रवर्तक प्रभु ईशू को जब शूली पर चढाया जा रहा था , तो उन्होंने बस इतना कहा कि –“ इश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे, ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं !”
आप अब कहेंगे , कि इतने दिनों के बाद ब्लॉग पर लौटा है और लगा उपदेश देनें । भाई मेरे! मैं उपदेशक नहीं हूँ जो उपदेश दूँ और न विचारक जो आपको उपाय बतलाऊँ .मैं राजनेता भी नहीं हूँ जो समस्याओं को इतना जटिल बना दूँ कि उसका समाधान ही मुश्किल हो जाए . लेकिन मैं आज पाँच महीने बाद ब्लॉग पर लौटा हूँ तो चाहूंगा कि ऐसी विषय से मैं अपने पोस्ट की शुरुआत करू जो मैं सोचता हूँ और महसूस करता हूँ।
आज जो कुछ भी महाराष्ट्र में हो रहा है, उसे कोई भी सभी समाज कदापि स्वीकार नही करेगा . महाराष्ट्र तो सादगी और शौर्य का प्रतीक रहा है , फ़िर हिंसा का ताण्डव क्यों? मराठी और गैर मराठी इश्यू को लेकर इसतरह हिंसा कराने से क्या महाराष्ट्र का भला होगा , कभी नही ।क्या यह वही प्रदेश है, जिसके सन्दर्भ में कभी लोकमान्य तिलक ने कहा था, कि- “सभ्यता क्या होती है? संगठन क्या होता है?सादगी क्या होती है और समृद्धि क्या होती है ? जानना हो तो महाराष्ट्र आ जाओ…॥!”
जिस महाराष्ट्र में हिन्दी को आज अपमानित किया जा रहा है, वोट बैंक के लिए हिंसा का सहारा लिया जा रहा है। याद करो यह वही महाराष्ट्र है जन्हाँ उत्पन्न हुए काका कालेलकर एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी और संत पुरूष के रूप में, जिन्होनें अहिन्दी भाषी होते हुए भी राष्ट्रभाषा हिन्दी का व्यापक प्रसार किया महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में .
सम्प्रदायवाद और क्षेत्रवाद अगर राजनीति के घूरे पर पालने वाले दो सबसे घृणित कीडे हैं तो उन दो विभूतियों को आप क्या कहेंगे जिनके सियासी रथ में यही मकोडे जुटे हैं? महाराष्ट्र के नाम पर, महाराष्ट्र के ही एक जीनियस की देखरेख में बने संविधान की धज्जियाँ उडाने वाले को आप क्या कहेंगे? मैं तो कहूंगा मानसिक रूप से पूर्णत: वीमार , शायद आप भी मेरी बातो से इतेफाक रखें। ऐसे व्यक्ति जो वीमार होता है वह दया का पात्र होता है , उसके लिए इश्वर से दुआ माँगी जाती है । इसलिए मैं भी राज ठाकरे के लिए यही दुआ करूंगा कि हे इश्वर ! उसे सद्बुद्धि दे , वे नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं…!
महाराष्ट्र के निवासियों आप अपने आचरण के विपरीत जाकर हिंसा को तरजीह मत दो . हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नही है.....!

2 comments:

  1. ये सज्जन तो आधुनिक भस्मासुर हैं!

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  2. बिल्कुल सही कह रहे हैं:

    हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नही है.....!

    आजकल हैं कहाँ आप?? दिखते ही नहीं.

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