श्रम दिवस पर एक श्रमिक की व्यथा

जब बीमार होता कोई सेठ

जरूरत महसूस नही होती ओझा- गुणी की

नीम-हकीम से भी ठीक नही होते सेठ

दुआएं नही भाती उसे अपने मजदूरों की

दिए जाते कोरामीन / पहुंचाया जाता कोमा में

किसी अमीर शहर के अमीर अस्पताल में

मंत्रियों की सिफारिशों पर

बुलाए जाते चिकित्सकों के दल गैर मुल्कों से

हिदायत दी जाती सेठ को

अय्याशी न करने की

ठीक हो जाने तक ....!

मगर जब बीमार होता कोई मजदूर

सब कुछ सहज होता

वैसे हीं

जैसे सहज होती पृथ्वी

सहज होती चिडिया

सहज होता कुम्हार

चलती हुई चाक पर बर्तन गढ़ते हुए ....!

नही बदल जाता शहर का मिजाज अचानक

नही होती मन्त्रियों के कानोंमें सुनगुनाहट

ठीक हो जाती बीमारी

एक खुराक वाली पुडिये से

और अगले हीं दिन

निकल जाता वह काम पर

पहले की तरह इत्मीनान से ।

किंतु , कट ही जाती

उसकी एक दिन की दिहाडी

बहाना बनाने के जुर्म में ....!

अर्थ-व्यवस्था की नींब होते हैं मजदूर , किंतु फ़िर भी -

चिंतित नही होते सेठ , जबकि-

दोनों बीमार पड़ते हैं

एक काम करते हुए तो दूसरा काम न करने के एवज में .....!

() रवीन्द्र प्रभात

13 comments:

  1. MADURON KE DARD KO BAHOT HI KARINE SE AAPNE SABKE SAAMNE RAKHA HAI.. AANKHEN NAM KAR DI AAPNE...


    ARSH

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  2. सही दिन पर सही पोस्ट और दीन लोगो के बारे मे या उनकी दिनचर्या आदि के बारे कोई पोस्ट नही देखती हूँ,सिर्फ अपने दिल दिमाग से परेशान लोगो की लेखनी से रु ब रु हो पाती हूँ कभी कभी ऐसी रचनाये दिख जाती है! पर ऐसा एक सच, जो समाज का बहुत बडा हिस्सा ऐसे ही जीता है जो पूरी तरह से उपेक्छित जिन्दगी जीते हुये उनकी जिन्दगी समाप्त हो जाती है!
    आपने बहुत ही मार्मिक सच को दिखाने की एक अच्छी कोशिश करी .........इसके लिये बहुत सारी शुभकामनाये

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  3. एक आम आदमी का दर्द वयां करती खुबसूरत कविता , जिसमें डूबी हुयी संवेदनाओं को महसूस कर पोर-पोर सिहर गया अचानक .....सचमुच बीमार तो सभी होते हैं चाहे वह राजा हो या रंक ....मगर वे ठीक होते हैं अलग-अलग ढंग से .....मजदूरों की दुर्दशा का सही चित्रण किया ही आपने और श्रम दिवस पर प्रस्तुत कर अपनी भावनाओं की सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने में आप नि:संदेह सफल हुए हैं .....मेरी आत्मिक बधाईयाँ अच्छी अभिव्यक्ति के लिए ...!

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  4. सही,सार्थक और समसामयिक पोस्ट के लिए एक बार पुन:बधाईयाँ !

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  5. अर्थ-व्यवस्था की नींब होते हैं मजदूर , किंतु फ़िर भी -

    चिंतित नही होते सेठ , जबकि-

    दोनों बीमार पड़ते हैं

    एक काम करते हुए तो दूसरा काम न करने के एवज में .....!

    गहरा चिंतन, सार्थक अभिव्यक्ति .....और सोच अत्यंत प्रखर , बधाईयाँ !

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  6. बहुत बढिया रचना है .. सचमुच यथार्थ को चित्रित किया है।

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  7. बहुत ही yathaarh लिखा है..............saty लिखा है...........majdoor की kismat में यही लिखा होता है..........ameer आदमी सब कुछ पा letaa है .............लाजवाब

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  8. दर्द जो उकेरा है
    असली है
    पर आपका पोस्‍ट
    न लगाना तो
    फसली है
    कहां है आप ...

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