..............स्तीफा के सन्दर्भ में पद्मश्री के पी सक्सेना कहते हैं ,कि " जिसे जाना होता है वह दे देता है अगला ले लेता है इसे मंजूर कर ही लेना राष्ट्रपति या राज्यपाल की मजबूरी है , क्योंकि यही उनकी नौकरी है कि शपथ खिलाओ और इस्तीफा उगलवा लो इस्तीफा दान एक छोटी सी क्रिया है उठायी एक कलम और लिख दिया - जा ले जा अपनी गद्दी नही बैठते कल को जरूरत पड़े तो फ़िर बुला लेना शपथ ले लेंगे नेता हैं कोई दूध नही कि जमकर एक बार दही हो गया तो दोबारा दूध नहीं बन सकता ....!"हालाँकि मुंशी प्रेमचंद की कहानी " इस्तीफा " की भावभूमि समाज के राजनीतिकरण से संबंधित है कि राजनीति से यदि आप इस कहानी को अभी तक पढ़ा अथवा सुना है तो आवाज़ पर जाईये और अवश्य सुनिए



शपथ-इस्तीफा के बाद राजनीति का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है पुतला दहन विरोध प्रदर्शनों का परमानेंट आईटम यह हमेशा किसी नुक्कड़ किसी चौराहे पर किया जाता है पुतला दहन का सीधा-सीधा मतलब है जिन्दा व्यक्तियों की अंत्येष्ठी पहले इस प्रकार का कृत्य सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों तक सीमित था बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रूप में रावण-दहन कि परम्परा थी , कालांतर में राजनीतिक और प्रशासनिक व्यक्तियों के द्वारा किए गए ग़लत कार्यों के विरोध में जनता द्वारा किए जाने वाले विरोध के रूप में हुआ पुतला-दहन धीरे - धीरे अपनी सीमाओं को लांघता चला गया आज नेताओं के अलावा महेंद्र सिंह धौनी से लेकर सलमान खान तक के पुतले जलते हैं मगर छ्त्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक बाप ने अपनी जिंदा बेटी का पुतला जलाकर पुतला - दहन की परम्परा को राजनीतिक से पारिवारिक कर दिया और इसका बहुत ही मार्मिक विश्लेषण किया है शरद कोकास ने अपने ब्लॉग पास-पड़ोस पर दिनांक २४.०७.२००९ को प्रेम के दुश्मन शीर्षक से






इस खबर के अनुसार " बेटी के प्रेम विवाह से क्षुब्ध होकर प्रधान आरक्षक पिता ने सिर्फ पुत्री का पुतला बनाकर विधिवत दाह संस्कार किया बल्कि बाकायदा शोक पत्र छपवाकर मुंडन संस्कार भी करवाया इस मामले मे हाँलाकि बाद में पति बने प्रेमी के साथ पकडाई युवती को अदालत मे पेश किये जाने के बाद उसके बालिग होने के चलते मर्ज़ी से कहीं भी रहने के आदेश हुए हैं जिसके बाद से वह अपने पति के साथ ही रह रही है "






शरद कहते हैं ,कि- "बेटी के प्रेम विवाह से आहत पिता का यह कदम आश्चर्य जनक तो है ,हमारी उनसे सहानुभुति भी है लेकिन हम उम्मीद करते है कि जैसे फिल्मों में होता है कि वही बेटी, जिसका बहिष्कार किया गया अंत मे अपने पिता के काम आती है और दामाद बेटे से बढकर साथ देता है ।इस दुखी पिता के साथ भी ऐसा ही हो और इस तरह हैप्पी एंडिंग के साथ दोनो का संसार सुखी हो यह शुभकामना "




प्रेम विवाह से क्षुब्ध एक बाप अपनी जिन्दा बेटी का पुतला जला देता है उसकी शव यात्रा निकालता है शरद कहते हैं की पहली बार किसी को मृत देख इन्सान हैरान रह गया होगा सवाल पूछा होगा की इस शिथिल शारीर को हो क्या गया है तब से मृत्यु के किस्से चले और परंपराएँ बनी



इस ब्लॉग के कुछ और महत्वपूर्ण पोस्ट है, जिसे पढ़ने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जायेंगे वह है - "ब्लॉग पर लिखते हुए रो रहा हूँ मैं / कवि और कविता से डरा भी हूँ मैं /होता जरूर है एक और जन्म आपका आदि .....!"ब्लोगिंग जगत में जमीनी और सार्थक लेखन करने वाला शरद कोकास के और ब्लॉग है-इतिहास विषयक आलोचना विषयक विज्ञान विषयक और साहित्य विषयक....


इनके सभी ब्लॉग पर एकबारगी नज़र दौडाई जाए तो यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि शरद किसी डायरी की तरह समाज की बातें लिखते हैंपुरातत्व के विद्यार्थी होने के कारण समाज, इतिहास और किस्सों को मिलकर पुरातत्व के किस्सों को सजीव बनाते हैंसबसे मजे की बात तो यह है कि शरद प्रसिद्द पुरातत्ववेता विक्रम श्रीधर के साथ काम करने के अनुभवों को हिन्दी में ब्लॉग पर उतर रहे हैंइतिहास का यह हिस्सा जटिल अंग्रेजी में लीखे जाने के कारन आम लोगों कि दिलचस्पियों से दूर हो गया है , जिसे शरद किस्से में बदलकर जनसुलभ करा रहे हैं


इनके सभी ब्लॉग गंभीर है और इन पर अनेकों गंभीर विषयों को बड़े सहज ढंग से उठाया गया है । इनके ब्लॉग कर्म और अकर्म के बीच मानवीय भावनाओं के अंतर्विरोधों को आयामित करते हुए दिखाई देते है । अज का सच क्या है ? जानना हो तो इनके ब्लॉग पर एक बार अवश्य आईये …..




आप ब्लॉग पढिये तबतक हम लेते हैं एक अल्पविराम .....!

17 comments:

  1. गजब की नजर है आपकी .. आपने उनके ब्‍लोगों के बारे में कमाल का विश्‍लेषण किया है .. गंभीर विषयों का सहज ढंग से प्रस्‍तुतीकरण .. सचमुच यही खासियत है उनकी .. शरद कोकास जी को बधाई !!

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  2. क्या बात है-गजब का अवलोकन...बधाई !

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  3. शरद जी हमारे प्रिय चिट्ठाकार हैं..आपने बहुत सही चयन और विश्लेषण किया है. आप दोनों को शुभकामनाएँ.

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  4. शुक्रिया
    शरद जी पर
    सभी के लिए
    आपका आलेखन...!!
    साधू साधू ....
    शरद जी को बधाइयां

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  5. बहुत सुंदर समीक्षा। मेरी सुबह की टिप्पणी की पुष्टि करती हुई।

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  6. आपकी यह श्रृंखला निर्देशिका का काम कर सकती है। सराहनीय विश्‍लेषण।.. शरद कोकास जी को बधाई !!

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  7. एक्दम निष्पक्ष । अच्छा आंकलन। शरद जी को बधाई, उनके सफ़ल लेखन पर!!

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  8. शरद कोकस उन चंद ब्लोगर्स में हैं जिनके वजह से हिंदी चिट्ठाकारी को न केवल विशिष्टता मिलती है वरन इसमे एक संयुक्त परिवार जैसी भावना भी आकार पाकर बाकायदा पुष्पित और पल्लवित हो रही है, मै कोकास जी के प्रशंसकों में हूँ और निजी तौर पर उनके 'परिकल्पना' में होने पर हर्षित हूँ...धन्यवाद रविन्द्र जी...

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  9. शरद जी हार्दिक बधाई - आपका आभार -
    हमारी, 100% सहमति
    विनीत,
    - लावण्या

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  10. पता नहीं कैसे अब तक इस अद्‍भुत ब्लौग से अब तक अछूता था मैं। निःस्वार्थ भाव से इतना नायाब विश्लेषण...आहहा !

    शरद जी के तो हम सब फैन हैं।

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  11. सबसे पहले मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ श्री रवीन्द्र प्रभात जी के प्रति जिनकी पारखी नज़र ने न केवल मेरे पाँचो ब्लॉग्स मे लिखी मेरी पोस्ट का विश्लेशण किया बल्कि उनमे अंतर्निहित मेरी दृष्टि और मेरे उद्देश्य को भी व्यापकता प्रदान की । मूल रूप से मै प्रिंट मीडिया से जुड़ा हूँ और अपने कविता संग्रहों तथा पत्रिकाऑ मे प्रकाशित होने वाली कविताओं व लेखों पर मुझे व्यापक प्रतिक्रिया मिलती है । लेकिन इस माध्यम में आने पर मुझे जो सबसे अधिक मिला वह आप सभी लोगों का प्यार और सान्निध्य । त्वरित प्रतिक्रिया के अलावा यहाँ आपसी सम्वाद की जो परम्परा है उसकी तुलना अन्य किसी माध्यम से नहीं की जा सकती । लेखन के अलावा भी एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होने की इस परम्परा की तो मिसाल दी जा सकती है। संगीता पुरी जी , माला जी, पूर्णिमा जी,समीर लाल जी, गिरीश बिल्लोरे जी,राजेव तनेजा जी,द्विवेदी जी,गीतकार जी,नीलिमा जी,ओम आर्य जी,प्रेशाद जी,श्रीश जी,लावण्या जी,हिमांशु जी, गौतम जी, अरविन्द जी,वन्दना जी, लवली जी पाबला जी अजित वड्नेरकर जी ज्ञानदत्त जी और मेरे अनुज महफूज, दीपक , सागर ,अजय गिरिजेश राव,खुशदीप,संजीव तिवारी और भी बहुत सारे मित्र जो यहाँ पहुंच नहीं पाये है लेकिन मेरे ब्लॉग्स पर निरंतर जिनकी उपस्थिति रहती है उन सबके प्रति भी मै हृदय से आभार व्यक्त करना चाहता हूँ । मेरी कोशिश रहेगी कि साहित्य जगत और ब्लॉग जगत के लेखकों के बीच मै एक पुल का काम कर सकूं और इस माध्यम की अच्छाईयों को वैश्विक स्तर पर वरिष्ठ लोगों के सामने रख सकूँ । उम्मीद है यह साथ हमेशा बना रहेगा ।पुन: आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद ।रवीन्द्र जी स्नेह बनाये रखें । - भवदीय शरद कोकास

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  12. शरद जी के चिट्ठों तक देर से पहुंचा !! अब कुछ दिन पहले से ही उनके पुरातत्व और इतिहास वाले चिट्ठे को खंगाल रहा हूँ!

    अचानक उनका जिक्र देखकर अच्छा लगा !!!!!!!!!

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