वर्ष -२००८ में २६/११ की घटना को लेकर हिन्दी ब्लॉग जगत काफ़ी गंभीर रहा । आतंकवादी घटना की घोर भर्त्सना हुयी और यह उस वर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा बना , मगर इस वर्ष यानि २००९ में जिस घटना को लेकर सबसे ज्यादा बबाल हुआ वह है समलैंगिकता के पक्ष में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला ।पहली बार हिन्दुस्तान ने समलैंगिकता के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस किया है। हिन्दी ब्लॉग जगत ने भी इसके पक्ष विपक्ष में बयान दिए और देश में समलैंगिकता पर बहस एकबारगी सतह पर आ गई ।

किसी ने कहा कि लैंगिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान आधुनिक नागरिक समाज में नही है , पर लैंगिक मर्यादाओं के भी अपने तकाजे रहे हैं और इसका निर्वाह भी हर देश कल में होता रहा है तो किसी ने कहा कि भारतीय दंड विधान की धारा -३७७ जैसे दकियानूसी कानून की आड़ में भारत के सम लैंगिक और ट्रांसजेंदर लोगों को अकारण अपराधी माना जाता रहा है, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने किसी भी प्रकार के यौन और जेंडर रुझानों से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के अधिकार को मान्यता देने का ऐतिहासिक कार्य किया है तो किसी ने कहा की यह विड्न्बना ही कहा जायेगा की अंग्रेजों द्वारा १८६० में बनाया गया यह कानून ख़ुद इंगलैंड के कानूनी किताबों में से सालो पहले मिट चुका ,लेकिन भारत में यह उनके जाने के बाद भी दसकों तक कायम है....आदि ।


रेखा की दुनिया ने अपने ०९ जुलाई २००९ के अंक में समलैगिकता की जोरदार वकालत करते हुए लिखा है जिस देश में कामसूत्र की रचना हुयी आज उसी धरती पर वात्स्यायन के बन्शज काम संवंधी अभिरुचि को बेकाम ठहराने पर लगे हैं ......!" घ्रृणा के इस दोहरे मापदंड पर उनका गुस्सा देखने लायक है इस आलेख में ।


महाशक्ति के दिनांक २९.०७.२००९ के आलेखका शीर्षक है समलैंगिंक बनो पर अजीब रिश्‍ते को विवाह का नाम न दो, विवाह को गाली मत दो । परमेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं की वह दृश्‍य बड़ा भयावह होगा जब लोग केवल आप्रकृतिक सेक्स के लिये समलैगिंक विवाह करेगे, अर्थात संतान की इच्‍छा विवाह का आधार नही होगा। अपने ब्लॉग पर अंशुमाल रस्तोगी कहते हैं कि अब धर्मगुरु तय करेंगे कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।


नया जमाना के १६ अगस्त २००९ के पोस्ट वात्‍स्‍यायन,मि‍शेल फूको और कामुकता (2) के अनुसार समलैंगिकों की एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में फूको ने कहा 'कामुकता' को 'दो पुरूषों के प्रेम' के साथ जोड़ना समस्यामूलक और आपत्तिजनक है। ''अन्य को जब हम यह एक छूट देते हैं कि समलैंगिता को शुध्दत: तात्कालिक आनंद के रूप में पेश किया जाए, दो युवक गली में मिलते हैं, एक- दूसरे को आंखों से रिझाते हैं, एक-दूसरे के हाथ एक-दूसरे के गुप्तांग में कुछ मिनट के लिए दिए रहते हैं। इससे समलैंगिकता की साफ सुथरी छवि नष्ट हो जाती है।


दस्तक ने अपने ११ July २००९ के पोस्ट में टी.वी चैनलों का उमडता गे प्रेम... पर चिंता व्यक्त की है । कहा है कि २ जुलाई का दिन दिल्ली हाई कोर्ट का वह आदेश पूरा मीडिया जगत के शब्दों में कहें तो खेलनें वाला मु्द्दा दे गया । जी हॉ हम बात कर रहें हैं हाई कोर्ट के उस आदेश का जिसमें देश में अपनें मर्जी से समलैगिंक संबंध को मंजूरी दे दी गयी थी । ठीक हॉ भाई समलैंगिको मंजूरी मिली। उनको राहत मिला । पर उनका क्या जिनका चैन हराम हो गया । आखिर जो गे नहीं उनकी तो शामत आ गई । इधर चैनल वालों को ऐसा मसाला मिल गया जिसकों कोई भी चैनल नें छोड़ना उमदा नहीं समझा । उधर इस चक्कर और दूसरें मुद्दे जरूर छूट गए ।


दिलीप के दलान से July १० , २००९ को एक घटना का जिक्र आया की घर की घंटी बजी साथ साथ बहुत लोगों की । अंदर से गुड्डी दौड़ती हुई झट से दरवाजा खोली । बाहर खड़े भैया ने गुड्डी से कहा गुड्डी ये तुम्हारी भाभी हैं । गुड्डी के चेहरें पर खुशी के जगह बारह बज गए और वह फिर दोबारा जितनी तेजी से दौड़ती हुई आयी थी उतनी तेजी से वापस दौड़ती हुई मॉ के पास गयी । और मॉ से बोली मॉ भैया ... आपके लिए भैया लेके आए हैं । परिकल्पना पर भी मंगलवार, २८ जुलाई २००९ को ऐसी ही एक घटना का जिक्र था जिसका शीर्षक था -शर्मा जी के घर आने वाली है मूंछों वाली वहू ...बहूभोज में आप भी आमंत्रित हैं .


बात कुछ ऐसी है के ७ जुलाई २००९ के एक पोस्ट यहां आसानी से पूरी होती है समलैगिक साथी की तलाश में यह रहस्योद्घाटन किया गया है की क्लबों, बार, रेस्टोरेंट व डिस्कोथेक में होती है साप्ताहिक पार्टियां।पिछले 10 वर्ष से लगातार बढ़ रही है समलैंगिक प्रवृति । पिछले छह वर्ष में बढ़ा है समलैंगिकता का चलन । समलैगिकों में 16 से 30 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की संख्या अधिकदक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में होती हैं । यह प्रवृतिअप्राकृतिक संबधों को गलत नहीं मानते समलैंगिक
।उनके लिए प्यार का अहसास भी अलग है और यौन संतुष्टि की परिभाषा भी अलग है। समलिंगी साथी के आकर्षण का सामीप्य ही उन्हें चरम सुख प्रदान करता है तभी तो चढ़ती उम्र में वह एक ऐसी हमराही की तलाश करते हैं जो तलाश उन्हें आम आदमी से कुछ अलग करती है।



इस सन्दर्भ में भड़ास के तेवर कुछ ज्यादा तीखे दिखे जिसमें उसने स्पष्ट कहा की समलैंगिकता स्वीकार्य नही बल्कि उपचार्य हैमोहल्‍ला का समलेंगिकता पर क़ानून की मोहर से प्रकाशित शीर्षक में कहा गया है की नैतिकता ये कहती है कि यौन संबंधों का उद्देश्य संतानोत्पत्ति है, लेकिन समलेंगिक या ओरल इंटरकोर्स में यह असंभव है। वहीं ब्लॉग खेती-बाड़ी के दिनांक ०५ जुलाई २००९ के एक पोस्ट में समलैंगिकता के सवाल पर बीबीसी हिन्‍दी ब्‍लॉग पर राजेश प्रियदर्शी की एक बहुत ही यथार्थ टिप्‍पणी आयी है, जो थोड़ा असहज करनेवाला है....लेकिन समलैंगिक मान्‍यताओं वाले समाज में इन दृश्‍यों से आप बच कैसे सकते हैं?

बहरहाल आप पढ़ें राजेश प्रियदर्शी के विचारों को तबतक हम लेते हैं एक छोटा सा विराम .....!

10 comments:

  1. समलैंगिकता के सन्दर्भ में नया जमाना के १६ अगस्त २००९ के पोस्ट समस्यामूलक और आपत्तिजनक है से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है, क्योंकि समलैंगिकता की वकालत करने वाले और खुद को इस समुदाय का हिस्सा बताने वाले अपने पक्ष में जो बड़े-बड़े दाबे करते हैं उससे उनके प्रति सहानुभूति होती है पर उनके दावों की छानबीन से तसवीर के दूसरे रूख का पता चलता है .कम से कम भारतीय संस्कृति इस दृष्टिकोण को नहीं पचा सकती . खैर हम तो केवल राय ही प्रकट कर सकते हैं जो कुछ भी करना है समाज के रहनुमाओं को ही करना है ...!

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  2. बीबीसी हिन्‍दी ब्‍लॉग पर राजेश प्रियदर्शी के विचार बड़ा भयावह है। सुंदर समीक्षा,आपके मेहनत भरे इस महत्वपूर्ण कार्य को मेरा प्रणाम !

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  3. हमने भी अपने ब्लाॅग www.vyangya.blog.co.in पर पोस्ट किया है,"सावधान समलैंगिक काल प्रारम्भ हो रहा है"। उसे भी तो देखिए।
    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in

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  4. श्री रविन्‍द्र जी आपके द्वारा किया गया यह प्रयास बहुत अच्‍छा है। इस प्रकार के एक ही विषय के पुरातन लेखो को एक साथ लाना बहुत अच्‍छा है।

    बधाई

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  5. मान गये रविन्द्र जी आपकी पारखी नजर को...

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  6. बहुत अच्छा विश्लेषण चल रहा है पंकज जी ।

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  7. सचमुच प्रशंसनीय , आपको कोटिश: बधाईयाँ !
    पिछली कई कडि़यों को भी देखा। बहुत ही मेहनत और शोध कर विविध ब्‍लॉगों के बारे में जानकारी दे रहे हैं आप!!

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  8. अभी ही आपके सारे लेख देखे ..बहुत मेहनत की है आपने ..आपको साधुवाद

    समलैंगिकता पर एक अच्छा आलेख यह http://main-samay-hoon.blogspot.com/2009/07/blog-post_25.html भी था जो संभवतः आपसे छुट गया ..यह टिप्पणी सिर्फ इसलिए है की किसी पाठक को सुविधा होगी वहां तक जाने में.

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