..आज जिसप्रकार हिन्दी के चिट्ठाकार अपने लघु प्रयास से व्यापक प्रभामंडल बनाने में सफल हो रहे हैं, वह भी साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद , कम संतोष की बात नही है । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर उस ब्लोगर की महत्वपूर्ण भुमिका है जो बेहतर प्रस्तुतीकरण, गंभीर चिंतन, सम सामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि, सृजनात्मकता, समाज की कु संगतियों पर प्रहार और साहित्यिक- सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैं। ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हम सभी के लिए शुभ संकेत का द्योतक है ।
हम चर्चा करेंगे वर्ष -२००९ के उन महत्वपूर्ण चिट्ठों की जिनके पोस्ट पढ़ते हुए हमें महसूस हुआ कि यह विचित्र किंतु सत्य है । यानी आज की इस चर्चा में हम चौंकाने वाले उन आलेखों की बात करेंगे जिन्हें पढ़ने के बाद आप यह कहने को विवश हो जायेंगे कि क्या सचमुच ऐसा ही है ? आईये उत्सुकता बढ़ाने वाले आलेखों की शुरुआत करते हैं हम मसिजीवी पर जुलाई-२००९ में प्रकाशित पोस्ट ३८ लाख हिन्दी पृष्ठ इंटरनेट पर से । इस आलेख में यह बताया गया है कि -चौदह हजार एक सौ बाइस पुस्तकों के अड़तीस लाख छत्तीस हजार पॉंच सौ बत्तीस ..... हिन्दी के पृष्ठ । बेशक ये एक खजाना है जो हम सभी को उपलब्ध है ....बस एक क्लिक की दूरी पर ...!इस संकलन में कई दुर्लभ किताबें तक शामिल हैं ।
दूसरा आलेख जो सबसे ज्यादा चौंकाता है वह है -उन्मुक्त पर २८ जून को प्रकाशित आलेख सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य । इस आलेख में श्रृष्टि के सृजन से संवंधित अनेक प्रमाणिक तथ्यों की विवेचना की गई है । वैसे यह ब्लॉग कई महत्वपूर्ण जानकारियों का पिटारा है । प्रस्तुतीकरण अपने आप में अनोखा , अंदाज़ ज़रा हट के इस ब्लॉग की विशेषता है ।इस चिट्ठे की सबसे ख़ास बात जो समझ में आयी वह है ब्लोगर के विचारों की दृढ़ता और पूरी साफगोई के साथ अपनी बात रखने की कला ।
तीसरा आलेख जो हमें चौंकता है , वह है- रवि रतलामी का हिन्दी ब्लॉग पर ०६ अप्रैल को प्रकाशित पोस्ट चेतावनी: ऐडसेंस विज्ञापन कहीं आपको जेल की हवा न खिला दे । इसमे बताया गया है कि- ०५ अप्रैल को यानि कल इसी ब्लॉग में भारतीय समयानुसार शाम पांच से नौ बजे के बीच एक अश्लील विज्ञापन प्रकाशित होता रहा। विज्ञापन एडसेंस की तरफ से स्वचालित आ रहा था और उसमें रोमन हिन्दी में पुरुष जननांगों के लिए आमतौर पर अश्लील भाषा में इस्तेमाल किए जाने वाले की-वर्ड्स (जिसे संभवत गूगल सर्च में ज्यादा खोजा जाता है) का प्रयोग किया गया था ।
चौथा आलेख जो हमें चौंकता है वह है- अगड़म-बगड़म शैली के विचारक अलोक पुराणिक अपने ब्लॉग के दिनांक २६.०६.२००९ के एक पोस्ट के माध्यम से इस चौंकाने वाले शब्द का प्रयोग करते हैं कि -आतंकवादी आलू, कातिल कटहल…. । है न चौंकाने वाले शब्द ? उस देश में जहाँ पग-पग पर आतंकियों का खतरा महसूस किया जाता हो हम दैनिक उपयोग से संवंधित बस्तुओं को आतंकवादी कहें तो अतिश्योक्ति होगी हीं ।
लेकिन लेखक के कहने का अभिप्राय यह है कि -महंगाई जब बढ़ती है, तो टीवी पर न्यूज वगैरह में थोड़ी वैराइटी आ जाती है। वैसे तो टीवी चैनल थ्रिल मचाने के लिए कातिल कब्रिस्तान, चौकन्नी चुड़ैल टाइप सीरयल दिखाते हैं। पर तेज होती महंगाई के दिनों में हर शुक्रवार को महंगाई के आंकड़े दिखाना भर काफी होता है।
आतंकवादी आलू, कातिल कटहल, खौफनाक खरबूज, तूफानी तोरई जैसे प्रोग्राम अब रोज दिखते हैं। मतलब टीवी चैनलों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ रही है, वो सिर्फ आलू, तोरई के भाव भर दिखा रहे हैं। हम भी पुराने टाइप के हारर प्रोग्रामों से बच रहे हैं। अन्य शब्दों में कहें, तो कातिल कब्रिस्तान टाइप प्रोग्राम तो काल्पनिक हुआ करते थे, आतंकवादी आलू और कातिल कटहल के भाव हारर का रीयलटी शो हैं।

इसीप्रकार वर्ष-२००९ में मेरी दृष्टि कई अजीबो-गरीब पोस्ट पर गई । मसलन -एक हिंदुस्तानी की डायरी में १० फरबरी को प्रकाशित पोस्ट -हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं ..........प्रत्यक्षा पर २६ मार्च को प्रकाशित पोस्ट -तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ? .........विनय पत्रिका में २७ मार्च को प्रकाशित बहुत कठिन है अकेले रहना ..... निर्मल आनंद पर ०५ फरवरी को प्रकाशित आदमी के पास आँत नहीं है क्या? .........छुट-पुट पर ०२ जुलाई को प्रकाशित पोस्ट -इंटरनेट (अन्तरजाल) का प्रयोग – मौलिक अधिकार है" .........सामयिकी पर ०९ जनवरी को प्रकाशित आलेख -ज़माना स्ट्राइसैंड प्रभाव का..........आदि ।
ये सभी पोस्ट शीर्षक की दृष्टि से ही केवल अचंभित नही करते वल्कि विचारों की गहराई में डूबने को विवश भी करते है । कई आलेख तो ऐसे हैं जो गंभीर विमर्श को जन्म देने की गुंजायश रखते है ।

वर्ष -२००९ में मेरे द्वारा उन चिट्ठों का भी विश्लेषण किया गया है जो विगत वर्ष परिकल्पना के विश्लेषण में शीर्ष पर थे । उनके नाम है- ज्ञान दत्त पांडे का मानसिक हलचल /उड़न तस्तरी /सारथी /रवि रतलामी का ब्लॉग/दीपक भारतदीप की हिन्दी /तीसरा खंभा /आवाज़ /गत्यात्मक ज्योतिष /चक्रधर का चकल्लस /अनंत शब्द योग /शब्दों का सफर /भडास /रचनाकार/मोहल्ला /समय चक्र/ साईं ब्लॉग .आदि.....विश्लेषण का आधार था- -(1) बेहतर प्रस्तुतीकरण (2) ब्लॉग लेखन का उद्देश्य (3) विश्व बंधुत्व की भावना (4) भाषा का अनुशासन (5) चिंतन में शिष्टाचार (6) रचनात्मकता (7) सक्रियता (8)जागरूकता (9) आशावादिता (10) विचारों की प्रासंगिकता आदि !


उन्ही तथ्यों के आधार पर आगे क्रम में ५० चिट्ठों की चर्चा होगी और मैं विश्लेषण की पोटली लेकर पुन: आऊँगा आपके बीच...! मिलते हैं एक छोटे से विराम के बाद .....!

22 comments:

  1. अच्छी रोचक श्रंखला चल रही है !

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  2. आपकी मेहनत हमलोगों के लिए वरदान साबित हो रही है .. इतने भीड में से आप अच्‍छे अच्‍छे पोस्‍टों को हमारे सामने रख रहे हैं !!

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  3. जारी रखें विश्लेषण का यह क्रम ....अद्भुत विश्लेषण है यह !

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  4. सचमुच बेहतरीन विश्लेषण है यह !

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  5. आपका परिश्रम जाहिर है -चलते रहें !

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  6. सचमुच बेहतरीन विश्लेषण है . मेरे ब्लॉग 'समयचक्र" का उल्लेख करने के लिए आभारी हूँ .

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  7. एक शानदार विश्लेषण और कोशिश।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  8. बहुत बढिया श्रंखला.............सभी एक जगह पर ....एक रचनात्मक पहल.......धन्यवाद....

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  9. हिंदी चिट्ठों के बारे में इतनी विस्तृत और विवेचनात्मक चर्चा नियमित रूप से करने के लिए धन्यवाद.

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  10. हिन्दी चिट्ठाकारी निश्चय ही गतिशील है निरन्तर । आपकी यह विश्लेषण श्रृंखला नये ढंग से प्रस्तुत करती है चिट्टों एवं उनकी प्रविष्टियों को । आभार ।

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  11. रविन्द्र जी, आप हैरान करते हैं हर बार...कहाँ-कहाँ से ढूंढ़ कर निकाल रहे हैं आप ये तमाम पोस्ट। उफ़्फ़्फ़्फ़!

    लाजवाब...कुछ लिंक के लिये दिल से शुक्रिया!

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  12. चिट्ठो की चर्चा का यह सिलसिला अच्छा लगा. मेहनत का काम है लेकिन आप समय निकल कर कर रहे है, यह बड़ी बात है. बधाई. आप साहित्य, कला पर एकाग्र कुछ ब्लोगों को भी देख रहे होंगे.

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  13. रवीन्द्र जी, आपको लेखन पसन्द आता है इसके लिये शुक्रिया।

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  14. जो छूट गए उन्को सात्वना :)

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  15. बढ़िया विश्लेषण चल रहा है, आनन्ददायी एवं उपयोगी.

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  16. वाह बहुत अच्छी और सच्ची श्रृखंला.

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  17. "विश्लेषण का आधार था- -(1) बेहतर प्रस्तुतीकरण (2) ब्लॉग लेखन का उद्देश्य (3) विश्व बंधुत्व की भावना (4) भाषा का अनुशासन (5) चिंतन में शिष्टाचार (6) रचनात्मकता (7) सक्रियता (8)जागरूकता (9) आशावादिता (10) विचारों की प्रासंगिकता"

    शायद यही मुख्य तत्व हैं अच्छी ब्लॉग्गिंग के !!!
    जानकारी के लिए आभार !!

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  18. वाकई ये लेख बहुत ही उपयोगी है, हमेशा ऐग्रीगेटरो के बल पर इन्‍हे पढ़ पाना कठिन होता है, किन्‍तु जब चिट्ठी और चिट्ठा चर्चा जैसे ब्‍लागो के कारण इनके लिंक आसानी से मिल जाते है जैसे आपने उपलब्‍ध करवाये है।

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