फगुनाहट की आहट मात्र से ही प्रकृति सुन्दरी अपने अतुल और समस्त वैभव संजोकर मानव जीवन को सर्वाधिक आनन्द, उल्लास एवं सरसता प्रदान करने एवं प्राणी मात्र को समस्त दु:खों से उन्मुक्त कर नव जीवन की आनंदानुभूति देने के लिए अपने शांत, स्निग्ध , स्वक्ष शीतल , मंद, सुगंध एवं विविध बयार के साथ स्वागतार्थ खडी है ! देखिये उस वसंत का स्वागत कुछ अलग अंदाज में कैसे कर रहे हैं श्री गजानन सिंह नम्र , श्री आनन्द शर्मा जी तो फागुन से इतने रंग न घोलने का निवेदन कर राहे हैं वहीं श्री आनन्द विल्थारे फगुनाहट की मस्ती को कुछ अलग अंदाज में वयां कर रहे हैं ...वसंतोत्सव में हम आज लेकर आये हैं गजानन सिंह 'नम्र', आनन्द विल्थरे और आनंद शर्मा की कविता ! आईये उनकी कविताओं में ढूँढते हैं वसंत को ...!



!!मस्ती !!

() () आनन्द विल्थरे

वसंत के
विस्तरे पर लेटा फागुन
मेरे भी दिल में
आग भड़का रहा है
काश, हम उसे
समझा पाते
कि गीली बारूद के पीछे
मिहनत  करने से कोई
लाभ नहीं है,
लेकिन वह तो
अपनी ही धुन में
भर-भर कटोरे
मस्ती छलका रहा है !
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!! स्वागत वसंत !!


() गजानन सिंह 'नम्र'
 
शीतल समीर में, प्रकृति के चीर में ,
धरती शरीर में,  विचारा वसंत है !


पल्लव पराग में, पुष्प अनुराग में,
मोहक से बाग़ में, उभरा वसंत है !


आम्र के श्रृंगार में, नीर के आगार में,
तारों की बरात में, उजाला वसंत है !


उषा की ललाई में, रवि अरुणाई में ,
शशि अंगराई में, निखारा वसंत है !


जीवन संगीत में, मानव की प्रीत में
भ्रमरों के गीत में, बिखरा वसंत है!


नवल आकाश में, कोमल सी घास में,
मन के विशवास में,  लहरा वसंत है !


शोभा के स्वरुप में, किर्निली धुप में,
'नम्र' जग अनूप में,  उतरा वसंत है!


!! एक गीत फागुनी गंध का !!

() आनंद शर्मा

पीली पडी धरा की देह
फागुन इतने रंग न घोल!


जमीन बर्फ कुछ तो पिघला दे
माथा ठंडा है, सहला दे,
होते दीवारों के कान-
फागुन हौले-हौले बोल!


पीली पडी धरा की देह
फागुन इतने रंग न घोल!


तू अग्रज रसवान क्षणों का
मैं अतीत का बोझिल झोंका ,
रख दरवाजे बंद और-
वह खिड़की भी मत खोल !


पीली पडी धरा की देह
फागुन इतने रंग न घोल!



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परिकल्पना पर जारी है " बसंतोत्सव " .... बहेगी बसंत की मादकता के साथ-साथ फगुनाहट की बयार होली तक लगातार .... और थमेगी होली की मस्ती के साथ...... इसके अंतर्गत हिंदी के कालजयी साहित्यकारों के साथ- साथ आज के कुछ महत्वपूर्ण कवियों की वसंत पर आधारित कवितायें प्रस्तुत की जा रही हैं...... इसमें कवितायें भी है , व्यंग्य भी , ग़ज़ल भी , दोहे भी और वसंत की मादकता से सराबोर गीत भी . इस श्रृंखला में हम देंगे आपकी भी स्तरीय रचनाओं को सम्मान और प्रकाशित करेंगे परिकल्पना पर ...शर्त है कि आपकी रचना बड़ी न हो !


तो देर किस बात की आप अपनी वसंत की मादकता से परिपूर्ण एक छोटी रचना चाहे वह व्यंग्य हो , कविता हो , गीत हो अथवा ग़ज़ल..... यूनिकोड में टाईप कर भेज दीजिये निम्न लिखित ई-मेल आई डी पर - mailto:ravindra.prabhat@gmail.com

6 comments:

  1. आनंद शर्मा का गीत वाकई मनमोहक है , अब महसूस हो रहा है कि आपका यह वसंत उत्सव नए आयाम की ओर अग्रसर है, बधाईयाँ!

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  2. बसंत की मादकता के साथ-साथ फगुनाहट की बयार का एहसास कराता हुआ पोस्ट !

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  3. आनन्द जी की रचना तो लाजवाब है । इस सुन्दर मनोरम रचना की प्रस्तुति का आभार ।

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  4. तीनों कवितायें सुन्दर है विल्कुल फगुनाहट की तरह !

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  5. इन सुन्दर रचनाओं में मानो वसंत को शरीर ही मिल गया हो.

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