...वसंतोत्सव में हम आज लेकर आये हैं कुँवर बेचैन  और नरेन्द्र शर्मा के गीत और रामेश्वर कंबोज "हिमांशु" के दोहे ! कुँअर बेचैन ग़ज़ल लिखने वालों में ताज़े और सजग रचनाकारों में से हैं। उन्होंने आधुनिक ग़ज़ल को समकालीन जामा पहनाते हुए आम आदमी के दैनिक जीवन से जोड़ा है। यही कारण है कि वे नीरज के बाद मंच पर सराहे जाने वाले कवियों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने गीतों में भी इसी परंपरा को कायम रखा है।वहीं नरेन्द्र शर्मा के गीतों ने हिन्दी को समृद्ध करने में अप्रतीम भूमिका निभायी है । रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' समकालीन हिन्दी कविता के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं जिन्होंने अतुकांत कविता के इस दौर में दोहों-ग़ज़लों और गीतों के माध्यम से अपने होने का एहसास कराया है । आईये इन गीतों और  दोहों  में ढूँढते हैं वसंत को ...!













!! ओ वासंती पवन हमारे घर आना !!
  • कुँवर बेचैन
बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!




जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!




एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन  उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!




पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
() () ()




वासंती दोहे / रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु


वसन्त द्वारे है खडा़, मधुर मधुर मुस्कान ।
साँसों में सौरभ घुला, जग भर से अनजान ।।




चिहुँक रही सुनसान में, सुधियों की हर डाल ।
भूल न पाया आज तक, अधर छुअन वह भाल ।।




जगा चाँद है देर तक, आज नदी के कूल ।
लगता फिर से गड़ गया उर में तीखा शूल ।।




मौसम बना बहेलिया, जीना- मरना खेल ।
घायल पाखी हो गए, ऐसी लगी गुलेल ।।




अँजुरी खाली रह गई, बिखर गये सब फूल ।
उनके बिन मधुमास में, उपवन लगते शूल।।
() () ()


वासन्ती गीत / नरेन्द्र शर्मा

मैं गीत लिखूँ, तुम गाओ!
मेरे बौरे रसालवन-से मन में कोयल बन जाओ!

जो दबी दबी इच्छाएँ थीं, उमड़ी हैं बन पल्लव-लाली,
भावों से भरे हृदय-सी ही काँपी-थिरकी डाली डाली!
स्वर देकर मौन मूक मुझको, मन में संगीत बसाओ!

मंजरित आम्र की मधुर गंध में उठी झूमती अभिलाषा,
पल्लव के कोमल रंगों में है झूल रही मेरी आशा;
क्या क्या मेरे मन-कानन में तुम गा गा कर बतलाओ!

मेरे रोमों से गीत खिलें, किरणें फूटें जैसे रवि से,
रसभरे पके अँगूरों-से हों मधुर शब्द मेरे कवि के,
जीवन का खारा जल मधु हो, जब तुम अधरों पर लाओ!

पतझर-वसन्त, पतझर-वसन्त--इस क्रम का होगा कहीं अंत?
हैं इने-गिने जीवन के दिन, है जग-जीवन का क्रम अनंत!
अनगाए रह जाएँगे गाने, आओ, मिल कर गाओ!
() () ()

14 comments:

  1. कुंवर बेचैन जी को पढ़ने के बाद भला कौन रोमांचित नहीं होगा ....अच्छी लगी यह पोस्ट !

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  2. कुँअर जी की सहजता बाँधती है -
    "बहुत दिनों के बाद साँकले खोली हैं
    ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।"

    तीनों रचनाकारों की उत्कृष्ट रचनायें प्रस्तुत की हैं आपने । सुन्दर चल रहा है यह वसंत-गान ! आभार ।

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  3. कुअंर जी हिमाँशू जे और नरेन्द्र शर्मा जी की रचनायें पढ कर मन बसंती हो गया । धन्यवाद इस सुन्दर प्रस्तुति के लिये।

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  4. बहुत सुंदर रचनाएं हैं .. प्रेषित करने के लिए धन्‍यवाद !!

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  5. तीनों ही रचनाएँ उत्कृष्ट!! आनन्द आ गया दिग्गजों को पढ़, वाह! शानदार पोस्ट, बधाई.

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  6. आपके ब्लॉग पर सचमुच फागुनी हवाएँ बह रही है . जब भी आओ मान रोमांचित हो जाता है आपका आभार !

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  7. कुवंर वेचैन जी के गीतों क़ा दीवाना तो समूचा हिन्दी जगत है अच्छा लगा पढ़कर !

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  8. Kubsurat Rachnayen...yahan Portblair men baithkar Vasant ki fagunahat ko in kavitaon ke madhyam se mahsus kar sakti hoon.

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  9. tino rachnakaron ki rachnayen bahut pasnd aayi..meri or sabko bahut 2 badhai...

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  10. कम्बोज जी, कुंवर बेचैन जी और नरेन्द्र जी, तीनों की रचना बहुत पसंद आई| आप तीनों को बहुत बहुत बधाई|

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