मैं समय हूँ !


इस अवसर पर आज मुझे याद आ रही है महाप्राण निराला की वो पंक्तियाँ-

यह सच है-
तुमने जो दिया दान दान वह,
हिंदी के हित का अभिमान वह,
जनता का जन-ताका ज्ञान वह,
सच्चा कल्याण वह अथच है-
यह सच है !

बार बार हार हार मैं गया,
खोजा जो हार क्षार में नया,
उडी धुल, तन सारा भर गया,
नहीं फूल, जीवन अविकच है -
यह सच है !
 
यहाँ महाप्राण निराला की पंक्तियों को उद्धृत करने के पीछे उद्देश्य यह है,कि हिंदी के उन्नयन की दिशा में हमारा प्रयास ऐसा न हो कि हमें बार बार हार जाना पड़े ...!
 
ब्लोगोत्सव का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब हिंदी चिट्ठाकारी में प्रस्तुत किये जा रहे शब्द अस्तित्व संकट में है, क्योंकि पढ़त कम हो रही है और खेमेवाजी ज्यादा . टी वी -विडिओ से टकटकी बांधे जीवन यापन करता मध्यवर्ग अब पठनीय नहीं, पलटनिय पत्रिकाओं को ही हाथ लगाता है ! यदि उसके हाथ से रिमोट कंट्रोल छूटकर कभी ब्लॉग जगत से साक्षात्कार हो भी गया तो उसे यह जानने की फिक्र नहीं कि उसका अपना रिमोट कंट्रोल किन हाथों में है ? वे कौन से हाथ है जो उसकी आशाओं-आकांक्षाओं को, स्वप्नों-संकल्पं को निर्मित-नियंत्रित कर रहे हैं - यह जानने की फिक्र यदि उसे नहीं है तो इस कारण भी सत्यार्थी बनकर अपनी आँखों को दाह देने की जगह मिथ्या छवियों के रुचिर संसार में जीना उसके सुविधापरस्त मानस को मुआफिक पड़ता है ...!
 
खैर यह तो व्यापक बहस का विषय है .....मगर आज मैं देख रहा हूँ हिंदी चिट्ठाकारी में गंभीर बहस को जन्म देने वाले वरिष्ठ चिट्ठाकार जी०के० अवधिया को मंच पर आते हुए उनसे हिंदी चिट्ठाकारी के विभिन्न पहलूओं पर बातचीत करने जा रहे हैं रवीन्द्र प्रभात !

चलिए चलते हैं कार्यक्रम की ओर .....यहाँ किलिक करें




उत्सव जारी है मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

4 comments:

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