बस से उतर कर शिवदास को समझ नहीं आ रहा था कि उसके गांव को कौन सा रास्ता मुड़ता है । पच्चीस वर्ष बाद वह अपने गाँव आ रहा था । जीवन के इतने वर्ष उसने जीवन को जानने के लिए लगा दिए, प्रभु को पाने के लिए लगा दिए । क्या जान पाया वह ? वह सोच रहा था कि अगर कोई उससे पूछे कि इतने समय में तुमने क्या पाया तो शायद उसके पास कोई जवाब नही । यूँ तो वह संत बन गया है, लोगों में उसका मान सम्मान भी है, उसके हजारों शिष्य भी है फिर भी वह जीवन से संतुष्ट नहीं है । क्या वह भौतिक पदार्थों के मोह से ऊपर उठ चुका है ? शायद नही ...... आश्रम में उसका वातानुकूल कमरा, हर सुख सुविधा से परिपूर्ण था । क्या काम, कोध्र, लोभ, मोह व अहंकार से ऊपर उठ चुका है ? ... नहीं...नहीं...अगर ऐसा होता तो आज घर आने की लालसा क्यों होती ? आज गांव क्यों आया है ? उसे अपना आकार बौना सा प्रतीत होने लगा । पच्चीस वर्ष पहले जहां से चला गया था वहीं तो खड़ा है । अपना घर, परिवार ..... गांव.... एक नज़र देखने का मोह नही छोड़ पाया है..........!



ये अंश हिंदी चिट्ठाकारिता के प्रमुख स्तंभ श्रीमती निर्मला कपिला की कहानी सच्ची साधना के हैं . आज हम लेकर आएं हैं श्रेष्ठ कहानियों की श्रेष्ठ श्रृंखला आपके लिए तो आईये श्रीमती सरस्वती प्रसाद  की कहानी के बाद चलते हैं निर्मला जी की कहानी सच्ची साधना की ओर .....यहाँ किलिक करें



उत्सव जारी है, मिलते हैं एक अल्पविराम के बाद

6 comments:

  1. चुनी हुई कहानियों के लिंक दे रहे हैं आप .. मैने पढी थी यह कहानी .. सचमुच सच्‍ची साधना वही है .. जो इस कहानी में बतायी गयी है .. आभार !!

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  2. एक गंभीर कहानी और उसमें सन्निहित सन्देश के लिए निर्मला जी को बहुत-बहुत धन्यवाद !

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  3. बहुत खूब, बहुत सुन्दर ....पढ़कर आनंद आ गया !

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  4. अति सुन्दर प्रस्तुति ...आभार !

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  5. बहुत खूब, बहुत सुन्दर .प्रस्तुति!निर्मला जी को बहुत-बहुत धन्यवाद !

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