जहां तक हिंदी का संबंध है, साहित्य और चिट्ठाकारिता का एक दूसरे के अभिन्न सहचर्य में ही विकास संभव है ! हिंदी के चर्चित चिट्ठाकार श्री प्रमोद ताम्बट का कहना है कि- ब्लॉग जगत एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ तमाम विरोधों के बावजूद नामी-दामी बुद्धिजीवी साहित्यकार भी आने का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। नौसीखिएँ लिख्खाड़ भी अपने दूध के दाँत यहीं आकर मजबूत कर रहे हैं। यहाँ संघवालों को भी खुली छूट है कि वे अपने राष्ट्रवादी विचारों को प्रचारित करें और वामपंथियों को भी मार्क्सवाद का झंडा फहराने की इजाज़त है, दलित भी यहाँ अपनी आवाज़ स्वतंत्रतापूर्वक उठा सकते हैं, ब्राम्हण-मनुवादी भी अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। जात, पात, भाषा, प्रांत के बंधन से मुक्त हर प्रकार का विचार यहाँ स्वतंत्रतापूर्वक अपनी दस्तक दे सकता है। हिन्दी ब्लॉगों पर ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं के ब्लॉगों पर भी सृजनप्रेमी पूरी शिद्दत से कार्टून, कविता, कहानी, व्यंग्य, ग़जल, रिपोर्ताज, यात्रा वर्णन, यहाँ तक कि पूरा का पूरा उपन्यास लेकर भी उपस्थित हैं। कई ब्लॉगों में देशभर में स्थानीय स्तर पर चल रहीं गतिविधियों, सत्ता संस्थानों में चल रही हलचलों, कला-संस्कृति के क्षेत्र की घटनाओं आदि की एकदम ताज़ा-ताज़ा रिपोर्टिंग भी देखी जा सकती है। तू-तू मैं-मैं गाली-गलौज, टाँग खिचाई, वस्त्रलोचन, आदि-आदि का 'रचनात्मक' कार्यक्रम भी खूब चलता रहता है। तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, गंडा-ताबीज से लेकर धार्मिक विचारों और घृणा का प्रचार-प्रसार भी यहाँ जोर-शोर से किया जाता रहता है। अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता दूसरे किसी माध्यम में उपलब्ध नहीं है। देखा जाए तो यह घातक भी है और फायदेमंद भी...........।



श्री प्रमोद ताम्बट का कहना है कि ब्लॉगिंग को परिवर्तन के हथियार के रूप में ढालने की ज़रूरत है......कैसे ? विस्तार से बता रहे हैं श्री प्रमोद ताम्बट............यहाँ किलिक करें




...........जारी है उत्सव मिलते हैं
एक अल्पविराम के बाद............

4 comments:

  1. जोरदार विचार मंथन -शुक्रिया

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  2. रवींद्र जी,
    प्रमोद जी के विचारों से रू-ब-रू कराने के लिए आभार...ब्लॉगोत्सव 2010 के लिए आपकी अथक मेहनत और रचनात्मकता के लिए साधुवाद...

    जय हिंद...

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  3. बाजार में जो माल उपलब्ध होगा वही बिकेगा

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