गर्म हवा के झोंके उदंडता पर उतारू होकर खिड़की किवाड़ पीट रहे थे ! पिघलती धूप में प्यासे कौवे की काँव  काँव  में घिघिआहट भरा विलाप शामिल था . मैं घर के काम-धाम से निबटकर हवा की झाँय-झाँय , सांय- सांय को अन्दर तक महसूसती अपने कमरे में लेटने की सोच ही रही थी कि गेट खुलने की आवाज़ आई .

उफ़ ! कौन होगा अभी ... सोच ही रही थी कि एक परिचित हांक कानों में आई- मूढ़ी है . आवाज़ ऐसी जैसे कह रही हो - आपको इंतज़ार था, लीजिये हम आ गए .........!




ये अंश कविवर पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की कहानी मुढीवाला के हैं, विस्तार से पढ़ने के लिए.............. यहाँ किलिक करें


उत्सव जारी है, मिलते हैं एक अल्पविराम के बाद 

3 comments:

  1. एक गंभीर कहानी और उसमें सन्निहित सन्देश के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !

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  2. बहुत खूब, बहुत सुन्दर ....पढ़कर आनंद आ गया !

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  3. अति सुन्दर प्रस्तुति ...आभार !

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