कार्यक्रम आज पूरे शबाब पर है, ग़ज़ल सुनने के बाद कुछ और सुनने की इच्छा नहीं हो रही है . तो चलिए चलते हैं ग़ज़ल गुरु पंकज सुबीर जी के पास . सुनते हैं उनकी आवाज़ में एक कविता, जिसकी भूमिका तैयार की है रविकांत पाण्डेय ने - ( किलिक करें)

मैं समय हूँ, मैंने हिंदी ब्लोगिंग में हिंदी का जयघोष करने वाले शास्त्री जे सी फिलिप को भी पढ़ा है और हिंदी चिट्ठाकारी को दिशा देने वाले रवि रतलामी को भी ...मैंने उड़न तश्तरी की अपार लोकप्रियता देखी है और ज्ञान दत्त पाण्डेय और दीपक भारतदीप के सुविचार को अन्दर तक महसूस किया है ....किन्तु एक साधक का आजतक रहस्य नहीं जान पाया . चिट्ठा-दर-चिट्ठा घूमता रहा और ढूँढता रहा उन्मुक्त की पहचान.... वो तो भला हो आयोजकों का जिन्होनें उन्मुक्त का पहली बार साक्षात्कार लिया है ....आईये चलते हैं रवीन्द्र प्रभात के पास उन्मुक्त के सुविचारों को महसूस करने .... ( किलिक करें)
 
  उत्सव जारी है, मिलते हैं एक विराम के बाद यानी 03 बजे परिकल्पना पर

3 comments:

  1. बहुत खूब..उत्सव अपने शवाब पर है...बधाइयाँ !!

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  2. पंकज मास्साब का स्वर, रविकान्त जी की भूमिका और उन्मुक्त जी जैसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व के विचार...अद्भुत संगम!! वाह!!

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  3. आनंद वर्षा में नहा लिए हम...शुक्रिया...
    नीरज

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