ब्लोगोत्सव के  चौदहवें दिन पैसे से संबंधित परिचर्चा रश्मि प्रभा जी के द्वारा आयोजित की गयी थी आज हम लेकर आये हैं शेफाली पांडे की कहानी  मजे का अर्थशास्त्र -
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लेखिका परिचय :-
नाम - शेफाली पांडे
शिक्षा - एम्. ए. अर्थशास्त्र एवं अंग्रेज़ी, एम् .एड.,[कुमायूं विश्विद्यालय, नैनीताल]
व्यवसाय - शिक्षण
निवास - हल्द्वानी, उत्तराखंड.
शौक - लिखना और पढ़ना.
आत्मकथ्य : उत्तराखंड के ग्रामीण अंचल के
एक सरकारी विद्यालय में कार्यरत, मैं अंग्रेजी
की अध्यापिका हूँ मेरा निवास-स्थान हल्द्वानी,
 ज़िला नैनीताल, उत्तराखंड है अपने आस-पास
घटित होने वाली घटनाओं से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती  है बचपन
में कविताओं से शुरू हुई मेरी लेखन -यात्रा कहानियों, लघुकथाओं इत्यादि
 से गुज़रते हुए 'व्यंग्य' नामक पड़ाव पर पहुँच चुकी है............

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जब भी वो मुझसे टकराती है मुझे याद दिलाना नहीं भूलती कि मैं कितने मज़े में हूँ. मैं ईश्वर के इस खेल को समझ नहीं पाती हूँ , मेरे लिए जो एक अमूर्त वस्तु है , उनके लिए वही मूर्त कैसे हो जाती है, ज़रूर ये सरकारी योजनाओं के सदृश्य हैं , जिनमें पैसा तो बहुत खर्च बहुत होता है, लेकिन किसी को दिखता नहीं. इसकी तुलना ओबामा के उन शाति प्रयासों से भी की जा सकती है , जो सिर्फ नोबेल देने वालों को दिखते हैं , दुनिया को नहीं . महिलाएं इसकी तुलना उस लडकी से कर सकती हैं जिसके इश्क के चर्चे सारे शहर में आम हों लेकिन, उसके घर वालों को लडकी के घर से भागने के बाद पता चले.

वह नौकरी नहीं करती, मैं करती हूँ , इस लिहाज़ से वह मुझे कुछ भी कहने की अधिकारिणी हो जाती है , मोहल्ले से हँसती - खिलखिलाती गुज़रती है , मुझे देखते ही उसे दुखों का नंगा तार छू जाता है . ''हाई ! तुम कितनी लक्की हो !तुम्हें देखकर जलन होती है'' का हथगोला मेरी ओर फेंककर, अपना कलेजा ठंडा करके वह आगे बढ़ लेती है.

वह कहती है कि उसे चाय पीते समय किसी का टोकना पसंद नहीं है, क्योंकि उसके साथ वह अखबार पढ़ती है ,फ़िल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों के लेटेस्ट अफेयर और फिल्मों की खबर के साथ - साथ सोने के हर दिन के भाव उसे मुँह ज़बानी याद रहते हैं. मेरी आधी चाय मेरे आँगन में लगा हुआ रबर प्लांट पीता है, जिस दिन स्वयं चाय की अंतिम बूँद का स्वाद लेने की सोचती हूँ उसी दिन बस छूट जाती है और मुझे अस्सी रूपये खर्चने पड़ते हैं, जिससे मुझे उसके व्यंग्य बाणों से भी ज्यादा तकलीफ होती है, लेकिन जब यह रबर प्लांट बड़ा हो जाएगा, तो मैं गर्व से कह सकूंगी कि ''बेटा'! तुझे मैंने अपनी चाय पिला कर बड़ा किया है''.बच्चों से नहीं कह पाउंगी , कभी कहने की कोशिश भी करूंगी तो पता है कि क्या ज़वाब मिलेगा ''कौन सा एहसान किया ? अपने माँ बाप का कर्जा ही तो चुकाया'' .

शेष एक अल्प विराम के बाद ........

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लेकिन उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां डा. सुभाष राय उपस्थित हैं अपने एक आलेख के साथ ............यहाँ किलिक करें
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5 comments:

  1. जिंदगी को नजदीक से दिखाती हुई कहानी। बधाई।

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  2. रोचक कहानी, शेष भाग की प्रतीक्षा।

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  3. उम्दा प्रस्तुती ,आपको अनेक शुभकामनायें /

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  4. पूरी कहानी बेहद अच्छी है
    बेहद सच्ची है
    बधाई क़ुबूल फरमाएं शेफाली जी इसके साथ ही रविन्द्र प्रभात जी को धन्यवाद कि उन्होंने एक अच्छी कहानी चुनी हमारे लिए

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  5. रोचक एवं भौचक करते तीखे कटाक्ष

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