" विश्व के हर देश में
देश के हर कोण में,
फलित है ये हिंदी ब्लॉग जगत -
एक लक्ष्य से जुड़ें सभी
व्योम के विस्तार सा
संसृति के विचार सा
सयंमित एक आचार सा
संतुलित हो व्यवहार सा....



एक ही स्वरूप में
सब जियें , सब लिखें,
यत्न करें संयुक्त रह
संयुक्त ही प्रयत्न कर
इस विधा को आयाम दें.

धैर्य धर के कल्पना को
सभी एकरूप आकार दें.
विश्व के हर प्रश्न का
एक स्वर में हो शमन,
आक्षेप करने वाले भी
एक स्वर में करें नमन.
संकीर्णता से दूर हों

आक्षेप न , आरोप हों,
अभिशाप हों जो समाज के
संयुक्त ध्वनि से विरोध हो.
प्रगति में हर दिशा का
दूर सदा अवरोध हों.
विश्व के विस्तार में
एक लघु रूप ये परिवार हो
सोच को बदल सकें
जब सबकी एक आवाज हो,
चारों दिशाएं गूँज उठें
हर तरफ एक सहकार हो.
अभिव्यक्ति हो ऐसी सदा
जहाँ न द्विअर्थ हो
न शैली जटिल
गीत के स्वरोंमें
प्रेम को बौछार हो
रीति हो एक प्रेम की
मन में गिले शिकवे न हों.
हम एक धर्म है
लेखन हमारा धर्म हो
दिशा सभी को दें सभी
बस प्रेम ही एक मर्म हो....! "


() रेखा श्रीवास्तव
http://kriwija.blogspot.com/
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इस सारगर्भित कविता से मैं आज के इस कार्यक्रम की शुरुआत कर रहा हूँ और आपको ले चल रहा हूँ कार्यक्रम स्थल की ओर जहां श्री मनोज कुमार जी गंगा सागर की यात्रा के बारे में अपने अनुभवों को बांटने जा रहे हैं .....यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

5 comments:

  1. प्रेम की गंगा
    और गंगा में
    गाना बहा दिया
    मन सबका
    सरसा दिया।

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  2. सुंदर विचार, सुंदर रचना। बहुत बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. उम्दा प्रस्तुती ,आपको अनेक शुभकामनायें /

    उत्तर देंहटाएं
  4. जहाँ न द्विअर्थ हो
    न शैली जटिल
    गीत के स्वरोंमें
    प्रेम को बौछार हो

    बहुत सुन्दर आदर्श स्थिति

    उत्तर देंहटाएं

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