आज का कार्यक्रम संपान्नता की ओर अग्रसर है...विगत कई दिनों से बच्चों के लिए उत्सव में कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं हो पाया, इसलिए आज  मैं केवल बच्चों के कार्यक्रम को लेकर आया हूँ , ताकि हमारे उत्सव के समग्र कार्यक्रम का संतुलन बना रहे ! आज बारहवें दिन के इस आख़िरी कार्यक्रम का श्री गणेश  डा. अरविन्द मिश्र की बाल विज्ञान कथा : राजू बन गया बैज्ञानिक से कर रहा हूँ .! इसके बाद मैं ले चलूँगा आपको कार्यक्रम स्थल की ओर जहां एक परिचर्चा आयोजित की गयी है , विषय है-  कोई लौटा दे वो बचपन .......और प्रख्यात चित्रकार श्री इमरोज उपस्थित हैं आज अपनी एक कविता के साथ .........!
 

बाल विज्ञान कथा :
!! राजू बन गया वैज्ञानिक !!



बच्चों को वैज्ञानिक शोध के लिए प्रोत्साहित करने के उíेश्य से भारत में पिछले कई वर्षों से ‘बाल विज्ञान काँग्रेस’ का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में किस तरह की शोध परियोजनाएँ प्रस्तुत हो सकती हैं, इसकी बानगी प्रस्तुत करती है यह विज्ञान कथा।

"जयपुर का प्रसिद्ध नेहरू उान सभागार। बाल विज्ञान काँगेस के पचासवें अधिवेशन में जब राजन वर्मा का नाम ‘साइंटिस्ट आWफ टुमारो’ एवार्ड के लिए पुकारा गया तो वहाँ उपस्थित उनके टीचर और दोस्तों को सहसा इसका विश्वास ही नहीं हुआ। वे पल भर के लिए तो स्तब्ध रह गये, किन्तु अगले ही पल सभागार के मूड को भाँपते हुए तालियाँ बजाने में मशगूल थे। तालियों की गड़गड़ाहट के बाद सभागार में पुन: नि:स्तब्धता छा गई। उद्घोषक की आवाज गूँज रही थी- "उ०प्र० के ध्ुार पूर्वी छोर के एक अचर्चित से जिले कुशीनगर के ग्रामीण परिवेश के कक्षा आठ के छात्र राजन वर्मा को इस बार के प्रतिष्ठित ‘साइटिस्ट आWफ टुमारों’ एवार्ड के लिए चुना गया है। इस नन्हें से छात्र ने एक ऐसी खोज कर डाली है, जो उम्र दराज वैज्ञानिकों की क्षमता को भी मात करती है। राजन ने मोनार्क तितली की एक नई प्रवासी प्रजाति की खोज की है जिस पर रूसी लेपिडोप्टेरिस्ट सोसायटी यानि कीट विज्ञानियों के संस्थान ने भी अपनी मुहर लगा दी है। इस बड़ी खोज के लिए विशेषज्ञों की समिति ने राजन को ‘ साइंटिस्ट आWफ टुमारो सम्मान के साथ ही, पच्चीस हजार रुपये नकद पुरस्कार के भी सर्वथा योग्य पाया है। जैसी परम्परा है, अब राजन की आगे की पढ़ाई का सारा खर्च भारत सरकार उठायेगी। आज शाम को राजन वर्मा अपने शोध कार्य को विस्तार से आपके सामने प्रस्तुत करेंगे, अब आगे कार्यक्रम की जानकारी के लिए मैं माईक संघ के अध्यक्ष को सौपता हूँ ... ..

अब तक राजन के क्लास टीचर और कांग्रेस में भाग लेने आये उसके चन्द दोस्तों को वास्तविकता का पूरा अहसास हो चुका था .... " अरे! राजू ने तो कमाल कर दिखाया"। वे उसे बधाई और शाबाशी देने को लपके। राजू तो पहले से ही बधाई देने वालों की भीड़ से घिरा था, उसके पास तक पहुँचने में उसके दोस्तों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
"तुमने तो कमाल कर दिखाया।"
"अपने देश का नाम रोशन कर दिया।"
"आखिर यह खोज तुमने की कैसे ... .."
"तुम्हारी खोज क्या ... ... "
अभी तक राजन में कोई दिलचस्पी न लेने वाले उसके दोस्त भी उससे तरह-तरह के सवाल कर रहे थे। हद तो तब हो गई जब उसके क्लास टीचर श्यामलाल गुप्ता ने भी ऐसा ही सवाल किया, "भई, राजू तुम्हारे इस काम को तो मैंने सरसरी तौर पर ही देखा था, मुझे नहीं पता था कि यह इतना इंपोर्टेन्ट है, तुम्हारी कीड़े-मकोड़ों में ज्यादा रुझान से तो हम तंग ही आ चुके थे ... ... पर तुमने तो सचमुच कमाल कर दिखाया है, हमारे स्कूल का नाम Åँचा कर दिया तुमने.....।" भावावेश में उन्होंने राजन को गले लगा लिया।
सभी को राजन के सायंकालीन व्याख्यान की उत्सुकता से प्रतीक्षा थी ... ... और वह पल भी आ पहुँचा। सभी को बाल विज्ञानी राजन का व्याख्यान सुनने की प्रबल उत्कंठा थी। सभागार खचाखच भरा था, किन्तु वहाँ छायी निस्तब्धता राजन को शीघ्र अपना व्याख्यान शुरू करने को मानो आमंत्रित कर रही थी। आखिर इन्तजार की घड़ियाँ बीतीं, राजन ने व्याख्यान शुरू किया- "आदरणीय गुरुजनों, मेरे साथी बाल विज्ञानी प्रतिभागियों! सबसे पहले तो मैं बाल विज्ञान काँगेस के इस बीसवें अधिवेशन के आयोजकों एवं साइंटिस्ट आWफ टुमारो सम्मान की निर्णायक समिति के प्रति अपना आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मुझे इस सम्मान के योग्य समझा है और आपके समक्ष अपने शोध कार्य को प्रस्तुत करने का गौरव प्रदान किया है ... .... मैं नहीं समझता कि मेरा कार्य सचमुच इतना महत्त्वपूर्ण है कि मुझे ऐसे सम्मान के योग्य समझा जाए और न ही मेरी कोई ऐसी आकांक्षा ही थी- मैंने तो बस अपनी रुचि के एक छोटे से विषय को इस अधिवेशन में प्रस्तुत करने के लिए चुना था ... ... आपसे एक अनुरोध है कि अपनी बात कहने में मुझे पन्द्रह मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा। इस बीच Ñपया कोई प्रश्न न पूँछे, मेरा ध्यान भंग न हो। इसके पश्चात् आप जो भी पूछेंगे मैं सहर्ष उत्तर दूँगा।"
पल भर के विराम के बाद राजन ने एल०एस०डी० प्रोजेक्शन के जरिये तितलियों की भिन्न-भिन्न जातियों के बारे में जानकारी देते हुए बड़े ही रोचक तरीके से मोनार्क तितली की इस प्रजाति के बारे में अपने शोध कार्य का ब्यौरा प्रस्तुत किया जो अब लुप्त प्राय है, किन्तु इक्का-दुक्का अभी भी उसके जिले में रूस से हजारों कि०मी० प्रवास यात्रा पर हर वर्ष आती हैं। व्याख्यान के दौरान सभागार में पूरी नि:स्तब्धता थी। लोग बड़े ही मनोयोग से उसके शोध को देख सुन रहे थे। पन्द्रह मिनट का समय सहसा बीत गया, लोगों को पता ही नहीं लगा। राजन के धन्यवाद कहने से मानो सभी की तन्द्रा टूटी, हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। संचालक द्वारा श्रोताओं से प्रश्न आमंत्रित करते ही जिज्ञासाओं का अंबार लग गया।
"आपकी कीट पतंगों में रुचि कैसे जगी?"
" आपने मोनार्क तितली को ही शोध के लिए क्यों चुना?"
"आपको कैसे पता चला कि तितली की यह प्रजाति रूस से यहाँ तक प्रवास यात्रा करती है? इसका क्या प्रमाण है?"
"Ñपया एक-एक कर प्रश्न पूछें। एक साथ इतने सवालों का जवाब कैसे सम्भव है? हाँ तो मास्टर राजन, Ñपया इन प्रश्नों का उत्तर देकर श्रोताओं की जिज्ञासा शांत कीजिए।" संचालक के इस हस्तक्षेप पर सभागार में पुन: शांति छा गई।"पहला प्रश्न था कि कीट-पतंगों में मेरी रुचि कैसे जगी-यह तो मुझमें शायद जन्म से ही है, मैं तरह-तरह के बीटल, तितलियों के प्रति एक सहज लगाव का अनुभव करता रहा हूँ, हाँ मेरी शायद इस प्रवृत्ति को पहचान कर इलाहाबाद विश्वविालय में पढ़ने वाले मेरे चाचाजी ने कीट पतंगों के बारे में मुझे काफी गाइड किया है, उन पर देशी-विदेशी लेखकों की कई पुस्तकें पढ़ने को मुझे दी हैं- प्रÑति के इन उपेक्षित जीवों को मेरी नजरें खोजती रहती हैं, जहाँ भी कोई अनोखा कीट दिखा, मैं उस पर तुरन्त ध्यान केन्द्रित करता हूँ, यह मेरा स्वभाव बन चुका है- इससे मेरे स्कूल के दोस्त भी काफी चिढ़ते हैं और कई बार तो मेरे क्लास टीचर सर ने भी डाँट पिलाई है ... ..." राजन की इस स्पष्टोäि पर सभागार में हल्का समवेत ठहाका गूँजा।
अब मैं दूसरे प्रश्न पर आता हूँ। मोनार्क तितली ही क्यों? शायद आप सभी को पता होगा तितलियों और पतंगों ;उवजीद्ध की कुल ज्ञात प्रजातियों की संख्या १,६५,००० के आसपास है, इसमें से केवल कुछ हजार प्रजातियाँ ही भारत में मिलती हैं, लेकिन इनके प्राÑतिक आवास, पर्यावरण के नष्ट होने से इन पर अस्तित्त्व का संकट आ गया है। इन्हीं में से एक तितली है- मोनार्क जो वैज्ञानिकों की शब्दावली में डैनेस वंश की है। यह मुझे बहुत आकर्षक लगती है- लेकिन पिछले पाँच वर्षो से मैंने पाया है कि इसकी संख्या में तेजी से गिरावट आयी है। ये पूरे वर्ष भर नहीं दिखती, बसन्त ऋतु के बाद ये न जाने कहाँ लुप्त हो जाती हैं। इसलिए ही दो वर्षो पहले मैंने वह प्रयोग किया जिसकी बदौलत आज मैं आपके सम्मुख यह व्याख्यान दे रहा हूँ।"
"वह कौन सा प्रयोग था?" सहसा समवेत जिज्ञासा उभरी।"मेरे इलाहाबाद विश्वविालय वाले चाचा जी ने बताया कि कई पशु-पक्षियों की तरह तितलियाँ भी लम्बी दूरी तक प्रवास करती हैं यानि एक देश से दूसरे देश तक जाती हैं। मेरे मन में यह जिज्ञासा जागी कि हो न हो मोनार्क तितली भी कहीं दूर देश से आती हो- यह जाँचने के लिए मैंने एक बहुत बारीक पारदर्शी पॉलीथिन के ५ मिमी० के टुकड़े पर अपना नाम पता लिखकर कुछ मोनार्क तितलियों के पँख के अन्दरूनी भाग पर चिपका कर उन्हें छोड़ दिया। इस आशा में कि कभी कहीं भी कोई इन्हें हो सकता है नोटिस कर ले तो शायद सूचित भी करे ... ...।
" लेकिन ऐसा भला कैसे सम्भव हुआ कि तितली के छोटे से पंख पर आपने उसका नाम पता लिख दिया? एक जिज्ञासा ने राजन को सहसा रोका। "जब एक चावल पर पूरी गीता लिखने का रिकार्ड है तो फिर ५ मि०मी० के टुकड़े पर नाम पता क्यों नहीं लिखा जा सकता।" श्रोताओं में से ही एक आवाज उभरी।
"जी हाँ, यह कोई मुश्किल काम नहीं है, बारीक निब की पेन से थोड़ा अभ्यास करने पर यह आसानी से सम्भव है। "हाँ मैं आप द्वारा पूछे तीसरे प्रश्न पर आता हूँ ...। मुझे पिछले वर्ष रूस चिटा प्रान्त के लेपिडोप्टेरिनियन्स सोसायटी (कीट पतंग अध्ययन समिति) के अध्यक्ष का एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें मेरे द्वारा चिन्हित की गई एक मोनार्क तितली के वहाँ पाये जाने की खुशखबरी थी- चिटा प्रान्त में जो मंगोलिया देश की सीमा से सटा एक प्रान्त है से तितली की बरामदगी से यह पुष्ट हो गया कि वहाँ तक तो इस तितली का भ्रमण क्षेत्र है ही... .... मैं अभी भी इस परियोजना पर काम कर रहा हूँ और आशा है कि अभी और भी दूरस्थ स्थानों तक इस तितली के भ्रमण पथ की जानकारी मिल सकेगी... ..."
"बहुत अच्छा ...... जस्ट ग्रेट! व्हाट ए गुड वर्क!" श्रोताओं के बीच से प्रशंसा के स्वर उभरे।ु "... ... बस अपने इस छोटे से कार्य को संकलित कर मैंने इस अधिवेशन में प्रस्तुत कर दिया ... ... मुझे आश्चर्य और प्रसन्नता है कि मुझे पुरस्कार योग्य चुना गया... ... धन्यवाद!" राजन अपने नियत स्थान पर जा बैठा। एक बार फिर से उसे बधाइयाँ देनेका सिलसिला शुरू हो गया। अन्तिम बधाई उसके कक्षा अध्यापक की थी ... ।
"वेल डन राजू, मैं तो सोचता था कि कीट-पतंगों में रुचि के कारण तुम्हारी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है ...... तुम्हारी शरारतों से सच कहो तो हम तंग भी आ गये थे ... .. किन्तु तुम्हारी मौलिक प्रतिभा की जानकारी तो अब हुई ... हम तो चाहते थे कि राजू बस जेंटलमैन बन जाए ... .. लेकिन तुम तो कई कदम और आगे बढ़कर एक वैज्ञानिक बन गये... भई, बधाई हो ... ...।" वहाँ उपस्थित लोगों के होठों पर मुस्कान थिरक उठी .....।
() डा. अरविन्द मिश्र
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इस विज्ञान कथा का आनंद लेने के बाद आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां कोई लौटा दे वो बचपन .......विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी है और उस परिचर्चा में शामिल हो रहे हैं कई साहित्यकार और चिट्ठाकार .........यहाँ किलिक करें
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और अब आईये इमरोज जी की एक ऐसी कविता से रूबरू होते हैं जिसके एक-एक शब्द अनमोल है ......यहाँ किलिक करें


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कल उत्सव के लिए अवकाश का दिन है , पुन: मिलते हैं दिनांक १२.०५.२०१० को प्रात: ११ बजे परिकल्पना पर !    

4 comments:

  1. अरे वाह, राजू बन गया जेन्टलमैन। बधाई।

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  2. अरे वाह ! अरविन्द जी की इस कथा ने रोचक सामग्री जोड़ी इस उत्सव में !
    आभार ।

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