श्रीमती प्रीती मेहता, (http://ant-rang.blogspot.com/) ने बड़े ही जीवंत अंदाज में कहा,


"वेसे तो पुनर्जनम एक् आस्था और विश्वास का विषय है … वेदों और पुराणों में कहा गया है - शरीर नश्वर है , आत्मा तो अमर है .. यानि कह सकते है कि शरीर मरता है, आत्मा नहीं … तो यह आत्मा जाती कहाँ है ..? आत्मा एक् शरीर छोड़ दूसरे शरीर को धारण कर लेती है …

मेरे लिए मेरा अनोखा बंधन ही पुनर्जन्म है ... यह बंधन हर किसी से तो नहीं बंधता .. और जहा बंधता है , वहाँ बस बंधता ही जाता है ...बिना किसी शर्तो के , बिना किसी उम्मीद के ...बस बंध जाता है ....

अनोखा-बंधन

कितना सुन्दर और पवित्र नाम ?

सुन कर ही कुछ अलौकिक अनुभूति का एहसास हो जाता है…

जैसे पूर्व-जन्म का कोई बंधन ?

जो युग-युग से जन्म लेकर इक दिल से दूसरे दिल को जोड़ रहा हो ..?

जो निर्दोष, निस्वार्थ प्रेम भाव का झरना बन अविरत बहता रहता है ..

और यह एहसास सिर्फ महसूस किया जा सकता है,

इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते .

जो सामाजिक और खून के रिश्तो से परे है और कुछ अलग है …


जीवन में बहुत बार अचानक किसी से संबंध बन जाते है,

मन में सकारात्मक और नकारात्मक तरंगे उठने लगती हैं ,

कभी- कभी कुछ क्षण का परिचय कुछ ख़ास बन जाता है ,

और ऐसे संबंध जो ना समझ आये या कहलो

जिसका ताल-मेल बुद्धि से भी ना मिल पाए ,

ऐसे संबंध ऋण का बंधन हैं ,

और यह बंधन कब , क्यों , कैसे … किसी से बन जाता है

यह समझ ही नहीं आता ... बस बन जाता है ...

यही है पुनर्जन्म ! "


नयी पीढी की विनीता श्रीवास्तव का कहना है,

" पुनर्जन्म पर कुछ लोग विश्वास करते है कुछ लोग विश्वास नहीं करते , मै भी नहीं करती. ये सब सिर्फ किताबो और कहानियो में ही अच्छी लगती है. अगर कोई कह्ता है कि उसका पुनर्जन्म हुआ है तो मै उसे सिर्फ १ अन्धविश्वास ही मानूंगी. व्यक्ति अपने कर्मो से ही जन्म लेता है. मै तो बस इतना ही कह सकती हूँ कि हमें अपने आज में जीना चाहिए और अच्छे कर्म करने चाहिए. "

तो ये है अलग-अलग धारणा.....सकारात्मक,नकारात्मक तथ्यों के बीच! कहीं विज्ञान है,कहीं मन... जो है - आपके समक्ष है आपके विचारों से जुड़ने की इच्छा  लिए!
तो अब आप अपने विचार प्रेषित करें, हम जानना चाहेंगे................
--
- सादर
रश्मि प्रभा
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परिचर्चा के समापन के पश्चात मैं आपको ले चल रही हूँ कार्यक्रम स्थल की ओर जहां  उपस्थित हैं २० वीं शादी के मशहूर युवा कवि श्री दिविक रमेश अपनी कविताओं  के साथ  .........यहाँ किलिक करें
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इसी के साथ अब रश्मि प्रभा को अनुमति दीजिये , कल फिर मिलती हूँ गीतों भरी उत्सवी शाम में मैं और स्वप्न मंजूषा शैल यानी अदा .....आपसे विनम्र निवेदन है कि ब्लोगोत्सव के इस आखिरी गीत-संगीत के भव्य कार्यक्रम में अवश्य पधारिये  कल ब्लोगोत्सव-२०१० पर ठीक अपराह्न ०२ बजे ....तबतक के लिए शुभ विदा ! 

2 comments:

  1. पुनर्जन्म की अवधारणा को मैं बिलकुल ठीक मानती हूँ ,आप स्वयं सोचें कि आप कभी कभी ऐसे काम सफलतापूर्वक कर ले जाते हैं जो आपने पहले कभी न देखे होते हैं न ही किये होते हैं ,उनका ज्ञान आखिर आपको कहाँ से मिला ,तब ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि जरूर ये गत जन्मों के ज्ञान का परिणाम था ,क्योंकि आत्मा अजर-अमर है और हमारा ज्ञान वही संचित रखती है ,इस शरीर को तो नष्ट हो जाना है ,आत्मा जब दूसरा शरीर धारण करेगी तो पूर्व संचित ज्ञान साथ होगा

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