आदरणीय मातृभूमि,
हार्दिक नमन,
तुमसे बिछडे कई दसक बीत गए, लेकिन आत्मा आज भी तुम्हारी गोद में बिताये वात्सल्य से परिपूर्ण लम्हों के आकर्षण से मुक्त नहीं हों पाई है
हर पल परमपिता परमेश्वर से यही विनती होती है कि जब भी जन्म लूँ तो हमेशा तुम्हारी ही गोद, तुम्हारा ही आँचल नसीब हों

तुमसे दूरी का ये लम्बा अंतराल मन को स्वतः वेदना से भरता रहा है, और शायद यही वजह रही कि बीते दिनों ईश्वर ने विधि के नियमों में क्षणिक परवर्तन कर मुझे यह सौभाग्य दिया कि मैं निराकार स्वरुप ले तुम्हारी परिक्रमा कर आऊं

ईश्वर जानता है कि तुम्हारे करीब होने का एहसास प्रतिपल ह्रदय में असंख्य सुखद अनुभूतियों का श्रृजन कर रहा था, परन्तु तुम्हारा अस्तित्व ज्यूँ- ज्यूँ नजरों में साकार होता गया, लोभ, ईर्ष्या, अंहकार, भ्रष्टाचार, दुराचार, क्षेत्रीयता, आतंकवाद, देश द्रोह जैसे कई अंतरघातों से लहूलुहान तुम्हारे कांतिहीन शरीर ने मेरी आत्मा को झकझोर कर रख दिया
पल भर को अपने ही नेत्रों पर विश्वास करना कठिन प्रतीत हुआ
अपने ही पुत्रों, पौत्रों की संस्कारहीनता ने मेरे इस आत्मविश्वास को अनगिनत टुकडो में बिभक्त कर दिया, हमने और हमारे असंख्य स्वदेश प्रेमी भाई-बहनों ने अपने आत्मबल का समग्र उपयोग कर एक ऐसी भविष्य की नींव रखी थी जिसपर एक स्वतंत्र, स्वास्थ्य और नीतिपूर्ण समाज का निर्माण हों सके
 कितना परिवर्तन हों गया एक छोटे से अंतराल में ? तब हम शत्रु के विरूद्व हर हार में भावी जीत की चिंगारी देखते थे और आज अपनी ही हर जीत में हार का दावानल दिखता है
आज प्रतीत होता है कि हमलोगों ने अपनी पूरी लडाई केवल बाह्य शत्रुओ पर केन्द्रित रख कर एक बड़ी ऐतिहासिक भूल की
हम शत्रु की काया को अपना देश छोड़ता देख प्रसन्न होते रहें और उनकी सोच हमारी ही आत्माओ पर कब्जा जमाये, हमारे ही आवरण में कहीं बैठी, हमारी झूठी मुगाल्ताओ की खिल्ली उड़ाती रही
हे मातृभूमि, अब फिर समय आ गया है एक नयी क्रांति के आगाज का, जो सक्षम हों काट सकने में, मानसिक दासता की स्वनिर्मित बेड़ियाँ

तुम हताश मत होना, विश्वास अटूट रखना, अभी भी तुम्हारी गोद अनगिनत लक्ष्मी बाई, सुभाष, मंगल पाण्डेय, चंद्रशेखर आजाद सरीखे देश पर मर मिटने वाले पुत्र/पुत्रियों से भरा है, बस उनके आत्मविश्वास रूपी बारूद को सही चिंगारी का इंतज़ार है, और वो चिंगारी जल्द उठेगी, बड़वानल का रूप लेगी, बस तुम हताश मत होना, विश्वास अटूट रखना....

तुम्हारा,
मोहन दास





- संत शर्मा
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संत शर्मा के इन विचारों को आत्मसात करने के बाद आईये चलते है कार्यक्रम स्थल की ओर जहां उपस्थित हैं वन्दना गुप्ता उपस्थित हैं अपनी तीन कविताओं के साथ .....यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

2 comments:

  1. विचार अत्यंत ही सारगर्भीत है , आभार !

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  2. गाँधी के दर्द को बाखूबी वायान करने हेतु आभार

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