काश एक इमरोज.........
काश एक इमरोज मेरी भी ज़िन्दगी में होता......
तो जीने का फलसफा ही कुछ और होता,
मैं चलती, मेरे संग संग चलता वो......
जो रूकती, तो पल भर को ठहर जाता वो भी,
हर अश्रु को मोती बना देता वो.....
जो रोती तो पल भर को सहम जाता वो भी,
मैं हंसती खिलखिला उठता वो......
जो मुस्कुराती तो अपने गम में भी मुस्कुरा उठता वो भी,
मेरी हर हार को जीत बना देता वो......
मेरी जीत के लिए जीती बाजी हार जाता वो भी,
मेरी धुन में गूँज उठता वो........
जो गाती मैं तो संग संग गुनगुना उठता वो भी,
मैं झूमती तो नाच उठता वो........
जो गिरती मैं तो चलते चलते लड़खड़ा जाता वो भी,
जो मरती तो मुझे अमर कर जाता वो,
मेरे मरने के बाद भी अपनी कलम से मुझे जिवंत कर जाता वो.........
काश एक इमरोज.........



रानी मिश्रा
http://zindagiekjung.blogspot.com/
 
 
 
 
 
 
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इस  परिचर्चा  को  हम  आगे  बढ़ाएंगे एक अल्प विराम के बाद, किन्तु उसके पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल जहां अपनी नज्मों के साथ उपस्थित हैं विनय प्रजापति .....यहाँ किलिक करें 
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उत्सव जारी है मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद  

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर! परन्तु इमरोज़ रोज़ रोज़ तो पैदा होते नहीं हैं। एक बार अमृता फिर से जन्म ले सकती हैं, इमरोज़ नहीं।
    घुघूती बासूती

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  2. काश !
    सहमत हूँ घुघूती जी की बातों से

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  3. कभी कभी स्वप्न भी साकार हो जाते हैं ...रचना बढ़िया रही..आभार.

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  4. kya kalpana ki hai aur shayad har dil ki kalpana ko shabd diye hain.........bahut hi sundar bhaav.

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