स्वागत है पुन: आप सभी का परिकल्पना पर . आज मैं आप सभी को मेले में घुमा रही हूँ लोगों से मिलबा रही हूँ और देश के सक्रिय और समर्पित रचनाकारों की रचनाओं से रूबरू करा रही हूँ ...आपको अवश्य आनंद आ रहा होगा .....तो चलिए परिचर्चा के क्रम में अब मैं आपको मिलवाती हूँ विनीता, डा उषा और पटना बिहार की मंजू श्री से ...पूछती हूँ उनसे वही प्रश्न कि - क्या आप आज के लाईफ स्टाईल से संतुष्ट हैं ?




विनीता श्रीवास्तव
mailto:vinnishrivastava1986@gmail.com

कई बार मन् में उठता है सवाल कि क्या लिखूँ?
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन में,
भारतीय संस्कृति दिनों दिन लुप्त होती जा रही है,
या लिखूँ .......
विदेशी सभ्यता के बारे में ,
जिसमें हमारी पीढियां लुप्त होती जा रही है
क्या लिखूँ मै
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन को बढावा दे रहे सब ,
या लिखूँ कि हम अपने आपको खो रहे हैं
क्या लिखूँ मैं
क्या लिखूँ ,
-हिंदी की महानता
जो किताबो में सिमट गई है
या लिखूँ ......
अंग्रेजी के बारे में
जो भारतीयों के शरीर में लहू के सामान घुल गई है
क्या लिखूँ मै......
क्या लिखूँ मै .............

डा० उषा
http://ushma.blogspot.कॉम/

लगभग 60% !!!!!!!!!!!!!
सबसे बडी बात है-- कि , आप आजाद हैं..
तो सोच सकते हैं, राय ले सकते हैं, कोशिश कर सकते हैं,
ऐसा पहले नहीं था.....................................................
माना कि हवा ,पानी , खाना शुद्ध था...पर कितने
लोगों को मय्यसर होता था........आज आपके पास.....
विकल्प है..आज आप अपनी लाइफ स्टाइल बना सकते हैं.........


मंजुश्री , पटना

प्रश्न है कि क्या हम अपने मौजूदा हालात से संतुष्ट हैं.......जहाँ तक संतुष्ट होने का सवाल है तो आदमी कभी भी,किसी भी काल में अपने वर्तमान हालात से संतुष्ट नहीं रहा है . असंतोष सड़े-गले

रीति-रिवाजों का ,परम्पराओं का ,अंधविश्वासों का ,..... इन सारे बन्धनों से मुक्त होने के लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहा ...और धीरे-धीरे उसने अनेक बेडियाँ तोडीं ,अनेक बन्धनों से आनेवाली पीढी को मुक्ति दिलाई . लेकिन हर नई पीढी को लगा कि उसे और मुक्ति चाहिए,और आज़ादी चाहिए. आज़ाद होते-होते आज मौजूदा पीढी जीवन के हर मूल्य से आज़ाद हुई नज़र आती है . सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देनेवाले देश में संस्कृति मखौल का विषय बन गई और सभ्यता धुंधली पद रही है. पहनावे में,बोलचाल में,रहन-सहन में हर गलत चीज को मान्यता मिल रही है . ऐसे में भला कोई संतुष्ट कैसे हो सकता है !!!!!!!

इस क्रम को अब मैं आगे बढाऊंगी एक अल्प विराम के बाद, किन्तु उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल पर जहा मुम्बई के हास्य-व्यंग्य कवि श्री बसंत आर्य उपस्थित हैं अपनी एक व्यंग्य कविता के साथ ....यहाँ किलिक करें


बने रहिये परिकल्पना के साथ, मिलती हूँ पुन: एक अल्प विराम के बाद

1 comments:

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