इसी विषय पर अभी ब्रेक से पहले हम मनोज कुमार जी के सारगर्भित विचारों को आत्मसात कर रहे थे, अब आईये शीखा वार्ष्णेय जी से पूछते हैं क्या है उनके लिए आज़ादी के मायने ?





दुनिया का एक सर्वोच्च गणराज्य है
उसके हम आजाद बाशिंदे हैं
पर क्या वाकई हम आजाद हैं?
रीति रिवाजों के नाम पर
कुरीतियों को ढोते हैं ,
धर्म ,आस्था की आड़ में
साम्प्रदायिकता के बीज बोते हैं।
कभी तोड़ते हैं मंदिर मस्जिद
कभी जातिवाद पर दंगे करते हैं।
क्योंकि हम आजाद हैं....
कन्या के पैदा होने पर जहाँ
माँ का मुहँ लटक जाता है
उसके विवाह की शुभ बेला पर
बूढा बाप बेचारा बिक जाता है
बेटा चाहे जेसा भी हो
घर हमारा आबाद है
हाँ हम आजाद हैं।
घर से निकलती है बेटी
तो दिल माँ का धड़कने लगता है
जब तक न लौटे काम से साजन
दिल प्रिया का बोझिल रहता है
अपने ही घर में हर तरफ़
भय की जंजीरों का जंजाल हैं
हाँ हम आजाद हैं।
संसद में बेठे कर्णधार
जूते चप्पल की वर्षा करते हैं।
और घर में बैठकर हम
देश की व्यवस्था पर चर्चा करते हैं
हमारी स्वतंत्रता का क्या ये कोई
अनोखा सा अंदाज है? क्या हम आजाद हैं?..
शिखा वार्ष्णेय
वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका (यात्रा वृत्तांत )
http://shikhakriti.blogspot.com/



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जारी है अभी परिचर्चा, मिलते हैं कल सुबह ०६ बजे फिर से किसी चिट्ठाकार के विचारों के साथ.......

6 comments:

  1. हाँ हम आजाद हैं।
    संसद में बेठे कर्णधार
    जूते चप्पल की वर्षा करते हैं।
    और घर में बैठकर हम
    देश की व्यवस्था पर चर्चा करते हैं
    हमारी स्वतंत्रता का क्या ये कोई
    अनोखा सा अंदाज है? क्या हम आजाद हैं

    बिलकुल सटीक मुद्दा उठाया है ....बढ़िया और ज्वलंत मुद्दा

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  2. Shikha jee, badi sahi baat kahi aapne, aur badi tareeke se apnee baat rakhi hai aapne......lekin fir bhi.....

    haan ham aajaad hain, beshak apne aajadi ka ham thora galat istemaal kar rahe hain.......lekin to bhi ham aajad hain.........kyonki inn galtiyon ke babjud, hame apne desh se pyar hai........:)

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  3. एकदम सटीक विवरण दिया आपने हमारी आज़ादी का. फिर भी हम कहते है "जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी ".

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  4. एक सच्चे, ईमानदार कवयित्री के मनोभावों का वर्णन। बधाई।

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

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