जैसा की आप सभी को विदित है कि " दैनिक जनसंदेश टाईम्स" में प्रत्येक रविवार को मेरा नियमित व्यंग्य कोना " चौबे की चौपाल " प्रकाशित होता है , पिछले  रविवार को आप सभी ने पढ़ा "मौसम में भी मिलावट" .....और- 




चौबे जी की चौपाल में आज : 

 धत , जिगर से कहीं बीडी जलिहें ?
आज लखनऊ से लौटे हैं चौबे जी और हाथ-मुह धोके बईठ गए अपने चबूतरा पर कहें कि आज की चौपाल के का मुद्दा है राम भरोसे ? राम भरोसे के जब कुछ ना समझ मा आया तो बोला मुद्दा का है महाराज, कुछो मुद्दा  नाही है आज आपो थके हैं चौबे बाबा, कुछ बतकही सुनाईये लखनऊ की !
का बताएं गुलटेन वा, क़ल शनिश्चर   का दिन था, जनाबे करते हो हाफ टाईम के बाद कहीं कुछ भी काम नहीं होता , सोचा कि कोई मित्र मिल जाये तो सिनेमा देखने चलें, पर शाम तक कोई मित्र ऐसा नही मिला जिसके साथ जाया जा सके. थक-हार कर शाम विताने के उद्देश्य से चला गया अपने एक करीबी मित्र प्रदुमन तिवारी के यहाँ, ई  सोचकर कि कुछ मित्र एक साथ बैठकर जब विचारों का आदान- प्रदान करेंगे तो शाम खुश्ग्बार गुजर जायेगी . मैं प्रदुमन के घर के बाहर लॉबी में कुछ मित्रों के साथ बैठा गप्पे मार रहा था कि अचानक एक ऐसी घटना घटी कि मैं सोचने पर मजबूर हो गया. आप भी सुनेंगे तो नि: संदेह मजबूर हो जायेंगे सोचने पर. हुआ यह कि उसके यहाँ एक कामवाली आयी थी जो एक कोने में बैठकर बीडी पी रही थी और प्रदुमन का सबसे छोटा बेटा जो महज सात साल का है , उससे गपिया रहा था , उसे हिदायतें दे रहा था कि- " ये चाची! अपनी बीडी को जिगर से क्यों नहीं जलाती हो, माचिस के पैसे बचेंगे ?"यह सुनकर वह कामवाली पहले तो शरमाई फिर अपने कथई दातों को निपोरती हुई बोली- " धत्त , कइसन बात करत हौ बबुआ! जिगर से कहीं बीडी जलिहें ?" वह बालक इसप्रकार बातें कर रहा था जैसे आत्म विश्वास से लबरेज हो. उसने मासूमियत भरी निगाह डालते हुए कहा कि- " जलेगी न चाची , कोशिश तो करो !"
 वहाँ बैठे सभी लोग यह दृश्य देख अपनी हंसी को रोक नही पाए और खिलखिलाकर हंसने लगे, ठहाका लगाने लगे. वह बालक शायद यह सोचकर वहाँ से भागा कि लोग उसका मजाक उडाने लगेंगे. हमरी हंसी की गूँज से ऊ  कामवाली भी शर्मा गयी.
लोगों ने उस मासूम की बातें भले ही उस समय गंभीरता से न लिए हों लेकिन यह सच है कि दृश्य - मीडिया जो किसी भी समाज की सु संस्कारिता का आईना होता है, वही जब द्वि अर्थी संवादों के माध्यम से समाज को गंदा करने की कोशिश करे तो अन्य से क्या अपेक्षा की जा सकती है . आज यह हमारे समाज के लिए वेहद विचारणीय विषय है. ऐसे समय में जब फैला हो हमारे इर्द- गिर्द वीभत्स प्रभाव सिनेमा का , हम कैसे एक सुन्दर और खुशहाल सह- अस्तित्व के साथ- साथ सांस्कारिक समाज की परिकल्पना कर पायेंगे?
का रे बटेसर गलत कहत हईं का ?
नाही महाराज आप और गलत ?
तो ठीक है इसी बतकही के साथ आज की चौपाल स्थगित, गाओ सब मिलकर बीडी जलाईले जिगर से पीया , जिगर मा .........!

() रवीन्द्र प्रभात

14 comments:

  1. जलती है भाई जलती है जिगर से बीड़ी और बीड़ी के धुंए से जिगर की सभी शिरायें सुलगती हैं।

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  2. चौबे बाबा ने भी खूब कहा और आप भी चौबे बाबा की अभिव्यक्ति को बड़े ही अनोखे अंदाज़ में कह गए , बहुत बढ़िया व्यंग्य , बधाईयाँ !

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  3. क्या बात है, व्यंग्य हो तो ऐसा !

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  4. बहुत लाजवाब है रविन्द्र जी .... सच है बीडी जिगर से नहीं जलती ... पर कभी कभी जिगर में आग लग जाए तो जल भी जायेगी ..

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  5. ha...ha...ha... pyara vyangya. badhai aapkee is pratibha k liye bhi.

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  6. बहुत संज़ीदगी से मारा
    वाह

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