उत्तर छायावाद के प्रवर्तक कवि और मेरे गुरुदेव कविबर आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री बृहस्पतिवार की देर रात  अंतिम सांस लेते हुए सदा-सदा के लिए चिरनिद्रा  में सो गए। गुरुदेव लगभग दो माह से बीमार चल रहे थे  !  दो सप्ताह पूर्व ही यहां के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एसकेएमसीएच) में स्वास्थ्य लाभ लेने के बाद वापस अपने घर 'निराला निकेतन' लौटे थे। यह क्षण मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक है !

आचार्य जी के निधन के साथ ही उत्तर छायावादी साहित्य और कविता की लगभग साढ़े नौ दशक से निरंतर कायम एक अध्याय का आज अंत हो गया। 1916 में गया जिले के मैग्राउर्फ मायाग्राम गांव मे एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाले आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री वर्ष 1939 में मुजफ्फरपुर संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में आये और मुजफ्फरपुर के ही होकर रह गए थे। 5 जनवरी 1953 को संस्कृत महाविद्यालय से अवकाश ग्रहण कर शास्त्री जी ने राम दयालु सिंह महाविद्यालय में हिन्दी और संस्कृत विभागाध्यक्ष के रूप में अपना योगदान दिया और 1978 में यहां से अवकाश ग्रहण किया। अपने 96 वर्ष के उम्र तक पहुंचने के बाद भी आचार्य शास्त्री जी ने अपनी लेखनी को जारी रखा था। आचार्य शास्त्री ने 1938 में 'काकली' नामक संस्कृत काव्य संग्रह की रचना कर साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। लगभग 90 हिन्दी और संस्कृत में कविता, गीति नाटय़ महाकाव्य आदि पुस्तकों की रचना कर वे एक मूर्धन्य साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे।


1935-1945 के बीच आचार्य शास्त्री ने 55 कहानियां भी लिखीं। इनके साथ ही उन्होंने कई पुस्तकों और पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने संस्कृत और हिन्दी की दर्जनों पुस्तकों की रचना की थी। इसके लिए उन्हें दयावती पुरस्कार, सवरेच्य प्रथम राजभाषा सम्मान, राजेन्द्र शिखर सम्मान, भारत-भारती सम्मान आदि पुरस्कारों से भी नवाजा गया। अचार्य शास्त्रीजी के निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके अंतिम दर्शन के लिए मुजफ्फरपुर के साहित्य प्रेमियों की भीड़ उनके आवास 'निराला निकेतन' में उमड़ पड़ी। जिनको कछु नहीं.. झा आजाद के मुख्यमंत्रित्व काल का है। शास्त्री जी को बिहार रत्न से सम्मानित किया गया था, एक लाख रुपये की सम्मान राशि के साथ। सम्मान समारोह में कही गयीं शास्त्री जी की दो पंक्तियां उनकी ईमानदार अभिव्यक्ति की साखी की नाई आज भी साहित्यप्रेमियों के बीच बारम्बार उद्धृत होती हैं- मैं आया नहीं हूं लाया गया हूं, खिलौने देकर बहलाया गया हूं। और तमाम पल्रोभनों को एक झटके-से नकारने की यह अदा जानकी जी की मौलिक अदा थी, इसे उन्होंने साबित किया बाद के दिनों में पद्मश्री सम्मान को ठुकराकर। साफ-साफ कहा कि मुझे इसकी जरूरत नहीं, नयी पीढ़ी को इसकी ज्यादा दरकार है। बेवजह नहीं कि जानकी बल्लभ शास्त्री से मिलने वालों को अचानक कबीर याद हो आते- चाह गई चिन्ता गई मनुवा बेपरवाह, जिनको कछु नहीं चाहिए वो ही शहंशाह। हिंदी साहित्य में छायावाद के अवसान के बाद जो रिक्तता आई थी उसकी भरपाई करनेवालों में बच्चन, नरेंद्र शर्मा, अंचल, दिनकर और नेपाली के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण नाम जानकी बल्लभ शास्त्री का भी था। शास्त्री जी का जाना इस मायने में हिंदी की एक गौरवशाली काव्य परंपरा के आखिरी स्तंभ का ढहना भी है। शास्त्री जी के साहित्यिक अवदान पर बहुत र्चचा हो चुकी है, बहुत अभी बाकी है। एक गद्यकार के रूप में उनके उपन्यास 'कालिदास' को और उनके संस्मरण 'एक असाहित्यिक की डायरी' को हिन्दी साहित्य का इतिहास सम्मान और श्रद्धा के साथ रेखांकित करता रहेगा। हिंदी समाज अगर आज हिंदी को साठ से ज्यादा उत्कृष्ट कृतियों का तोहफा देनेवाले जानकी बल्लभ शास्त्री का अनुग्रह जानता और मानता है तो यह सर्वथा स्वाभाविक है। मगर शास्त्री जी को अमरता प्रदान करते हैं उनके गीत जो सामान्य जन की जुबान पर लोकगीतों की तरह काबिज देखे जा सकते हैं। मेघगीत की इन पंक्तियों के जरिए उनके संपूर्ण काव्य-व्यक्तित्व की अनुगूंज हिंदी पट्टी में पाश्र्व संगीत की तरह लगातार बजती रही है और अनंत काल तक बजती रहेगी- 'ऊपर ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं, कहते ऐसे ही जीते हैं जो जीनेवाले हैं'।

उनके निधन से हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुयी है जो शायद कभी भी भरपाई न हो पाए ! गुरुबर को परिकल्पना परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि !

23 comments:

  1. यह हमारे लिए अत्यंत पीड़ादायक और दुखद क्षण है। साहित्य जगत के साथ साथ व्यक्तिगत क्षति लग रही है।
    उनकी साहित्यिक धरोहर को हम संभालें और आगे बढाएं वही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
    विनम्र श्रद्धांजलि।

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  2. कविबर आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री को विनम्र श्रद्धांजलि! ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति एवं उनके परिजनों को शोक सहने की शक्ति प्रदान करें!

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  3. कविबर आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री को विनम्र श्रद्धांजलि! ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें!

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  4. छायावाद के अंतिम स्तम्भ को श्रद्धांजलि

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  5. विनम्र श्रद्धांजली....सादर नमन...

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  6. शास्त्री जी की आत्मा को परमपिता परमात्मा शान्ति प्रदान करें ऐसी हमारी प्रार्थना है.

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  7. इक भावभीमि श्रद्धांजली दी जा रही है कल शनिवार (09.04.2011) को "चर्चा मंच" पर जानकीवल्लभ शास्त्री जी को...

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  8. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे...विनम्र श्रद्धांजलि !!

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  9. बहुत दुखद -सुबह ही ब्लॉगर आशीष राय ने बताया तो मन क्षुब्ध हो गया ..
    आचार्य जी मौलिक प्रतिभा के धनी मूर्धन्य साहित्यकार थे ....अभी ब्लागजगत ने भी उन पर एक व्यक्तिचित्र किया था ..
    उनकी ये लाईने मुझे याद हो गयी हैं -
    क़ला साधना ,कुंद छुरी से दिल को रेते जाना
    अतल आंसुओं के सागर में सपने खेते जाना
    ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे .....अंतिम प्रणाम !

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  10. कविबर आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री को विनम्र श्रद्धांजलि! ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें!

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  11. उत्तर छायावाद के प्रखर स्तंभ को मेरा अंतिम प्रणाम !

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  12. छायावाद के अंतिम स्तम्भ को श्रद्धांजलि

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  13. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री को विनम्र श्रद्धांजलि! ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें!

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  14. विनम्र भावभीनी श्रद्धांजलि !!

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  15. यह अत्यंत दुखद क्षण है ... ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें ....

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