चौबे जी की चौपाल
(दैनिक जनसंदेश टाइम्स/०८ मई २०११ )



जो जनता की सोचेगा अब वही राज करेगा !



आज चौपाल में चौबे जी बहुत चिंतित है ,कह रहे हैं कि " ससुरी देश में आजकल हरतरफ कोसने की बीमारी चल पडी है, अन्ना कोस रहे हैं घोटालेबाज को तो पलट कर घोटालेबाज कोस रहा हैं अन्ना को...अऊर तो अऊर विपक्ष का एक नककटवा घोटालेबाज खुबई ऊंगली उठा रहा है नाक वाले के ऊपर, सोचो कि घोटाला हुआ दुई-तीन साल पहिले अऊर भेद खोल रहा है आज, सीधे-सीधे बोलना चाहिए न s कि घोटाले में नही पा सका दलाली के दाम तो सोचा कुछ ऐसा किया जाये काम कि आम के आम भी रह जाये अऊर मिल जाये गुठली  के दाम....!"


ई त s बड़ी दूर की बात कहत हौ चौबे जी, नेतवन हो या ब्यूरोक्रेसी या फिर नककटवा सबका चरित्र हो गया है हमरे देश मा तबायफ के गज़रा जईसा, रात को पहनो सुबह को उतार दो...सब ससुरा समझ लिया है ई देश को राम जी की चिरई, राम जी का खेत ....खालो चिरई भर-भर पेट ! बोला गुलटेनवा


"गुलटेनवा की बात मा दम है महाराज, काहे के स्व से ऊँचा चरित्र, राजनीति मा मित्र...अऊर जुआरी के अड्डा पर माहौल कभी पवित्र हो सकता है का ? अब देखिये नs दुई-तीन महीना पहिले विधान सभा चुनाव के समय हम गए रहे बडहरवा, बिहार अपने ससुरारी, उहाँ जानते हैं का हुआ एक नेता जे पांच- पांच गौरमेंटो में इक्कीस साल से मंत्री पद संभालते आ रहे थे उनके सामने नयी प्राब्लेम खड़ी हो गयी, एक चुनावी सभा में तान-तान के भाषण दे रहे थे फील गुड , कारगिल विजय,क्रिकेट विजय,भारत उदय टाईप के कसीदे काढ रहे थे कि बगल के चमचे ने कान में टोका , उसके बाद विफर गए, लगे सरकार को गरियाने कि इस निक्कमी सरकार ने दिया क्या भूख,गरीबी , भ्रष्टाचार, बेरोजगारी .....इसे जड़ से उखाड़ना है अऊर निक्कमी सरकार से राज्य की जनता को बचाना है ...जानते हैं अईसा  क्यों हुआ ?"

"क्यों हुआ धनेसर ?"
"हुआ यों कि आधी सभा हो जाने के बाद बगली के एगो चमचा ने नेता जी के कान में हतौडा मारा अऊर कहा कि रूलिंग पार्टी ने नेता जी का टिकस काट दिया है ...बस हो गए चालू ...ई है नेतवन के चरित्र चौबे जी !"

"अईसन नेतवन के जनता सबक क्यों नहीं सिखाती है धनेसर ?" पान की गुलगुली मुह मा दबाये पूछा गजोधर

हम्म बताते हैं, चौबे जी ने तौआते हुए कहा कि " बात ई है गजोधर कि " दुखों के पहाड़ से दबी जनता को दिखा जाते हैं ससुर सब्जबाग,भाई, जनता तो भावुक होती है न सोचती है न समझती है
नेतवन को पहुंचा देती है कभी झार पे तो  कभी सातवें आसमान पे, काहे कि निरमोहिया होते हैं सब घोटालेवाज़ नेता, उसका नस्ल भी दुसरे तरह का होता है...न ऊ आदमी होता है, न कुत्ता, न बन्दर ...वह मस्त कलंदर होता है, जितना जमीन से बाहर होता है उतना ही जमीन के अन्दर होता है, बयान बदलना उसका जन्म सिद्ध अधिकार होता है क्योंकि उनके लिए चरित्र से ऊँचा होता है पईसा..... मज़ा आता है उसे अपने बदले हुये बयान पर और फक्र करता है वह अपने खोखले स्वाभिमान पर......जरूरत पड़ने पर कभी धरती पकड़ तो कभी कुर्सी पकड़ बन जाता है अऊर कभी-कभी ऊ अपनी हीं बातों में जकड जाता है..... अऊर तो अऊर  जब ऊ बहुत टेंशन में होता है तों रबड़ी में चारा मिलाता है , खाता है अऊर अकड़ जाता है ....भाई, मानो या न मानो मगर यह सच है ,कि-नेता बनना आसान नहीं है हिंदुस्तान में, क्योंकि उसे एक पैर जमीन पर रखना पड़ता है, तो दूसरा आसमान में....उसके भीतर कला होती है , कि- वह मास्टर को मिनिस्टर बाना दे और कुत्ता को कलक्टर बाना दे......कभी स्वाभिमान के नाम पर, तो कभी राम के नाम पर भीख मांग सके, अऊर जरूरत पड़ने पर हाई स्कूल फेल को वैरिस्टर बाना दे.....नेता बनना हर प्रकार की प्रतियोगिता से कठिन है....ये हम्म नहीं कह रहे हैं बचवा हमरे गाँव के नेता जी कहिन है !"

बाप रे ईतनी कला होती है घोटालेबाज़ नेताओं में ? चौबे जी की बातों से अवाक रमजानी ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए पूछा !

देख चौपाल में नेता चालीसा सुनाने नाही बईठे हैं हम्म, हमरे पास अऊर भी कुछ टेंशन है जिसपर हम्म चर्चा करेंगे अगले चौपाल में, तबतक चलो मिलके हम सब एगो प्रस्ताव पारित करते हैं कि ....... जो जनता की सोचेगा अब वही राज करेगा !

सबने इस प्रस्ताव का सर्वसम्मति से समर्थन किया और चौबे महाराज की जय-जयकार  के साथ चौपाल अगले ईतबार तक के लिए स्थगित हो गयी !

रवीन्द्र प्रभात

4 comments:

  1. अच्छा लगा चौपाल में शामिल होकर।

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  2. चौबे जी को पता होना चाहिये कि राजनिति में केवल धूर्त व लंपट ही जाते हैं पढ़े-लिखों के लिए हज़ार काम और भी होते हैं

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