आज ब्लॉगोत्सव में अवकाश का दिन है,इसलिए चलिए चलते हैं चौबे जी की चौपाल में जहां समसामयिक मुद्दों पर गरमागरम चर्चा  चल रही है :


चौबे जी की चौपाल

बचवा,बहुत कठिन डगर लोकपाल की !

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी बात आगे बढाते हुए बोले चौबे जी, कि आजकल गजबे नाटक चल रहल बाटे हमरे देश मा, कभी सिविल सोसायटी ऊपर तो कभी केंद्र सरकार । अन्ना जी के अनशन करत-करत जिनिगिया बीत जाई राम भरोसे,आउर जबतक जन लोकपाल बिल पारित हो के आई न s तबतक खाली हो जाई ससुरी स्विस बैंक के खातन से हमरे देश क पईसा । फिर कईसे होई जन लोकपाल बिल से क़माल,जब होई जाई मामला ठनठन गोपाल ?

एकदम्म सही कहत हौ चौबे जी, आज़ादी के बखत अगर देश सेवा अऊर जनसेवा राजनीति की पहली अऊर आखिरी सीढ़ी थी त s आज परिभाषा विल्कुल बदल चुकल बाटे । राजनीति क सीधा-सीधा मतलब आजकल ईहे है कि नेता बन,दौलत कमा । जईसे भी आये,जहां से भी आये....भले ही जनता जहन्नुम मा जाए ....। इनके राज भी द ,ताज भी द आऊर वि आई पी बने खातिर सत्ता क साज भी द, मगर जानत हौअ s ....जईसे ही पा जायेंगे सत्ता..... कहते फिरेंगे, कोई फरक नही अलबत्ता .... बोला राम भरोसे ।

अब इस बात पर हम बिना कवनो लाग लपेट के बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलता है । मगर का करें हम जनता हैं आऊर ऊ जनार्दन, जब दिल कुहुकेगा तो बोलेंगे ही ...न चाहते हुए भी अपना मुंह खोलेंगे ही ...ज़रा सोचो गजोधर भाई जब जनता के हित की बात आती है, तब सदन में इनके अहं टकरा जाते हैं ,हफ़्तों सदन नही चलते, पर जब खुद जनसेवकों की सुविधाएं बढाने की कोई बारी आती है तो एक मिनट मा प्रस्ताव कईसे पास हो जाता है ? कईसे सब चोर-चोर मौसेरे भाई एक हो जाते हैं ? यह काम इन सबके लिए बड़े नेक हो जाते हैं ? है कोई उत्तर इनके पास ? पूछा रमजानी ।

रमजानी मियाँ, हम तोहके बताबत हईं कि ईस्कूल के दिनन में राज आऊर नीति के तहत हमने यह पाठ पढ़ा था कि अगर किसी कौम पर लंबे समय तक राज करना है तो उसे आधा भूखा रखो,आधा नंगा रखो । ऊपर से सिर छिपाने के लिए छत मत दो । वह कौम हमेशा आपके सामने हाथ फैलाए खड़ी रहेगी । हमेशा आपके सामने गिड़गिडाती रहेगी । ई बताओ रमजानी मियाँ , कि नेताओं के लिए जब पीछे जनसेवा रुपी खाई है आऊर आगे लंबी पारी खेलने की ललक ......यानी स्वार्थ आऊर अनैतिकता का एक छोटा सा कुआं पार करना है फिर सबकुछ चकाचक तो ऊ चुनेगा जनता की सेवा या फिर भ्रष्टाचार रुपी मेवा ? का होगा राजा, कलमाडी, कोनिमाझी की तरह कुछ दिन तिहाड़ में बिताकर आयेगा फिर चुना जाएगा फिर मेवा खायेगा .....इसीलिए कहते हैं बबुआ कि बहुत कठिन है जन लोकपाल की डगर ......का समझे ? बोले चौबे जी ।

देखो महाराज, कान पाक गए हमार सुनते-सुनते कि हमरे देश क नेता ई है,नेता ऊ है ...ई बताओ कि भ्रष्टाचार के लिए खाली नेता लोग दोषी हैं का ? हम्म भी उतना ही दोषी हैं चौबे जी । यह अलग बात है कि वे सोचते कुछ और हैं बोलते कुछ और हैं यह तो उनकी फितरत है ....उनके सोचने,उनके बोलने ,उनके करने में उतना ही अंतर है जितना धरती और आसमान ....ये मा कवन नया है महाराज, ई तो परंपरा में है हमरे देश की ....अब कहोगे नेता सच्ची कहानियों पर झूठी नौटंकी करते हैं , अरे क्यों न करें आखिर इसी नौटंकी के कारण तो हम-आप इनके सामने पानी भरते हैं । अब आप कहोगे महाराज कि गोट बिठाओ-वोट पाओ -नोट कमाओ की सोच ने उनकी नियत में खोट भर दिया ,ज़रा सोचो वे ऐसा नही करते तो देश में ईमानदार और बेईमान के बीच खाई ज्यों की त्यों रहती ? अगर उनकी कथनी और करनी एक होती तो क्या गरीब घरों की महिलाएं राजनीति के लिए अछूत बनी रहती ? अगर नेताओं से हम सबको इतनी ही घृणा है तो चुनाव के बखत जब ऊ नारा लगाते हैं कि- तुम बनाबाओ हमारी सरकार, हम दिलाएंगे तुम्हारे अधिकार । तब उनको जबाब क्यों नही देते ? बताईये चौबे जी महाराज ,है कोई जबाब आपके पास ? तमतमाते हुए पूछा गजोधर ।


भाई, गजोधर क बात मा दम्म है , हमके त s तरस आवत है जे मीठा-मीठा बोल के हमरे देश की तस्वीर बदले के सपना देखत हैं । के कहत हैं कि देश मा शान्ति चाही, देश क विकास चाहीं , रोटी -कपड़ा आऊर मकान चाहीं, रोजगार चाहीं ....अरे सत्यानाश हो तेरा गलती खुद करते हो आऊर दोष नेताओं को देते हो, जब तुलसीदास जी तक कह चुके हैं कि समरथ के नाही दोष गोसाईं , तब क्यों आ रही है हमरे देश की जनता को भ्रष्टाचार का नाम सुनकर उबकाई ? बताओ महाराज, अगर जनता को शान्ति की चिंता होती तो क्या वो गुंडे-बदमाशों-कातिलों को नेता बनाती ? यदि उसे रोटी-कपड़ा आऊर मकान की चिंता होती तो तो क्या वो दिन-रात झूठ बोलने वालों को नेता बनाती ? अगर उसे रोजगार की चिंता होती तो क्या वो अपना घर भरने वालों को नेता बनाती ? जैसी जनता-वैसा नेता । जनता अगर इस हाल में खुश है तो फिर वेचारे नेताओं को दोषी ठहराने से क्या फ़ायदा महाराज ? बोला गुलटेनवा ।

तू तो हमरी आँख खोल दिए हो गुलटेन...विल्कुल सच कह रहे हो बबुआ ,कि जवन देश मा हर कोई अपनी मर्जी का मालिक हो, ऊ देश के बदनाम होए से कवन रोक सकत है ? जवन देश मा जनता छोटे-छोटे सत्तर खानों में बंटी हो, ऊ देश क बर्बाद होए से कवन बचा सकत है ? जवन देश मा नेता कपड़ा के निचवे वार करत हैं ऊ देश मा नयी दिशा देवे खातिर के आई आगे ? जवन देश मा नाही रहा क़ानून का राज, ऊ देश की जनता कईसे सुरक्षित रह सकत हैं ? जवन देश मा गुंडा घुमे सफेदपोश बनके, ऊ देश मा अमन की गूँज कईसे हो सकत हैं ? जवन देश मा बच्चा लोग स्कूल जाए से डरत हैं ऊ देश क भविष्य कईसे वेहतर हो सकत हैं ? जवन देश मा सत्याग्रह पर लोग आपाधापी मचाये देत हैं ऊ देश मा भरोसे की बात कईसे कएल जा सकत हैं ? अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा, हमके भी बुझात है गुलटेन कि बहुत कठिन है डगर लोकपाल की । इसका एक ही उपाय है बचवा ?

का महाराज ?

इहे कि जब तक जनता संगठित होके आन्दोलन ना करी तबतक ऊहे ढ़ाक के तीन पात .....।

इतना कहकर चौबे जी ने चौपाल अगले आदेश तक के लिए स्थगित कर दिया ।

रवीन्द्र प्रभात

2 comments:

  1. बहुत अच्छी लगी चौबे जी की चौपाल...
    चुटीले अंदाज़ में तमाम समसामयिक बिन्दुओं पर अत्यंत गंभीर चर्चा हो गई यहाँ....
    सादर आभार....

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  2. बेहतरीन व्यंग। शुभकामनायें।

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