तुम चलो या ठहर जाओ .... और अपनी किस्मत का लेखा-जोखा करो .... समय नहीं ठहरता . बेहतर है बहीखाते को बन्द करो और जिधर धारा मुड़ती है , उसके साथ हो लो ... सागर मिले या मरू , क्या फर्क पड़ता है ... तुम चलो या ठहरो , समय को तो चलना ही है ...............


कहीं अल्प है , कहीं वृहद् ... कहीं खामोश , कहीं फुसफुसाहटें ... भावनाओं के सर्द चेहरे , ज़र्द चेहरे - चेहरे ही चेहरे ! आज हैं कुछ सर्द कुछ ज़र्द एहसासों की क्षणिकाएं वंदना गुप्ता की -


1.
आहटों से मुलाक़ात न करो
आहटें तो सुनाई देती हैं सिर्फ़ दूर से
खामोशियों ने छुपा रखा है हर आहट को अपने में
खामोशियों में ही सुन सकते हैं आहटों को
मगर हर कोई नही
आहटों की बात है बहुत प्यारी
खामोशियों में ही बात करो
खामोशी में ही खामोशी से मुलाक़ात करो
ज़िन्दगी तुम्हें आहटों से दूर
खामोशियों के समीप मिल जायेगी
===========
2.
एक कांटा चुभा दिल में
आह भी निकली
दर्द भी हुआ
मगर
हर सिसकी जैसे
रेत में पड़ी बूँद
की मानिन्द
कहीं खो गई
========
3.
अब जी नही करता
किसी के कंधे पर
सिर रख रोऊँ मैं
कोई मेरा हाथ थामे
मुझे अपना कहे
अब जी नही करता
किसी के दिल मैं जगह मिले
कोई प्यार करे मुझे
अब जी नही करता
सिर्फ़ जिस्मानी रिश्ते हैं
जो जिस्मों तक बंधे हैं
सब झूठ लगता है
इसलिए
अब जी नही करता
किसी के दामन का
सहारा लूँ मैं
किसी को अपना बना लूँ मैं
=======
4.
आजकल यादों के पन्ने फिर उखड़ने लगे हैं
हर पन्ने पर एक गहरी याद कुच्छ याद दिलाती है
हम इन यादों को फिर से जीने लगे हैं
आइना बन कर हर याद सामने आ जाती है
और हम इन यादों के समुन्दर में गोते खाने लगे हैं
दिल में यादों के भंवर हैं बड़े गहरे
हम तो इनमें फिर से डूबने लगे हैं
यादों को फिर से जीना इतना आसां नही होता
न जाने कितनी मौत मरकर जिया जाता है
========
5.
मुझमें न ढूंढ मुझे
राख के ढेर में अब
कोई चिनगारी नही
उम्र भर
इक चिता जलती रही
लकडियाँ कम पड़ गयीं
तो अरमान सुलगते रहे
जब कुछ न बचा
तो राख बन गई
बरसों से पड़ी है ये
कोई इसे भी उठाने न आया
अब तो इस राख पर भी
वक्त की धूल जम गई है
इसे हटाने में तो
जन्मों बीत जायेंगे
फिर बताओ
कहाँ से ,कैसे
मुझे मुझमें पाओगे

वंदना  गुप्ता 



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वन्दना गुप्ता जी की इन अभिव्यक्तियों को अंतर्मन में संजोकर आईये चलते हैं उत्सव के इक्कीसवें दिन के प्रथम चरण में प्रसारित कार्यक्रमों की ओर :


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कहीं जाईयेगा मत, हम मिलते हैं पुन: एक अल्प विराम के बाद .......

10 comments:

  1. वन्दना जी की सभी क्षणिकाएं एक से बढ़कर एक है, बहुत बढ़िया !

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  2. आहटों से मुलाक़ात न करो
    आहटें तो सुनाई देती हैं सिर्फ़ दूर से
    खामोशियों ने छुपा रखा है हर आहट को अपने में
    खामोशियों में ही सुन सकते हैं आहटों को....

    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति, पढ़कर मन रोमांचित हो गया, आभार आपका !

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  3. वंदन जी सभी क्षणिकाएं.....एक से बढ कर एक है ...

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  4. सारी क्षणिकाएं कुछ विशेष अर्थ रखती हैं , वन्दना जी को इस महत्वपूर्ण सृजन हेतु बधाईयाँ !

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  5. इस सुंदर प्रस्तुति के लिए आभार !

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  6. आपने ये क्षणिकायें कब और कहाँ से निकाल लीं मै तो देखकर हतप्रभ हूँ ये तो मैने अपने शुरुआती दिनो मे लिखी थीं…………बहुत ही मेहनत और लगन से कार्य को अंजाम दे रही हैं आपकी लगनशीलता को देखकर मै तो नतमस्तक हूँ।

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  7. सारी क्षणिकाएँ गहन अभिव्यक्ति दे रही हैं ... खूबसूरत रचनाएँ

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  8. वाह जी , सभी बहुत ही प्यारी और सुंदर हैं और हमेशा की तरह प्रभावित करने वाली भी । बहुत ही सुंदर क्षणिकाएं हैं

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  9. वन्दना जी की क्षणिकायें बहुत अच्छी लगें। आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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