आज बैटरी ख़त्म है , जाओ कोई दो पेंसिल बैटरी लाओ ... तब तक मैं सुनता हूँ कुछ रचनाएँ ..... क्या धक्कम धुक्की है , ठीक है बैठो तुम भी सुन लो , पर अगले कार्यक्रम के पहले बैटरी ला देना , मुझे चलना है न ....

संदेशे तब और अब

यूँ ही बैठे बैठे
याद आए कुछ बीते पल
और कुछ ....
भूले बिसरे किस्से सुहाने
क्या दिन थे वो भी जब ....
छोटी छोटी बातों के पल
दे जाते थे सुख कई अनजाने

दरवाज़े पर बैठ कर
वो घंटो गपियाना
डाकिये की साईकल की ट्रिन ट्रिन सुन
बैचेन दिल का बेताब हो जाना
इन्तजार करते कितने चेहरों के
रंग पढ़ते ही खत को बदल जाते थे
किसी का जन्म किसी की शादी
तो किसे के आने का संदेशा
वो काग़ज़ के टुकड़े दे जाते थे

पढ़ के खतों की इबारतें
कई सपनों को सजाया जाता जाता था
सुख हो या दुख के पल
सब को सांझा अपनाया जाता था
कभी छिपा के उसको किताबों में
कभी कोने में लटकती तार की कुण्डी से
अटकाया जाता था

जब भी उदास होता दिल
वो पुराने खत
महका लहका जाते थे
डाकिये को आते ही
सब अपने खत की पुकार लगाते थे

पर अब ....

डाकिया बना एक कहानी
रिश्तों पर भी पड़ा ठंडा पानी
अब हर सुख दुख का संदेशा
घर पर लगा फोन बता जाता है
रिश्तों में जम गयी बर्फ को
हर पल और सर्द सा कर जाता है
अब ना दिल भागता है
लफ़ज़ो के सुंदर जहान में
बस हाय ! हेलो ! की ओपचारिकता निभा
कर लगा जाता है अपने काम में ...

रंजना (रंजू ) भाटिया


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"पेड़ या ताबूत"

आपको याद है न,
वो पेड!

नहीं! बरगद का नहीं!

अरे!


वो! जो आप सब के साथ,
जवाँ हुआ था,


अरे वो ही!

जो पौधे से वृक्ष बनने की कथा,
बडे दिलचस्प अँदाज़ मे बयाँ करता था!!

जिस के नीचे,
कई प्रेमी जोडे,
कभी न बिछ्डने की
कसम खा के,गये

और फ़िर कभी
लौट के न आये,
’एक साथ’!

और जो गुहार लगाता था,
कि अगर कुछ नहीं हो सकता,
तो मुझे जाने दो,
पेपर मिल के आहते में,
और बन जाने दो,
हिस्सा उस कहानी का जो,
लिखी जाये मेरे सफ़ों पे,

अब पेड नहीं रहा,
टिम्बर बन गया,
वो पिछले हफ़्ते,

सुना हैं,
एक ताबूत बनाने वाली फ़र्म को मिला है
ठेका!
उस जीते जागते दरख्त को,
ताबूतों मे तब्दील कर देने का,
ता कि ता ज़िन्दगी जो,
बात करता रहा "ज़िन्दगी" की,

उसे भी!

एहसास तो हो कि,
मौत भी कितनी हसीन और अटल सच्चाई है!





कुश शर्मा


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खुद भी अंजान

उसे जानना है मेरे बारे में सब कुछ,
मैं हंस दी
उसके इस सवाल पे
सब कुछ क्‍या होता है
उसने कहा ...
आपकी चाहत, खुशी और हंसी ,
आपकी पसंद
मैं सोच में पड़ गई
क्‍या कहती
इन बातों से तो मैं खुद भी अंजान थी
मेरी चाहत ...
मन ही मन सोचा
अपने बारे में कभी सोचा ही नहीं मैने
तो उसे क्‍या बताऊं ...
मेरी खुशी ..
दूसरों के चेहरे पर मुस्‍कान
के सिवा कभी कुछ चाहा ही नहीं
मैं उन्‍हीं खुशियों के बीच
रही हंसती सदा
मेरी पसंद भी ऐसी ही है
जो सबको भा जाए
वही मुझे पसंद है ...
उसने अपनी पलकें
हैरानी से झपकाईं
ऐसा भी कहीं होता है
मैने एक लम्‍बी सांस ली
ऐसा होता तो नहीं
पर शायद मेरे साथ ऐसा हो गया है ...।
=
गीता की शपथ

तुम जानते हो,
न्‍याय का मंदिर
हमारे देश का कानून
आज भी गीता की शपथ
लेकर सच कहने को कहता है
उसे विश्‍वास है
श्री कृष्‍ण ने
अन्‍याय नहीं किया था
कौरवों के साथ
न्‍याय था उनकी नजरों में
पांडवों का साथ देना
अपने पराये का पाठ
गीता का सत्‍य के रूप में
स्‍थापित होना
झूठ की अनगिनत
दलीलों के बीच
सच कहना ... सच सुनना
सच को साबित करना
हर रिश्‍ते से ऊपर
इंसाफ की दुहाई देना
न्‍याय और सिर्फ न्‍याय करना
गीता की शपथ देना
गुनहगार हो या निर्दोष
कर्म की प्रधानता बता
सत्‍य कहना ... सत्‍य सुनना ...।।

सीमा सिंघल (सदा)



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तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?

प्रभु मैं हूँ -
तुम्हारी ही कृति .. ..
मनुष्य रुपी ये तन ..
और गुण- अवगुण से भरा मन .......
तुम्हीं ने तो दिए ...
प्रसाद रूप मैंने ग्रहण किये ...
इन्हीं को साथ ले कर...
अब चलना है मुझे ...
तुम्हारे पास पहुँचाने का
मन है ...मेरा ...
और अब यह भी प्रण है मेरा ..
तुम्हारी इस कृति से ...
सुकृती बनना है मुझे ...
तुम तक पहुँचाना है मुझे ..!!

राह दिखती है ..
तुम तक पहुंचती हुई..
और फिर मुड़ जाती है ... !!
ये कैसे असत्य के
घेरे से घिर गयी हूँ मैं ... .....
कितनी ही कोशिश कर लूँ ..
तुम तक पहुँचाने की ...!!
तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?
क्या पात्रता नहीं है मुझमे ..?
मेरी आहत नाद की अर्चना ...
मेरी अनाहत नाद की आराधना ...
शायद मेरे सत्य में...
मेरे कत्थ्य में ..
अभी भी वो
तत्थ्य नहीं ..वो सत्य नहीं ...
जो तुम तक पहुँच सके......!!
मोड़ बढ़ते ही जाते हैं ..
जीवन यात्रा चलती ही जाती है ..
अंतहीन ...अनवरत ..निरंतर ...
किन्तु अटल विश्वास है ..
तुम पर ...स्वयं पर भी ..
खोज लूंगी वो निधि एक दिन ...

मन चिंतन ...
घिरी हुयी विचारों से ...
अब सोचती हूँ...
दीन हीन मलिन ...
शबरी में थी ..
कैसी ..भक्ति..आसक्ति ...
कैसी वो अदम्य शक्ति ....!!
खिला सकी प्रेम वश ..
अपने जूठे बेर भी तुम्हें ...
आज ..
भले ही वो युग नहीं है ...
पर सबकुछ तो झूठ
अभी भी नहीं है ...
दिखती है ..चमकती है ...
दूर ....एक किरण ...

अभी भी दिखती है-
निश्छल मुस्कान...
कुछ चेहरों पर...
कुछ सत्य बाकी है ..
निश्चित ही धरा पर ...
देता है नवचेतना ..
ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
चलना है चलना है ...
चलते ही जाना है ...
जीवन पर्यन्त..
प्रयत्न करते रहना है ....
त्याग कर असत्य का ..
ये ताना-बाना...
सशक्त सत्य को खोजते हुए ..
तुम तक पहुँचना है एक दिन ...!!


अनुपमा  सुकृति 
http://anupamassukrity.blogspot.com.


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इन सारगर्भित रचनाओं के बाद मेरी निगाह जा रही है उस स्थल की और जहां अट्ठारहवें दिन के प्रथम चरण का आगाज़ करने के लिए वेचैन हैं कुछ प्रतिभाशाली रचनाकार, चलिए चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर यानी परिकल्पना ब्लॉगोत्सव की ओर :


nvn

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हिंदी में लिखना अब बहुत आसान है आप अंग्रेजी में टाइप करके ही हिंदी प्राप्त कर सकते है । इस काम...
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कहीं जाईयेगा मत हम फिर उपस्थित होंगे एक अल्प विराम के बाद .....

16 comments:

  1. सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं ,
    ब्लॉग अनेक है पर उद्देश्य एक है -
    सामाजिक सृजनशीलता का सपना .....
    कर रहा है इस उद्देश्य को सार्थक परिकल्पना !

    परिकल्पना पर उत्सव कहें या
    उत्सव की परिकल्पना
    सचमुच अद्वितीय है यह संकल्पना !
    कर रहा है हर उद्देश्य को सार्थक परिकल्पना !!

    आज तक नहीं हुआ अंतरजाल पर ऐसा धमाल
    किया भी तो परिकल्पना ने ही यह कमाल
    दोस्त,इसी को ही कहते हैं बौद्धिक सद्भावना !
    कर रहा है हर उद्देश्य को सार्थक परिकल्पना !!

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  2. Blooger's ke blog links ke saath prastuti sabhi prastut rachnayen bahut badiya lagi....
    Saarthak, sarahaniya prastuti ke liye aapka bahut bahut aabhar!

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज परिकल्पना में शामिल सभी रचनाएँ भावपूर्ण हैं और विश्वास से भरी. सबको मुबारकबाद.

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  4. सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर है! शानदार प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  5. चिट्ठी और डाकिए को अच्‍छा याद किया आपने. यहां भी एक चिट्ठी का जिक्र है, देखें-

    दुनाली पर-
    अन्‍ना को मनमौन की जवाबी चिट्ठी

    उत्तर देंहटाएं
  6. सभी रचनाएं अपने आप में भावों का संसार समेटे है और पाठक को अपने पास रोक लेने में सक्षम....
    लेकिन यह समय न रुके... आभार...

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  7. सभी कवितायों को यहाँ एक साथ पढना अच्छा लगा

    हर रचनाकार की अपनी अलग ही कृति है ........आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. सभी रचनायें बहुत अच्छी हैं। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सारी रचनाएँ वेहद उम्दा है, बधाईयाँ !

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, सुन्दर सचानाओं का संयोजन और सुन्दर अभिव्यक्ति हेतु आभार !

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  11. रंजू जी ,सीमा जी और कुश जी की उत्कृष्ट रचनाओं के साथ मेरी रचना को भी स्थान देने के लिए मैं आभारी हूँ .....''परिकल्पना'' की ...!!

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  12. जीवन के विभिन्न पक्षों को सशक्त ढंग से रखा गया है इन कविताओं में।

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  13. परिकल्‍पना के इस उत्‍सव में मेरी रचनाओं को स्‍थान देने के लिये आदरणीय रश्मि जी एवं रवीन्‍द्र जी की आभारी हूं ...।

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  14. sabhi rachnayen bahut achi hain par "sandeshe tab aur ab" aur khud bhi anjan" dil ko chu gayi :)

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  15. saare chune hue phool hain iss bagiya me...ek se badh kar ek saandaar rachna:)

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