मन में अजीब सा हुआ उसे बाहर निकालते वक़्त
बात उम्र की नहीं , उस मन की होती है - जो समय की हर छोटी से छोटी बातों की , एहसासों की पोटली बांधता जाता है और देखता है, वह कहीं , किसी पोटली में नहीं , करता है मजबूत अपने कांपते से मन को , पत्ते से एहसासों को बनाता है दरख़्त और ........ टप टप बहते आंसुओं के मध्य खुद को समझाता है- सबकुछ बेमानी थे , मैंने ही देर लगाईं समझने में ...
मैं - समय , देखता हूँ सब और अपनी पोटली में इन आंसुओं को सहेज लेता हूँ ..... लाया हूँ कुछ आंसू, जो कोई न कोई हल देकर जायेंगे आपको

मेरी पोटली

काफी जतन से संभाल के रखी थी मैंने
अपनी पोटली
पोटली
कुछ खट्टी मीठी यादों की
फटे पुराने कागजों की
कुछ डेयरी मिल्क के रैपर्स की
और बिल्कुल ही फालतू सी बातों की ...

कई दिन , महीने बीत गए ..
उसे बेमतलब जब कहा जाता ,
तो बुरा लगता था ..

सफाई करने के लिए
फिर आज वो पोटली मैंने निकाली
मेरे चेहरे पे एक पल के लिए मुस्कान आई
पर दूसरे ही पल , मुझे वो बेवजह सी लगी

हैरानी की बात है
आज ...
वो पोटली मेरे घर के बाहर है ..
मैं ही रख के आई वो ..


जबकि तुमने मुझसे वो सवाल
सिर्फ एक बात करने के तरीके की तरह पूछा

क्यूँ भेजूं मैं तुम्हें कुछ कुछ लिख के
जब तुम्हारा उन पर कभी जवाब ही नहीं आया

तुम्हारी कई बातों से धीरे धीरे मन अलग होता गया

अगली बार जब तुम मुझे तुम्हारे लिए कुछ मन से करते नहीं देखो
तो मुझसे मत पूछना "क्यूँ "
खुद से सवाल करना , कि मुझ में ये बदलाव क्यूँ आया ..पर , अब खुद को लगा , बेमतलब की है वो ..
कई चीज़ों से मन अचानक ही कट गया ..
और लगा ,
किसी से जुड़ने या अलग होने में
बहुत वक़्त नहीं लगता ..
एक पल ही काफी होता है ..
क्यूँ सोचूं मैं कि तुम ठीक हो या नहीं


अपराजिता कल्याणी
http://thisis-me-aprajita.blogspot.com/
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नन्ही कवियित्री की नन्ही कविता के साथ चलिए अब हम आपको ले चलते हैं कार्यक्रम के दूसरे चरण में जहां मजूद हैं कई चर्चित ब्लॉगर अपनी सारगर्भित रचनाओं के साथ :  
 


विजय माथुर उपस्थित हैं कैकेयी पर एक नया विमर्श लेकर



वरिष्ठ लेखिका निर्मला कपिला जी उपस्थित हैं अपनी दो ग़ज़लों के साथ


पद्म सिंह काव्य के माध्यम से कर रहे हैं मुद्दों की बात


अजय कुमार झा का कहना है कि अपने ही घर में मुझे सब मेहमान बना देते हैं



इसी के साथ ब्लॉगोत्सव में आज के कार्यक्रमों को विराम देते हैं, क़ल ब्लॉगोत्सव में अवकाश का दिन है, मिलते हैं परसों यानी  छ: जुलाई को सुबह ११ बजे परिकल्पना पर, तबतक के लिए शुभ विदा !

17 comments:

  1. क्यूँ भेजूं मैं तुम्हें कुछ कुछ लिख के
    जब तुम्हारा उन पर कभी जवाब ही नहीं आया
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है ...।

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  2. बहुत अच्छी लगी अपराजिता जी की कविता .


    सादर

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  3. परिचयात्मक कविता उम्दा है.मेरे लेख को स्थान देने के लए बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  4. "रिश्ते का पौधा दोनों और से ना सींचा जाय तो सूखने लगता है.... "
    अपराजिता को एक खुबसूरत रचना के लिए बधाई...
    सादर...

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  5. बड़ी ही प्यारी सी कविता लिखी है...अपराजिता ने
    शुभकामनाएं

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। रश्मि जी एक सुझाव है कि या तो सब की रचनायें यहीं पर दें या फिर सब के लिन्क क्योंकि लिन्क शायद कोई नही खोलता। एक ही ब्लाग पर रोज़ इतना समय कोई नही देता इसे सच मानिये और सब की मजबूरी भी। इसे अन्यथा न लें। धन्यवाद।

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  7. sach kaha kayi bar to bahut waqt lag jata hai kisi se alag hone me aur kayi baar alag hone se pahle yahi baat uthti hai ki khud se sawaal karna ki kyu mujhme ye badlaav aaya....bahut sunderta aur saadgi se bhaavo ko dhaal diya hai rachna me.

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  8. इस पोटली ने अपनी पोटली की याद दिला दी...बहुत अच्छी कविता

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  9. क्यूँ सोचूं मैं कि तुम ठीक हो या नहीं


    par dil hai ki fir bhi kabhi kabhi ye soch hi leta hai ki kahan ho tum aur kaise ho


    bahut pyari kavita

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  10. किसी से जुड़ने या अलग होने में
    बहुत वक़्त नहीं लगता ..
    जिन्दगी के इर्द-गिर्द का फलसफा

    उत्तर देंहटाएं

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