स्वागत है पुन: आप सभी का परिकल्पना पर ...

बहुत करीब से जाकर मिलो
तो हर शख्स खुद से जुदा लगता है....
टकराता मैं सबसे हूँ , बढ़ भी जाता हूँ
पर कहीं कहीं रुकना ज़रूरी होता है ! ......... क्या लगता है तुम्हें कि समय यूँ हीं निरंतर चलता जाता है . नहीं नहीं - ऐसा कैसे समझ सकते हो तुम सब ! तुम अपनी रफ़्तार में भले भूल जाओ पर जानते तो ही मैं ही मंथन करता हूँ, मैं ही सुनामी लाता हूँ , मैं ही प्रयोजन बनाता हूँ, रास्ते खोलता हूँ, बन्द करता हूँ ........ मैं सहस्त्र दृष्टियों से अहर्निश भाव से तुम सबको देखता हूँ , विधि का विधान मैं , निर्माण मैं ........ बहुत हुआ स्व परिचय , मैं लाया हूँ ब्लॉग के पन्ने से एस .एम् हबीब को


समस्त सुधि मित्रों को सादर नमस्कार। आज बचपन में पढ़ी एक कहानी मेरे हाथ आ गयी.... शेर का फंदे में फंसना , चूहे का जाल कुतरना... बड़ी शिक्षाप्रद कथा है। आज के परिवेश में उस कथा को परखने और विचारने का प्रयास किया तो एक सांकेतिक व्यंग्य रचना बन पडी। प्रस्तुत है -

"चूहा और शेर"

शेर के
शक्तिशाली पंजे में दबे
चूहे ने मिन्नत की-
"हुजुर, माईबाप,
मुझे छोड़ दें
मैं आपके काम आउंगा,
वक़्त आने पर
पिछली बार की तरह
जाल कुतर कर
आपको आज़ाद कराऊंगा..."

शेर ने पंजे का
दबाव बढ़ाया,
चूहे की कराह पर
कुटिलतापूर्वक मुस्कराया
बोला- "नादान चूहे,
मैंने उस समस्या को ही
ख़त्म कर दिया है,
शेरनी के नाम पर
जाल बनाने वाली कंपनी का
फिफ्टी परसेंट शेयर
खरीद लिया है...
अब तो बस हम
उन्हें जाल बिछाने की
जगह बताएँगे
जितने फसेंगे उसका आधा
वे ले जायेंगे, और
आधा मैं और शेरनी
आराम से खायेंगे।

चूहे, तुम्हें छोड़ दिया तो तुम
अपनी हरक़त से बाज नहीं आओगे,
जाल कुतरोगे
और हमें नुकसान पहुँचाओगे।
इसलिए बहुत जरुरी है,
तुम्हें खाना
मेरी मजबूरी है..."

कहता हुआ शेर
चूहे को पान की तरह चबा गया,
उसके चहरे पर
निश्चिंतता का भाव आ गया।

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और अब एक स्वीकार्य भाव
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"स्वीकारोक्ति"

प्रभु...!
मैं पुनः छला गया....

मैंने देखा था - शैतान,
सांप का रूप धर आया था
सो, तमाम वक़्त
बचाता रहा स्वयं को
विषधरों से,
फिर भी मैं
धोखा खा ही गया.....!!

शैतान इस बार सांप नहीं
इंसान के भेष में आ गया
बहका कर
"स्वार्थ के वृक्ष का
प्रतिबंधित फल" खिला गया....
*
भूल गया फिर
तेरी शिक्षा, तेरा उपदेश
याद रहा केवल आवेश
मैं जला, जलाता गया,
आदर्शों का लहू
बहाता गया....
बहाता गया...

अब, जब नशा
उतरने को है - स्वार्थ का,
डर रहा हूँ,
अदन से निष्काषित हो कर
जमीन पर आया था,
कहाँ जाउंगा
अगर यहाँ से भी निकाला गया...!!!!




एस.एम् हबीब









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हबीब साहब की अभिव्यक्ति के साथ आईये आपको आज के द्वितीय चरण के कार्यक्रमों से रूबरू करा दूं :


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सीता की कूटनीति का कमाल



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सुख में सुमिरन ….



कबीर रहता है मेरे मन में खड़ा होता है भरी भीड़ में टूटते भंग होते मोह को देख रोता है जार जार सन्नाटे...
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सफलता की खुशबू की खनक बड़ी गहरी होती है !



साझा संवाद,साझी विरासत,साझी धरोहर, साझा मंच आप जो मान लीजिये परिकल्पना ब्लॉगोत्सव  की एक कैफियत...



इसी के साथ आज परिकल्पना ब्लॉगोत्सव के बारहवें दिन का कार्यक्रम संपन्न होता है, फिर मिलेंगे परसों यानी १३ जुलाई को सुबह ११ बजे परिकल्पना पर, तबतक के लिये शुभ विदा !

19 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति ...।

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  2. बहुत बढिया यथार्थ बयाँ किया है।

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  3. मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है! मेरा ब्लॉग का लिंक्स दे रहा हूं!

    हेल्लो दोस्तों आगामी..

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  4. हबीब जी के लिए शुभकामनाएं.

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  5. यथार्थ को बयान करती हुई सशक्त अभिव्यक्ति है हबीब जी की, अच्छा लगा पढ़कर !

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  6. सच में अच्छी रचना है, शुभकामनाएं हबीब जी !

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  7. बहुत सुन्दर और सारगर्भित प्रस्तुति के लिए आभार परिकल्पना !

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  8. बहुत करीब से जाकर मिलो
    तो हर शख्स खुद से जुदा लगता है....
    टकराता मैं सबसे हूँ , बढ़ भी जाता हूँ
    पर कहीं कहीं रुकना ज़रूरी होता है ! ..

    बहुत सुन्दर,बहुत बढ़िया !

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  9. हबीब सर की कवितायेँ बहुत अच्छी लगीं.


    सादर

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  10. वर्तमान हालातों को बयां करती रचना प्रस्तुति के लिए आभार!

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  11. शानदार ब्लोग !
    बेहतरीन वेब मैग्जीन !
    मनोरम कविताएं !
    हबीब जी की कविताएं प्रभावित करती हैं !
    फ़िर आऊंगा !
    यहां अच्छी सामग्री है---मन रमेगा !
    साधुवाद्फ़ !

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  12. पंचतंत्र की कहानियों ने जंगली जानवरों को भी खबरदार कर दिया है , मगर अब तो जानवर भी इंसानों के भेष में !
    दोनों कवितायेँ यथार्थ के करीब लगती हैं !

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  13. हबीब जी को पढना बहुत अच्छा लगा ..ज्यादा परिचय नही था मेरा आज आपके जरिए वो भी हो गया ..धन्यवाद ...

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