छोटी छोटी कहानियों में बहुत कुछ मिल जाता है ... लघु कथाओं की अपनी खूबी होती है ! इस खूबी के साथ हैं आज रंगमंच पर श्याम कोरी उदय जी

आत्म संतुष्टि !
भिखारी बस अड्डे पे बैठ कर भीख मांग रहा था, सामने से एक सेठ गुजरा, भिखारी ने राग अलापा ... गरीब भूखा है कुछ दे दो सेठ जी भगवान भला करेगा ... सेठ जी अनसुनी करते हुए चले गये ... भिखारी मन में भगवान को याद करने लगा ... हे भगवान तू मुझे भी सेठ बना दे ... तभी अचानक सामने एक साधु प्रगट हो गये ... "बोल वत्स मुझे क्यों याद कर रहा है" .... प्रभु आप भगवान हैं ... हां बोल क्या चाहता है ... प्रभु भले में भिखारी का भिखारी रहूं पर मुझे एक बार करोडपति सेठ बना दो ... तथास्तु ... एक "गुरुमंत्र" देकर चले गये ... भिखारी आश्चर्य भाव में बैठकर चिंतन करने लगा ... फ़िर वह "गुरुमंत्र" का पालन करने लगा ... आठ-दस सालों में वह करोडपति सेठ बन गया ... संयोग से उसकी मेरे साथ जान पहचान हो गई .... उस समय में कठिन दौर से गुजर रहा था ... वह जानता था मेरे हालात ... फ़िर भी ... जब भी वह मिलता यही कहता ... भाई साहब चाय पिला दो भगवान आपका भला करेगा ... आज फ़िर उसी अंदाज में, चाय पिलाकर सेठ जी को रवाना किया ... उसके जाने के बाद मैं भगवान को याद करने लगा ... भगवान जी प्रगट हो गये .. बोल वत्स क्यों याद किया ... हे प्रभु कैसे कैसे लोगों को सेठ बना देते हो जो खुद चाय भी नहीं पी सकते ... वत्स ये बता उस भिखारी सेठ को चाय पिला कर तुझे कितनी खुशी मिली ... मतलब मेरी खुशी के लिये ... धन्य हैं आप प्रभु ... और धन्य है आपकी माया !!

एक सबक : पटकनी !
दो मित्र पप्पू-गप्पू जिन्दगी के सफ़र पर ... पप्पू को एक सेठ के यहां नौकरी मिल गई ... सेठ को घुड़सवारी व घोड़ा दौड़ का शौक था उसने एक घोड़ा पाल रखा था ... घोड़ा की देख-रेख व् पालन-पोषण की जिम्मेदारी सौंप दी गई ... जल्द ही घुड-दौड़ होने वाली थी पर सेठ चिंतित था क्योंकि उसका घुड़सवार नौकरी छोड़ कर दूसरे सेठ के यहां चला गया था ... सेठ ने यह चिंता पप्पू के सामने जाहिर की तो पप्पू ने कहा मैं एक नया घुड़सवार ले आता हूं ... पर किसी अनुभवी घुड़सवार को लेकर आना क्योंकि "घुड-दौड़" शुरू होने वाली है ... आप चिंता न करें मेरा मित्र है उसे सब कुछ सिखा दूंगा ... तब ठीक है ...

...पप्पू ने गप्पू को समझाया तथा नौकरी पर ले आया ... गप्पू को घुड-दौड़ व् घुड़सवारी की सम्पूर्ण जानकारी सिखाने लगा ... धीरे-धीरे गप्पू घुड़सवारी में माहिर हो गया ... और सीधा सेठ से संपर्क साधने लगा तथा पप्पू को नीचा दिखाने का भाव प्रदर्शित करने लगा ... साथ ही साथ उसे घुड़सवार होने का घमंड भी आ गया ... एक-दो अवसर पर उसने पप्पू को नीचा दिखाने व कुशल घुड़सवार होने का दम दिखाने का प्रयास करते हुए नजरअंदाज करने का प्रयास भी किया ...

... पप्पू उसके हाव-भाव को देख व समझ रहा था ... घोड़ा-दौड़ में एक सप्ताह का समय बचा था उसने गुपचुप तरीके से एक नए घुड़सवार की तलाश शुरू की तथा समय-समय पर सेठ को भी अपने ढंग से तैयारी बताते जा रहा था ... जैसे ही उसे एक नया घुड़सवार मिला उसने सेठ के सामने पेश किया तथा उसके अनुभव के आधार पर नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा ... सेठ ने पप्पू की कार्यक्षमता व् प्रतिभा के आधार पर सुझाव पर सहमति प्रदाय कर दी ...

... दूसरे ही दिन पप्पू ने नए घुड़सवार को घोड़ा सौंपा तथा गप्पू को कहा ... घुड-दौड़ होने वाली है सेठ को तेरा काम पसंद नहीं आया तथा वह दौड़ हारना नहीं चाहते इसलिए नया घुड़सवार नियुक्त कर लिया है ... एक काम कर तू नई नौकरी की तलाश अपने स्तर पर कर मैं भी तेरे लिए एक नई नौकरी तलाश करता हूँ ... गप्पू बातें सुनकर तिलमिला गया और बोला इस नए घुड़सवार से अच्छा तो मैं घुड़सवारी करता हूँ ... मुझे मालुम है पर अभी तू शांत रह ... सेठ से झगड़ा भी नहीं कर सकते की तुझे क्यों निकाल दिया ...

... गप्पू तिलमिलाहट में इधर-उधर नई नौकरी की तलाश में भटकने लगा ... पर उसे नौकरी नहीं मिली ... धीरे-धीरे उसे यह भी समझ आ गया की पप्पू ने ही उसे "पटकनी" दी है क्योंकि जब वह उस नियुक्त नए घुड़सवार के पास बैठा तो उसे उसकी बातें सुनकर समझ आया की पप्पू ने ही उसे नौकरी पर लगवाया है ... नए घुड़सवार को सारे हालात मालुम थे इसलिए उसने गप्पू से कहा - यार एक छोटी-सी बात बोलता हूँ नाराज मत होना, ये मेरी जिन्दगी का भी कटु अनुभव है "बेटा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, पर बाप से बड़ा नहीं हो सकता " !!

दानवीर सेठ !
एक सेठ जी को महान बनने का विचार मन में "गुलांटी" मार रहा था वे हर समय चिंता मे रहते थे कि कैसे "महान" बना जाये, इसी चिंता में उनका सोना-जगना , खाना-पीना अस्त-व्यस्त हो गया था। कंजूसी के कारण दान-दया का विचार भी ठीक से नहीं बन पा रहा था बैठे-बैठे उनकी नजर घर के एक हिस्से मे पडे कबाडखाने पर पड गई खबाडखाने के सामने घंटों बैठे रहे और वहीं से उन्हे "महान" बनने का "आईडिया" मिल गया। दूसरे दिन सुबह-सुबह सेठ जी कबाड से पन्द्रह-बीस टूटे-फ़ूटे बर्तन - लोटा, गिलास, थाली, प्लेट इत्यादि झोले मे रखकर निकल पडे, पास मे एक मंदिर के पास कुछ भिखारी लाईन लगाकर बैठे हुये थे, सेठ जी ने सभी बर्तन भिखारियों में बांट दिये, बांटकर सेठ जी जाने लगे तभी एक भिखारी ने खुद के पेट पर हाथ रखते हुये कहा "माई-बाप" कुछ खाने-पीने को भी मिल जाता तो हम गरीबों की जान में जान आ जाती, सेठ जी ने झुंझला कर कहा "सैकडों रुपये" के बर्तन दान में दे दिये अब क्या मेरी जान लेकर ही दम लोगे ....... झुंझलाते हुये सेठ जी जाने लगे ...... तभी पीछे से भूख से तडफ़ रहे भिखारियों ने ...सेठ जी ... सेठ जी कहते हुये बर्तन उसके ऊपर फ़ेंक दिये और बोले .... बडा आया "दानवीर" बनने।


श्याम कोरी 'उदय' !! .......








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श्याम कोरी उदय की लघुकथाओं को लेकर आईये चलते हैं ब्लॉगोत्सव की ओर जहां अफसर खान जी भी उपस्थित हैं एक लघुकथा के साथ और भी कुछ महत्वपूर्ण है वहां  :


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14 comments:

  1. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिय आभार ।

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  2. लघुकथाओं की अपनी एक अलग महत्ता होती है, उदय जी की सभी लघुकथाएं उम्दा है , पढवाने हेतु आभार !

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  3. छोटी छोटी कहानियों में बहुत कुछ मिल जाता है ... लघु कथाओं की अपनी खूबी होती है ! इस खूबी के साथ हैं आज रंगमंच पर श्याम कोरी उदय जी...अच्‍छी प्रस्‍तुति ...!

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  4. बहुत सुन्दर और चिंतन से भरपूर पोस्ट , बधाईयाँ

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  5. तीन की तीनों कथाएँ बेजोड़ हैं....

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  6. रोचक और संदेशात्मक कथाएं पढ़कर आनंद आ गया... उदय जी का आभार....
    सादर,,,,

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  7. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  8. ... आप सभी के गरिमामय स्नेह की अपेक्षा सदैव रहेगी, आभार !!

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  9. कथा लघु भले होत हैं, करे प्रेरक प्रसंग बखान। उद्देश्य परक, सीख देत यदि, इसे छोटा कभी न जान। बहुत अच्छी रचना……बधाई…

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  10. अच्‍छी प्रस्‍तुति। लघुकथा लिखना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है, कारण कि सीमित शब्‍दों में ही पूरी कसावट और अर्थ गाम्‍भीर्य के साथ अपनी बात कहनी होती है।

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