आजकल सुधा जी फी लन्दन में हैं , अनुरोध पर आई है .... देर ना करके मिलते हैं उनसे और उनकी लघुकथाओं से और एक पेंटिंग - अनकही व्यथा से

२००७ में जब तीन मास को लन्दन आई तो प्रश्न था किस तरह समय खूबसूरती से गुजारा जाय| इसी तलाश में हौंसलो लाइब्रेरी (Hounslow library ,Centre Space,Treaty centre)गयीI

वहाँ स.बलराम के कई लघुकथा संग्रह 'बीसवीं सदी की लघुकथाएँ 'पढ़ेI .हर लघुकथा गागर में सागर प्रतीत हुईI कुछ तो हमेशा के लिए मस्तिष्क पटल पर छाप छोड़ गईं जैसे सर्वोत्तम चाय ,नाग पूजा |एक दिन कम्प्यूटर खंगालते -खंगालते laghukatha.com पर निगाह पड़ गईI रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु 'व सुकेश साहनी ,बलराम अग्रवाल के लघुकथा साहित्य द्वारा इस विधा की गहराई जIनीI भारत जाकर सबसे पहला काम किया --डायरी निकालकर उस पर लिख दिया ---जीवन की छोटी -छोटी घटनाएँ ही लघुकथा का रूप धारण कर लेती हैं I डायरी खोली --देखा ----२-३ लघुकथाएँ तो पूरी की पूरी तैर रही हैं I मुझमें विश्वास पैदा हुआ -मैं लघुकथा लिख सकती हूँ
I
संयोग की बात है कि इस बार भी यहाँ आने पर , मतलब - २०११-लन्दन में उसी लाइब्रेरी में अन्य लघु कथाकार बलराम अग्रवाल द्वारा लिखित लघुकथा संग्रह 'जुबैदा 'पर आँखें पड़ीं तो प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भीI प्रसन्नता इसलिए कि भारत में तो नहीं पर यहाँ तो पढ़ने का मौका मिला !आश्चर्य इसलिए कि विदेश में भी हिंदी साहित्य का इतना ज्यादा भण्डार !'जुबैदा' ही आजकल मैं पढ़ रही हूं I

इसकी अधिकांश कथाएं सोते को जगाने वाली ,जागने वाले को कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देने वाली हैं I
लिखने वाले को पढ़ना भी जरूरी है इसलिए डा.रामकुमार घोट ड़,अमर गोस्वामी ,और अशोक गुजराती की लघुकथाओं के पठन को भी उत्सुक हूँ I इस उत्सुकता की लौ को बढ़ाये रखना है ताकि ठहराव की गंध से घिराव न हो I

दो लघुकथाएँ /सुधा भार्गव
//१//
धर्म बेटा

कीचड़ बस्ती के लोगों को माधो कालोनी में आवास गृह योजना के अंतर्गत कम लागत पर छोटे छोटे फ्लेट मिल गये । वैसे तो हफ्ते में वहाँ एक दिन बिजली आती थी और एक दिन में एक घंटे को पानी , तब भी खुशी से सब झेलते ।अभावों को सहने के आदी जो थे।

कानू लंगड़े के परिवार ने तीन -तीन फ्लेट हथिया लिए थे। सब चकित से हिंडोले में -इस लंगड़े ने कौन सी चाल चली कि सारी गोटियाँ उसकी झोली में आन पड़ीं।
एक अफसर की ड्यूटी लग गई -पता लगाने को कि क्या चक्कर चल रहा है ।
एक दिन उस अफसर को सीढ़ियाँ चढ़ते समय एक वृद्ध मिला जो लुढ़कते-लुढ़कते बचा।वह तो भला हो उस अफसर का जिसने उसे संभाल लिया।
-बाबा ,अकेले मत उतरा -चढ़ा करो।
-मैं तो अकेला ही हूं ।किसका सहारा ! आज को मेरा बेटा जिन्दा होता तो तुम्हारी उम्र का होता।
-मुझे ही अपना बेटा समझ लो ,चलो --तुम्हें कमरे तक छोड़ आऊँ।

दूसरे दिन अफसर फिर आया , अपने बाबा के लिये दूध ,फल और रोटी लेकर। सिलसिला चलता रहा पासा फेंका जाता रहा।
बाबा साँस का मरीज--- खांसते -खांसते दोहरा हो जाता। उसकी काया तो जैसी थी वैसी ही रही--- हाँ !फ्लैट की काया अच्छी खासी बदल गई।
खिडकियों पर परदे झूलने लगे। नये पलंग पर नई सफेद चादर और उस पर बाबा का आसन, पास में रखी दो कुर्सियां आगंतुकों के लिये।
-बेटा जुग -जुग जीओ ।बहुत सेवा कर रहा है । मुझे किसी अच्छे डाक्टर को और दिखा दे | २-३ दिन से साँस न आ रही है न जा रही है ---पसलियाँ दर्द से छलनी.हुई जा रही हैं।
-कल अच्छे से डाक्टर को दिखाऊंगा और दवा भी लाऊँगा।
वह' कल 'कभी न आया । हाँ ,अफसर जरूर हर सुबह नियम से आ जाता ।
देखने वाले कहते -वाह भई वाह ---क्या तकदीर पाई है।इतना तो अपना बेटा भी न करता।

उस दिन उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि बेहोशी छाने लगी। बीच बीच में आवाज सुनाई देती --दवा--दवा| अफसर दवा के नाम पर दो बूंद पानी उसके गले में टपका देता।कुछ क्षणों को बाबा खामोश हो जाता --भ्रमित --दवा तो पड़ ही गयी है |खामोशी के जंगल में अंतिम सांसें विलीन होने से पहले अफसर ने अपनी जेब से एक कागज निकाला ---
-बाबा पढ़ना जानते हो ?
-ना ---ना ----।
--अच्छा !अपना अंगूठा तो दो---नहीं उठता ----ओह ---मैं मदद करता हूं ---I
उसने अंगूठे को झटके से हाथ में थामा , इंक पैड पर रखकर दबाया।फिर कागज पर उसकी छाप ले ली।चोर निगाहों से इधर -उधर देखा I फुर्ती से कागज को मोड़कर अपनी जेब में रख लिया।
वृद्ध को आख़िरी हिचकी आई। अफसर की साँस में साँस आई I शान से दाह कर्म हुआ I अफसर बेटे ने मुखाग्नि देकर सहानुभूति भी बटोर ली।
अगले महीने उस फ्लैट को किराये पर उठा दिया । इधर रहने वाला बदला उधर ड्यूटी पर रहनेवाला अफसर भी बदल गया।
नये अफसर ने एक दिन वृद्ध का दरवाजा खटखटाया । एक युवक ने उसे खोला --
-क्या तुम वृद्ध के बेटे हो ?
-नहीं !मैं किरायेदार हूं ।
-मालिक कौन है ?
-श्रीकांत जी --आवास कार्यालय के इज्जतदार अफसर --नाम लेते ही देखिये-- वे आ गये --।
श्रीकांत ने तपाक से अपने सीनियर से हाथ मिलाया।
-ओह तुम !ये बता रहे हैं इस फ्लैट पर तुम्हारा मालिकाना हक़ है।
-हाँ --हाँ कोई शक है !
अचम्भा------ आँखों में तैर गया।
-भई क्या बताएं --मैं उस वृद्ध का धर्म बेटा हूं । मरने से पहले मुझे ही अपना वारिस बना गया । कहिये तो पेपर दिखा दूँ।

सीनियर के मुँह पर स्टांप लग चुकी थी । श्री कान्त चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए एक हाथ से जेब के पेपर को सहला रहा था तो .दूसरे हाथ से थपथपा रहा था अपनी पीठ । उसे मालूम हो गया था पासा किस प्रकार फेंका जाय कि वह अपने गोले में ही आकर पड़े।

//२//
परीक्षा    

अनेक देवी -देवताओं की मन्नतों के बाद सुरया के लड़का हुआ था !एक माह के बाद उसके हाथ की हड्डी टूट गई और प्लास्टर चढ़ गया। हंसते खेलते बच्चे को पीड़ा से तिलमिलाते देख सुरयाके दिल में दर्द के फफोले फूट पड़े I

उसका बेटा पुजारी की कृपा से हुआ था !ऐसे बच्चे उसके समाज में देवी के चरणों का प्रसाद समझे जाते हैं | वह तभी मिलता है जब माँ बाप परीक्षा में खरे उतरें!

आज परीक्षा का दिन था।

छत से फेंके बच्चे को लपकना था।पुजारी ने नवजात शिशु को मंदिर की छत पर खड़े होकर नीचे फ़ेंक दिया ! माँ -बाप ने बच्चे को ममतामयी बाँहों के घेरे में ले तो लिया पर उसकी हड्डी टूट गई |

बालक के अस्वस्थ होने की खबर सुन कर सुरया की बुआ आई और सांत्वना देने लगी !सिर पर हाथ फेरा - - बेटी ,परीक्षा तो तुमने पास कर ही ली !कुछ दिन में बच्चा ठीक हो जायेगा !

-'बुआ ,अभी तो परीक्षा अधूरी है !दूसरा बच्चा होने पर उसकी बलि देनी होगी !जो देवी ने दिया उसे लौटाना होगा।
सुरया की आँखों से नदी फूटकर बहने लगी।

एक निस्सहाय माँ धर्म के नाम पर औलाद के असुरक्षित ,अंधकारमय भविष्य की मर्मान्तक पीड़ा के कारण जीते जी मौत की खाई में धकेल दी गई थी।

सुधा जी की पेंटिंग
अनकही व्यथा


* * * * * * *सुधा भार्गव
-तूलिका सदन (लिंक ;sudhashilp.blogspot.com)
-बालकुंज (baalkunj.blogspot.com)
--बचपन के गलियारे (baalshilp.blogspot .com)


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सुधा जी से मिलने के बाद आईए नज़र डालते  हैं  आज के द्वितीय चरण के कार्यक्रमों पर :
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आज तुमने मुझे नितांत अकेला कर दिया , ऐसा लगा जैसे दिल पर किसी ने हजारों नश्तर उतार दिए हों , अब मै...
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जो मरे कोई “नेता” तो रोते है हजारो, झुकते है “झंडे” और “सिर” भी | न होती कोई आँख नम, न पड़ता...
इसी के साथ हम हम देते हैं आज के कार्यक्रमों को विराम और मिलते हैं अगले मंगलवार को यानी १२ जुलाई को सुबह ११ बजे परिकल्पना पर, तबतक के लिए शुभ विदा !

13 comments:

  1. ब्लॉगोत्सव के मायने समझ में आने लगे हैं
    जो भी गुमनाम थे वो अब गुनगुनाने लगे हैं
    आपने तो कर दिया कमाल मेरे दोस्त -
    बेजुवां भी अपने होठ फरफराने लगे हैं !

    आपने सामूहिक रूप से कई लोगों को साथ लेकर ब्लौगिंग में एक नया कीर्तिमान बनाया है...आपको नमन रविन्द्र जी !

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  2. सुधा भार्गव जी को पढ़ना एक नयी अनुभूति से गुजरना है, आभार !

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  3. अनुभूतियों के प्रखर दौर में हैं हम, आपने एहसास करादिया, शुक्रिया ब्लॉगोत्सव की टीम !

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  4. ्दोनो लघुकथायें गज़ब की है………परिकल्पना इस बार फिर एक नया मील का पत्थर रखेगा………बहुत सुन्दरता से आयोजन चल रहा है।

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  5. दोनों लघु कथा विचारोत्तेजक ... एक भ्रष्टाचार को कहती हुई और दूसरी अंधविश्वास को ..

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  6. उद्वेलित करती लघुकथाएं हैं....
    सादर...

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  7. दोनों लघु कथाएँ मन को व्याकुल कर गईं...

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