भ्रष्टाचार और मूल्यहीनता की समस्याएं पहले भी थी । पहले भी टूटते थे मिथक और चटखती थी आस्थाएं । यहाँ तक कि मर्यादाएं लांघने की वेशर्मी पहले भी दिखलाई जाती थी, लेकिन जबसे ग्लोबलाईजेशन का दौर चालू हुआ, सत्ता से लेकर समाज तक में लालच की संस्कृति पैदा हो गई है । हर चीज को आनन्-फानन में हासिल करने की सोच का जन्म हुआ है । हम पा रहे हैं कि राजनीति और समाज में स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की भावना निरंतर कम होती जा रही है । समस्या यह है कि जो अमीर है उसमें एन-केन-प्रकारेण और अमीर बनाने की इच्छा बलबती जा रही है । जो सत्ता में बैठे हैं उन्हें सत्ता जाने का भय इतना सता रहा है कि वे निरंकुश प्रवृति के होते जा रहे हैं । देश के नीति निर्देशकों को जहां पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभानी थी वहीँ वे लोगों को भटकाने के काम में लगे हैं । दरअसल अब राजनीति के केंद्र में आम आदमी है हीं नही । काम उन्हें अमीरों, वहुराश्त्रिय कंपनियों और उनके दलालों के लिए करना है । मार्क्सवाद,समाजवाद जैसी चीजें सोशलिस्ट कैपेटेलिज्म, कम्युनिस्ट कैपेटेलिज्म में बदलती जा रही है ।राजनीति की तब और अब की स्थिति में बहुत फर्क आया है ।   


आधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊँचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी भी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि  पहुँचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है। इस कारण एक ऐसे समाज में जहाँ धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव बना रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । पहले चरित्र को स्व से बड़ा समझा जाता था, किन्तु अब चरित्र से ऊँचा राजनेताओं के लिए स्व हो गया है । जिस प्रकार जुआरी के अड्डे पर वातावरण की पवित्रता की कल्पना नही की जा सकती उसीप्रकार राजनीति की गलियारों में । आज  बिहार का एक व्यक्ति निरीह पशुओं का चारा चट करके भी राजनीति के शीर्ष आसन पर बैठकर वेशर्म जैसी हरकत करता है । झारखंड का एक मामूली मोटर मैकेनिक मुख्यमंत्री बनते ही महज दो-तीन वर्षों में अरबों-खरबों का मालिक बन जाता है । इसे चारित्रिक और मूल्य हीनता की पराकाष्ठा न कही जाए तो क्या कही जाए ?  

जनलोकपाल के मुद्दे पर अन्ना को आड़े हाँथ लेने वाले कॉंग्रेसी नेताओं में से एक की संपति दो वर्षों में २९५ करोड़ तक बढ़ जाती है । एक-एक कर डी. राजा,कलमाडी आदि मंत्री तिहाड़ में पहुँच जाते हैं ।२जी स्पेक्ट्रम घोटाले के सूत्रधारों में अब एक और नया नाम जुड़ गया चिदंबरम साहब का और कई घटनाक्रमों से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रधान मंत्री कार्यालय भी अब इसके शक के दायरे में आ गया है । २जी स्पेक्ट्रम घोटाले में हवालात जाने से पलनिअप्पन चिदंबरम को बचाने के चक्कर में सरकार न्यायालय को लक्षमण रेखा के भीतर रहने की धमकी तक दे डालती है । राजनीति में विशर्मी तो इतना तक बढ़ चुकी है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अपने वरिष्ठ नेताओं और पार्टी प्रवक्ताओं को ताकीद की है कि वे इस मुद्दे पर सरकार की साख बचाने के लिए चिदंबरम का बचाव संयुक्त रूप से करे । इस पूरे घटनाक्रम के बाद कॉंग्रेस की अंदरूनी उठापटक भी जग जाहिर होने लगी है। अंदरूनी मतभेद दूर करने की कवायद भी शीर्ष पदों पर बैठे मौसेरे भाईयों के द्वारा शुरू की जा चुकी है । इस कवायद के तहत प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करने के लिए बिट मंत्री प्रणब मुखर्जी न्यूयार्क पहुंचे । बिट मंत्री ने स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री के साथ हुयी मुलाक़ात में २ जी घोटाले पर बिट मंत्रालय की और से भेजे गए नोट को लेकर हुए खुलासे पर बात हुयी है ।

अब तो मूल्यहीनता राजनीति का पर्याय लगने लगी है । इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे समाज में जनतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति की जड़ें आज़ादी के चौंसठ साल बाद भी दुरुस्त नही हो पाए है  ।  हम सत्ता की राजनीति में प्राय: सामंती मिजाज से काम करते हैं  ।  खासतौर पर अगर किसी को वोट के जरिए बहुमत मिल जाए , तो वे अपने आप को जनसेवक की बजाय जनता के मालिक और माई-बाप की नज़र से सोचने लगते हैं  । अपने आप को सर्व शक्तिमान समझने लगते हैं  । संसद से सड़क तक गाली-गलौज, गलत और सही आधारों पर हिंसा,धन और बाहुबल का जोर,अपराधियों का महिमा मंडन के साथ-साथ भ्रष्टाचारियों की जय जयकार करने की प्रवृत्ति राजनीति का हिस्सा बनाती जा रही है, जो निश्चित रूप से भारत जैसे विश्व के बड़े लोकतंत्र के लिए अमंगलकारी होने का स्पष्ट संकेत है  । 

आज तो स्थिति यह हो गई है, कि एक तिहाड़ जाता है तो दूसरा कहता है तू चल मैं आया  ।  राजनीति में भ्रष्टाचार को उभारा जाने लगा है  । जो  सांसद और विधायक  अपने कार्यकाल में जीतनी मर्यादाएं तोड़ता है, जितना काले धन को स्वुस बैंक तक पहुंचाता है वह उतना ही शक्तिशाली और सम्मानित माना जाता है  ।  ऐसे नेता अपने क्षेत्र का अगुआ बनता है  ।  राजनीति में आये इस संक्रमण का सबसे बड़ा कारण है नेताओं के भीतर से भय का समाप्त होना  ।  सरकार के खिलाफ कोई भी सत्याग्रह अथवा आन्दोलन इनके लिए कोई मायने नही रखते  ।  सरकार के भीतर भय समाप्त होने का एक कारण सशक्त जनांदोलनों का अभाव भी है, क्योंकि नेता को सही मायनों में नेता बनाए रखने के लिए जनांदोलन का डंडा आवश्यक होता है वशर्ते बाबा रामदेव जैसे दिशाहीन आन्दोलन न हो  । इसमें कोई संदेह नही कि अन्ना ने सरकार की नकेल कसने का भरपूर प्रयास किया, किन्तु गहराईयों में जाकर झांका जाए तो उनके आन्दोलन में अपार जनसमूह का दिखावा तो जरूर हुआ मगर सफलता के नाम पर वही ढ़ाक के तीन पात  । मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले । 
  
'मूंदहु आँख कछहूँ कछु नाही' वाली मानसिकता में जी रही जनता को हमारी सत्ता मनारेगा जैसी योजनाओं के चक्रव्यूह में फंसाकर खुद घोटालों की जमीन तैयार करने में लगी है । उसे मंहगाई, भूख, अभाव में उलझाकर उसके कीमती वक्त का अतिक्रमण कर रही है ताकि उनके कुकृत्यों की सुध ये भोली-भाली जनता नही ले सके  । अन्ना कह रहे हैं कि आज यदि जनलोकपाल क़ानून लागू होता तो चिदंबरम साहब जेल में होते  । कुछ हदतक सही भी है  । आज इस देश की सबसे बड़ी जरूरत नेताओं के लिए मर्यादाएं बनाने की है  । जरूरत है उनके लिए भी लक्षमण रेखा तय हो,ताकि उन्हें जमीर बेचने की नौबत ही ना आये ।  

10 comments:

  1. हमारे नेताओं का नारा- बेशरम बनो खूब कमाओ॥

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  2. मूंदहु आँख कछहूँ कछु नाही' वाली मानसिकता में जी रही जनता को हमारी सत्ता मनारेगा जैसी योजनाओं के चक्रव्यूह में फंसाकर खुद घोटालों की जमीन तैयार करने में लगी है । उसे मंहगाई, भूख, अभाव में उलझाकर उसके कीमती वक्त का अतिक्रमण कर रही है ताकि उनके कुकृत्यों की सुध ये भोली-भाली जनता नही ले सके । अन्ना कह रहे हैं कि आज यदि जनलोकपाल क़ानून लागू होता तो चिदंबरम साहब जेल में होते ।
    सचमुच दुखद है !

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  3. आज तो स्थिति यह हो गई है, कि एक तिहाड़ जाता है तो दूसरा कहता है तू चल मैं आया ।सचमुच बेशरम होते जा रहे हैं हमारे देश के नेता !

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  4. बहुत बढ़िया लिखा है आज के समय पर !

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  5. विकास के नाम पर केवल छलावा है, विकास उन्हीं का हो रहा है जो विकसित हैं !कागज़ों में आर्थिक शक्ति बन जाने से कुछ नहीं होने वाला !

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  6. "मार्क्सवाद,समाजवाद जैसी चीजें सोशलिस्ट कैपेटेलिज्म, कम्युनिस्ट कैपेटेलिज्म में बदलती जा रही है।"
    मुझे उक्त पंक्ति का अर्थ समझ नहीं आया।

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  7. मार्क्सवाद का अर्थ पूंजीवाद का सर्वनाश नहीं है। अनेक साम्यवादियों में विकृत समझ रही है कि मार्क्सवाद का अर्थ है पूंजीवाद का सर्वनाश। इस प्रसंग में पहली चीज यह कि मार्क्सवाद की इसी समझ के कारण 1917 की सोवियत अक्टूबर क्रांति के गर्भ से पैदा हुए समाजवाद की उपलब्धियों को सुरक्षित रखने में कम्युनिस्ट पार्टियां सफल नहीं रहीं।कार्ल मार्क्स पूंजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

    दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

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  8. दिनेश जी,
    मेरे समझ से आज जो समाजवाद और साम्यवाद का स्वरुप हमारे सामने है वह क्षद्म स्वरुप में परिवर्तित है और उसके बिपरीत जो पूँजीवाद का स्वरुप है उसमें साम्यवाद और समाजवाद की छौंक लगाकर एक नए वाद की ओर हमें अग्रसर होने को वाध्य किया जा रहा है . उसे हम सामाजिक पूँजीवाद और साम्यवादी पूँजीवाद की संज्ञा से नवाज़ सकते हैं. ये दोनों वाद का एक विकृत चेहरा समाज के सामने है ओर यह हमारे समाज के लिए अमंगलकारी होने का स्पष्ट संकेत है.

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  9. 'मूंदहु आँख कछहूँ कछु नाही' वाली मानसिकता में जी रही जनता को हमारी सत्ता मनारेगा जैसी योजनाओं के चक्रव्यूह में फंसाकर खुद घोटालों की जमीन तैयार करने में लगी है । उसे मंहगाई, भूख, अभाव में उलझाकर उसके कीमती वक्त का अतिक्रमण कर रही है ताकि उनके कुकृत्यों की सुध ये भोली-भाली जनता नही ले सके ...
    ..jan jagrukta bhari prastuti ke liye aabhar!

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  10. सचमुच बेशरम होते जा रहे हैं हमारे देश के नेता !

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