शीर्षक पढ़कर चौंक गए होंगे आप ? चौंकिए मत, यह सच्चाई है यह विगत 27 अगस्त को लखनऊ में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन एवं परिकल्पना सम्मान कार्यक्रम की सफलता से चिढ़े दो ऐसे ब्लॉगरों की दास्तान है, जिन्होनें कार्यक्रम के पश्चात उपदेश टनभर दिया, किन्तु ग्रहण कणभर भी नहीं किया । पहले  ब्लॉगर हैं  महेंद्र श्रीवास्तव जी, जिन्होंने  अपने मन की भड़ास निकालने के लिए निर्लज्जता और बेशर्मी की सारी सीमाएं पार गए । जो इनके विरोध में टिप्पणियाँ थी उसे मोडरेशन के नाम पर इन्होने डिलीट कर दिया औए बेनामी टिप्पणियों को प्रकाशित कर निर्लज्जता का परिचय देते रहे। एक उदाहरण देखिये -




  • अगर यह आयोजन आयोजकों के अपने पैसे से हुआ है तो वे बधाई के पात्र हैं......!

    अगर यह आयोजन आयोजकों के अपने पैसे से हुआ है ????????
    best joke of the year 2012
    pata nahi sateesh saxena ko bhola kahun ya .....

    यह टिपण्णी है उपरोक्त पोस्ट लिंक के अंतर्गत प्रकाशित एक बेनामी की। जबकि सभी जानते हैं कि इस तरह की लांछन वाली बेनाम टिप्पणियों की असली जगह बिन ही होती है। यदि ये वास्तव में ब्लॉग जगत में सच्चाई और नैतिकता की दुहाई के लम्बरदार हैं, तो इनमें इतनी समझ होनी चाहिए थी कि बेनाम टिप्पणियों को स्थान ही न देते। लेकिन इन्हें तो स्थान देना ही था, क्योंकि इस तरह की बेनामी टिप्पणी का प्रकाशन करके या तो ये स्वयं ही अपने मन की भडास निकाल गए या फिर अपने किसी साथी को उकसा कर यह कार्य करा गए । और यदि यह टिप्पणी किसी अन्य व्यक्ति की भी थी, तो भी इसके लिए ये ही दोषी हैं, क्योंकि इन्होनें बेनामी टिप्पणी को जानबूझकर डिलीट नहीं किया।
  • मैं इस आयोजन का मुख्य आयोजक रहा हूँ और मेरे मुख्य सहयोगी के रूप में मुझसे जुड़े रहे हैं तस्लीम के महामंत्री डॉ जाकिर अली रजनीश, प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ के अध्यक्ष एडवोकेट रणधीर सिंह सुमन और महासचिव मनोज पाण्डेय। मैंने पहले भी कहा है और आज भी कह रहा हूँ कि इस आयोजन में लगा पूरा पैसा हमने अपनी जेब से खर्च किया है। इस बात की जिसने भी पुष्टि करने की कोशिश की, उसके जबाब में इन्होने बेनामी टिपण्णी का सहारा ले लिया या फिर इन्होनें उसकी टिपण्णी ही मिटा दी।

  • आश्चर्य का विषय है कि अपने मन की भड़ास निकालने के लिए लोग कितने निर्लज्ज और बेशर्म हो जाते हैं।


    जहां तक डॉ रूप चन्द्र शास्त्री जी की बात है, तो उनका मैं बहुत सम्मान करता हूँ। वे अकेले ऐसे ब्लोगर/रचनाकार हैं जिन्हें परिकल्पना समूह ने लगातार दो बार सम्मानित करके गर्व महसूस किया है।संभव है किसी ने इन्हें उकसाया हो, क्योंकि लोगों को अवसर मिल गया तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का।

     सत्यता यह है कि अंतिम सत्र के दौरान बीच में ही 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान ' लोगों को दिये गये ! उस सत्र का संचालन एक ऐसे व्यक्ति कर रहे थे, जो ब्लॉग जगत से परिचित नहीं थे ! सम्मान समारोह के ठीक पहले उन लोगों के नाम अलग कर लिये गये थे, जो वहां पर मौजूद नहीं थे, उसी में त्रुटिवश शास्त्री जी का, नीरज जाट  का और एक अन्य ब्लॉगर के सर्टिफिकेट भी उस लिस्ट मे चले गए थे , जो लोग वहाँ उपस्थित नहीं थे । हालांकि शास्त्री जी सामने की पहली पंक्ति मे बैठे थे , लेकिन जब व्यक्ति इतना बड़ा आयोजन कर रहा हो तो उसका दिमाग तमाम तरह की व्यवस्थाओं में गडड—मड्ड हो ही जाता है । 

     हम लोग अपने घर में चार मेहमान बुला लें, तो उसमें भी तमाम तरह की अव्यवस्थाएं होने लगती हैं। नि:संदेह यह एक त्रुटि थी , जिसके लिए मैंने तत्क्षण मंच से खेद व्यक्त किया था । इसलिए शास्त्री का रूष्ट होना समझ में नहीं आता है। 

     इसके साथ ही साथ उन्होंने अपनी पोस्ट में 'ब्लॉग दशक सम्मान' और 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान' के सार्टिफिकेट लगाकर यह जताने की कोशिश की, मेरा नाम मूल लिस्ट में नहीं था, उसे उसी समय बनाया गया। इस विषय पर मैं इतना ही कहूंगा कि ऐसा भ्रम उन्हें इसलिए हुआ क्योंकि ब्लॉग दशक में एक श्रेणी के सिर्फ 5 सम्मान थे, इसलिए उनको डिजाइन कराते समय सभी में प्राप्तकर्ताओं के नाम सीधे प्रिंट करवा दिये गए थे। 

    पर चूंकि 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान' एक साथ 51 लोगों को दिये जाने थे, इसलिए वे बनवाए ही इस तरह से गये थे कि एक डिजाइन के प्रिंट निकलवा कर सभी लोगों के नाम अलग—अलग भर लिये जाएं। शायद इसीलिए शास्त्री जी को यह भ्रम हुआ कि उनके नाम का सार्टिफिकेट वहीं पर भरा गया। जबकि इस सम्बंध में इस भ्रम का निवारण पाबला जी और कुंवर कुशुमेश जी कर चुके हैं, फिरभी इसे बढा चढा कर प्रस्तुत किया गया, जोकि किसी भी नजिरए से न तो स्वस्थ नजरिया है और न ही नैतिकता, जिसकी इस पूरी पोस्ट में दुहाई दी गयी है।

    इसके साथ ही साथ महेन्द्र जी का यह कहना सर्वथा असत्य है "जिसे आपने वहां सम्मान के लिए बुलाया है और वो आदमी वहां मौजूद है। आप कार्यक्रम के समापन का ऐलान कर देते हैं और उन्हें सम्मान के लिए बुलाते तक नहीं है।" 

     यह बात कहकर उन्होंने  सर्वथा असत्य और मनगढंत बात को प्रचारित करके अपनी नकारात्मक छवि का ही प्रदर्शन किया  हैं, क्योंकि सम्मान समारोह में जिन तीन लोगों के नाम छूट गये थे, उन्हें कार्यक्रम समाप्त होने के आधा घण्टा पहले ही बुला कर सम्मान  पत्र दे दिये गये थे। यह बात हॉल में मौजूद 200 से अधिक ब्लॉगर्स से भी पूछी जा सकती है। 

     इससे भी स्पष्ट होता है कि ये  अपनी भडास निकालने के लिए सर्वथा असत्य  बातों का मिथ्या प्रचार करते हैं और दूसरों का अपमान करने से गुरेज नहीं रखते । इन्हें  ध्यान में रखना चाहिए की इस तरह की बातें 'मानहानि' के दायरे में भी आ सकती हैं। 

     महेन्द्र जी, दूसरों के सम्मान की इतनी चिंता है, पर अपने उस अपमान पर भी ध्यान दीजिए, जो आपने  सिर्फ अपनी खुन्नस निकालने के लिए और दूसरों की नजरों में 'हीरो' बनने के लिए किया हैं। स्वयं तो बेनामी के रूप में एवं पूर्णत: आधारहीन बातों को पब्लिकली कहते  रहे  और उपर से उसके जवाब में आने वाले कमेंटों पर मॉडरेशन लगाए रहे।

     जहां तक शिखा जी के  मंच पर बैठने की बात है, यह किस किताब में लिखा है कि युवा और प्रतिभा सम्पन्न लोगों को सम्मान देना बुजुर्ग लोगों का अपमान ही होता है।  अगर आप ऐसा मानते  हैं, तो जरूरत इस बात की है कि आप अपनी सोच का परिष्कार करिए, फिर दूसरे के मान और सम्मान की बात करिए। जहां तक उम्र की बात है, मेरे विचार में उम्र का विद्वता से कोई सम्बंध नहीं होता। अगर उम्र ही विद्वता का पैमाना होती, तो आज हिमायल के पहाड़ संसार के सबसे आदरणीय और सम्माननीय होते। 

     शिखा जी की आड लेकर आपने न सिर्फ उनकी मेधा का अपमान किया  हैं, वरन शातिराना तरीके से ब्लॉग जगत का माहौल भी खराब किया  हैं। यह कार्य निहायत ही अशोभनीय एवं निंदनीय है।

    इन्होनें अपने पोस्ट में कहा है कि  'मैं इसके तरीके के खिलाफ पहले भी था और आज भी हूं।' 

     अच्छा तो यह तो इन्होनें  बताया ही नहीं कि ये  किस तरह के आयोजन के समर्थन में हैं। क्या इन्होनें  इस तरह का आयोजन कभी किया है, अगर नहीं, तो कहीं देखा, सुना तो होगा, तो उसका पता बता दीजिए! मैं व्यक्तिगत रूप से अपने सहयोगियों के साथ अगला आयोजन करने से पहले उस  आइडियल आयोजन को जाकर देख आऊँगा । और अगर ऐसा कोई आयोजन अभी तक हुआ नहीं है, तो इनकी  सोच वास्तव में कोई दिव्य टाइप के आयोजन को लेकर बनी हुई लगती है! ऐसे में इनसे  विनम्र निवेदन है  कि कृपया उस दिव्य आयोजन को आयोजित करके सम्पूर्ण विश्व के ब्लॉगरों को उपकृत कर दीजिए। यह आपका ब्लॉग जगत पर बहुत बडा एहसान होगा।  

    इन्होने अपने पोस्ट में ये भी कहा है कि  'ये मेरी गलती है कि मैं ज्यादा लोगों को पहचानता नहीं। अगर ऐसा है तो सभी उसमें बराबर के दोषी है।' 

     वाह, क्या बात कही है महेन्द्र जी ने।  मंच पर मौजूद लोगों के बारे में जानते तक नहीं, और सवाल उठाने लगे आयोजकों के मंतव्य पर।  इससे यह स्वयं स्पष्ट हो जाता है कि ब्लॉग जगत के बारे में इनका ज्ञान कितना विशद है। इसके साथ ही साथ इससे यह भी प्रतिध्वनित होता है कि इनकी  मंशा वास्तव में क्या है।

     दरअसल, इनका  काम किसी भी काम के बारे में उंगली उठा कर स्वयं को चर्चा में लाना था और यही काम ये  शुरू से कर रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए ये  आलोचना का पहला नियम ही भूल गये कि जिस चीज की ए बी सी डी नहीं जानते, वहां पर अपना ज्ञान/दर्शन नहीं बघारना चाहिए।  इसी को लेकर अवध प्रांत में एक कहावत भी प्रचलित है: 'बीछी का मंतर न जानै, सांप के बिल मा हाथ घुसेरै।' 

     आशा है ब्लॉग जगत के विद्वत लोग इनकी अंजाने में हुई इस आत्मस्वीकृति से इस पोस्ट के असली मंत्वय तक पहुंच जाएंगे। कुंठा को कितना भी छिपा कर क्यों न रखा जाए, वह कहीं न कहीं से दरक ही जाती है। इनका  यह कमेंट इस बात का गवाह है कि इनकी  मंशा क्या है। 

    अरे, आम का पेड़ लगा या बबूल का, पेड तो है। क्या उपयोगी सिर्फ आम होता है, बबूल नहीं ? मुददे की बात यह नहीं कि पेड आम का है या बबूल का। मुददा यह है कि पेड लगा या नहीं। और ये, इन्होनें  तो सिर्फ लगे हुए पेड को उखाडने का असफल प्रयत्न किया है ।  

     कार्यक्रम हो चुका, इतिहास बन चुका, इनके  या किसी के उसपर थूकने से वह इतिहास नहीं मिट सकता। उस इतिहास को उखाडने से अच्छा है कि ये  उससे बेहतर इतिहास बनाकर दिखाएँ । दूसरे के बबूल के पेड को उखाडने से बेहतर है, बबूल ही सही, एक पेड तो लगाकर दिखाएँ ! 

     महेन्द्र श्रीवास्तव जी का  शास्त्री जी को कही गयी उस बात का जवाब कि सार्टिफिकेट पर जिन लोगों के साइन हैं, वे इस योग्य नहीं हैं ।  अब  अपने बारे में अगर कुछ भी कहूंगा तो यह अपने मुंह मियां मिटठू हो जाएगा, लेकिन सम्मान  पत्र पर मेरे साथ जाकिर भाई के भी हस्ताक्षर थे और उनके बारे में इस तरह के विचार इनकी  अज्ञानता को दर्शाते हैं। शायद इन्हें  नहीं मालूम उन्होंने अभी तक तीन-तीन शोध कार्य किये हैं, उनकी 65 पुस्तकें प्रकाशित हैं, भारत सरकार, उत्तपर प्रदेश सरकार सहित, इंडिया टुडे, सहारा समय, अभिव्यक्ति जैसी संस्था एवं  विभिन्न  प्रतियोगिताओं में उन्हें पुरूस्कृ‍त कर चुकी हैं और बाल कहानी, विज्ञान कथा के साथ-साथ विज्ञान लेखन एवं विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनका नाम मील का पत्थर है। इतनी कम उम्र में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह आश्चर्यचकित करने वाली हैं। उनके नाम पर उंगली उठाना आपकी अज्ञानता और दिबालियेपन  की निशानी है।

     ब्लैक डे के जवाब में: परिकल्पना सम्मान को श्री रवि रतलामी, पूर्णिमा वर्मन जैसी हस्तियों ने स्वीकार कर उसका गौरव बढ़ाया है। इससे यह सम्मा‍न स्वयं सम्मानित हो गया है। ऐसे में इनके  द्वारा इस सम्मान पर उंगली उठाना और इसे ब्लैकक डे कहना स्वयं अपने मुंह पर कालिख पोतने के समान है। क्योंकि ऐसा करके ये  उपरोक्त हस्तियों के ऊपर भी लांछन लगा रहे हैं, जो  निहायत ही निंदनीय है। इसी के साथ जिन लोगों ने इनके  सुर में सुर मिलाया है, मेरे विचार में उन लोगों ने भी इन हस्तियों का अपमान किया है। ऐसे लोग न तो ब्लॉगजगत के  हितैषी हो सकते हैं और न ही सच्चे् ब्लॉगर।

    महेंद्र जी, आपके पोस्ट में शिवम् मिश्र के द्वारा की गयी इस टिपण्णी का मैं समर्थन करता हूँ कि "आपका यह तर्क तर्क कम कुतर्क ज्यादा लगा ... माफ कीजिएगा !"

    अब आईये दूसरे आलोचक ब्लोगर की सच्चाई से अवगत होते  हैं। नाम है पवन मिश्र । जब इनके पोस्ट लिखने के पीछे की सच्चाई मुझे जाकिर भाई से पता चली  तो मुझे बहुत हंसी आई । जाकिर भाई ने बताया  कि इन्होनें एकबार एक कार्यक्रम की पोल खोल चर्चा की थी ।  कानपुर यूनिवर्सिटी मे नकल और उडनदस्ते का पर्दाफाश इन्होनें  कानपुर ब्लोगर असोसिएशन  के थ्रू किया था , इसलिए जांच कमिटी बैठ गयी । उन्होंने  जाकिर भाई से बोला की परिकल्पना वाले कार्यक्रम में मेरी इस बहादुरी के चर्चे करवा दो । जिस पोस्ट की ये चर्चा करवाना चाह रहे थे उसके लिंक हैं :


    http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_16.html
    http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_4956.html
    http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_09.html

    प्रोग्राम के अगले दिन दोपहर में पवन मिश्र  ने जाकिर भाई से फेसबुक पर चैट के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि सम्‍मेलन में इस घटना की चर्चा हुई ? जब जाकिर भाई ने मना कर दिया, तो वो फ़ुरसतिया  और अन्‍य लोगों के बारे में सवाल पूछने लगे। उस समय जाकिर आफिस में थे और किसी जरूरी काम में बिजी थे, इसलिए बातों को टाल गये। इससे पवन मिश्र का  ईगो हर्ट हो गया और अगले ही दिन अपनी भड़ास निकालने के लिए पोस्‍ट लगा दी।

    मैं यहाँ फिर यही बात कहूंगा कि, अपने मन की भड़ास निकालने के लिए निर्लज्जता और बेशर्मी से बाहर निकलकर कुछ सार्थक सोचिये, सार्थक करिए और सार्थक दिशा में आगे बढिए 

    अंत में अविनाश वाचस्पति जी के इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूँ , कि "जब हमाम में झांकने का शौक है तो सब नंगे ही नजर आएंगे, इसमें अजीब सी कोई बात नहीं है।" 

    44 comments:

    1. पूरा घटनाक्रम तो नहीं मालूम पर आपकी यह पोस्‍ट पढकर लग रहा है कि जो कुछ भी हो रहा है गलत है।
      वैसे मेरा मानना है कि किसी भी क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है, जो कुछ नहीं करता उस पर क्‍या कभी बात होती है.....
      आप कर्म करते रहें, भले ही बबूल ही सही, पेड तो लगाया आपने, कम से कम यह किसी को छांव देने का और बाद में कट जाने के बाद किसी को छत देने का तो काम करेगा......

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    2. कार्यक्रम वाकई बहुत अच्छा रहा, मेरे लिए यादगार भी ...आपकी और जाकिर जी की मेहनत दिखाई दे रही थी ...पूरी टीम जिस तरह से आयोजन के कामकाज को संभाल रही थी काबिले तारीफ़ है ...
      बधाई आपको ,जाकिर जी को और आपकी पूरी टीम को ...

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    3. ऐसे कार्यक्रम में हर किसी को खुश नहीं कर सकते सबसे बड़ी बात है आपने ये कार्यक्रम किया और डंके की चोट पर किया प्रशंसनीय कार्य किया सभी को ध्यान में रखते हुए किया जैसा की मैंने अपनी हाल की पोस्ट ""सपना साकार हुआ मेरी पुस्तक का विमोचन" जिसमे मैंने अपनी बुक के विमोचन के विषय में लिखा है उसके शुरू में ही जिक्र किया है की ऐसे आयोजनों में कितनी टेंशन होती है उस वक़्त मैं रविन्द्र प्रभात जी और जाकिर अली रजनीश जी की मनोस्थिति का अंदाजा लगा रही थी,इसका जिक्र किया आपने शायद वो पोस्ट पढ़ी नहीं | ----और हाँ जो बेनामी से कमेन्ट आते हैं उनको बेमानी समझो जिसमे सामने आकर कहने की हिम्मत नहीं है इससे जाहिर होता है की वो अपनी बातों पर पहले ही स्टेंड नहीं करता

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    4. कुछ चीजें होती हैं जिन की उपेक्षा की जानी चाहिए। आप ने फिजूल ही इतनी लंबी पोस्ट लिख दी।

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    5. ऐसे कार्यक्रम में हर किसी को खुश नहीं कर सकते सबसे बड़ी बात है आपने ये कार्यक्रम किया और डंके की चोट पर किया प्रशंसनीय कार्य किया

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    6. दिनेश जी,
      सोचता हूँ कि इन निरर्थक आलोचनाओं पर ध्यान ही न दूँ, किन्तु मानव स्वभाव अनर्गल प्रलाप के खिलाफ बोलने हेतु विबश कर दे तो क्या करूँ ?

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    7. अपनी तो समझ से बाहर है यह सब ......!

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    8. पोस्‍ट नहीं
      यह तो जूता है
      ........
      ब्रांडनेम : न्‍यू मीडिया

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    9. Mahfooz Ali
      18:07 (43 minutes ago)

      to me
      सफलतापूर्वक आयोजन की आपको बहुत बहुत बधाई... आप लोगों की फ़िक्र ना करें.. लोगों का काम ही है उल्टा (सीधा) कहना..

      थैंक्स...

      महफूज़..

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    10. रवीन्द्र जी ने 'पवन मिश्रा' और 'महेंद्र श्रीवास्तव' के बारे मे जो जानकारियाँ दी हैं उनसे मैं शतशः सहमत हूँ क्योंकि मैं खुद उन दोनों के बेहूदा व्यवहार का भुक्तभोगी हूँ। साथ ही मैं यह भी अनुरोध करना चाहूँगा कि म .श्री .के पीछे छिपे हाथ की भी खोज करके उजागर करें।

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    11. कोई पुरस्कार,तारीफ या सम्मान के न मिलने पर कोई व्यक्ति कितना चिढ़ (माफ़ कीजियेगा मैं इस वाक्य का प्रयोग नहीं करना चाहता था फिर भी मुझे करना पड़ा ) या अपमानित होता है ,उसका साफ़ उदहारण ''ये'' ब्लॉगर है । धन्यवाद ।

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    12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    13. rashmi prabha
      19:21 (1 hour ago)

      to me
      मैंने तो इतने भयानक चेहरे देखे कि अंत में लगा कि
      धैर्य से ही बड़ी से बड़ी समस्यायों का निदान मिलता है .... धीरता कम हुई तो अनहोनी काहू विधि ना टरे. परिकल्पना शुरू कीजिये, लोगों के मकसद धरे रह जायेंगे .

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    14. RAVINDRA JI, DAT KAR MUQAABLA KIJIYE,
      CHUP RAHNE SE DUSHMAN HAAVEE HO JATA
      HAI .

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    15. सबके ख़याल एक जैसे नहीं हो सकते.

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    16. Harkirat Haqeer
      21:38 (0 minutes ago)

      to me
      आद. प्रभात जी आपकी भेजी पत्रिका मिली आभार .....!!

      और हाँ अगर आप ईमानदारी से अपना कार्य कर रहे हैं तो ऐसी टिप्पणियों को ध्यान न दें ....:))

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    17. परिकल्पना सम्मान को श्री रवि रतलामी, पूर्णिमा वर्मन जैसी हस्तियों ने स्वीकार कर उसका गौरव बढ़ाया है। इससे यह सम्मा‍न स्वयं सम्मानित हो गया है। ऐसे में इनके द्वारा इस सम्मान पर उंगली उठाना और इसे ब्लैकक डे कहना स्वयं अपने मुंह पर कालिख पोतने के समान है। क्योंकि ऐसा करके ये उपरोक्त हस्तियों के ऊपर भी लांछन लगा रहे हैं, जो निहायत ही निंदनीय है। इसी के साथ जिन लोगों ने इनके सुर में सुर मिलाया है, मेरे विचार में उन लोगों ने भी इन हस्तियों का अपमान किया है। ऐसे लोग न तो ब्लॉगजगत के हितैषी हो सकते हैं और न ही सच्चे् ब्लॉगर।

      सही कहा आपने। लेकिन अक्‍सर विरोध करने वाला व्‍यक्ति अपनी सनक में इतना बह जाता है कि वह यह भी नहीं देख पाता कि विरोध के चक्‍कर में कितना नीचे जा चुका है। यही कारण है कि वह ऐसा करते हुए उन लोगों की भी आलोचना कर बैठता है, स्‍वयं जिनके पैरों की धूल भी नहीं होता।

      उत्तर देंहटाएं
    18. सम्मान पत्र पर मेरे साथ जाकिर भाई के भी हस्ताक्षर थे और उनके बारे में इस तरह के विचार इनकी अज्ञानता को दर्शाते हैं। शायद इन्हें नहीं मालूम उन्होंने अभी तक तीन-तीन शोध कार्य किये हैं, उनकी 65 पुस्तकें प्रकाशित हैं, भारत सरकार, उत्तपर प्रदेश सरकार सहित, इंडिया टुडे, सहारा समय, अभिव्यक्ति जैसी संस्था एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं में उन्हें पुरूस्कृ‍त कर चुकी हैं और बाल कहानी, विज्ञान कथा के साथ-साथ विज्ञान लेखन एवं विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनका नाम मील का पत्थर है। इतनी कम उम्र में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह आश्चर्यचकित करने वाली हैं। उनके नाम पर उंगली उठाना आपकी अज्ञानता और दिबालियेपन की निशानी है।

      इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।

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    19. एक बात और, दूसरों पर कीचड़ उछालने वाले अक्‍सर यह बात भूल जाते हैं कि उसके छीटें उनके ऊपर भी आ सकते हैं। आशा है ऐसा करने वाले लोग भविष्‍य में इस बात का ध्‍यान रखेंगे।

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    20. जिन्हें कभी भी पूरा सच कहने की हिम्मत नहीं रही, वे हमेशा आधा सच से ही काम चला लेते हैं । परिकल्पना सम्मान समारोह के बारे में इनहोने जो कुछ लिखा उसमें कोई भी बात बिलकुल भी मनाने योग्य नहीं हैं ....! ऐसे लोगों को आईना दिखाना जरूरी था, आपकी ओर से वक्तव्य आना चाहिए था और आया भी तो राजफ़ाश के साथ ।
      आपका क्या आपने तो यह कार्यक्रम पहली बार किया नहीं और आपको महेंद्र श्रीवास्तव जैसे आधा सच कहने वालों से कभी पाला नहीं पड़ा होगा । खूब पड़ा होगा । पवन तो अभी बच्चा है जी, उसकी गलतियों को आप माफ कर सकते हैं । आप तो अपने धुन के धनी हैं । यह अभियान निर्वाध गति से चलाएं । मेरी शुभकामनायें आपके साथ है ।

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    21. संभव है ये दोनों अपनी गलतियों से सीख लेंगे। ईश्वर इन्हें सुबुद्धि दे ।

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    22. अविनाश जी ने सही कहा की " जब हमाम में झांकने का शौक है तो सब नंगे ही नजर आएंगे, इसमें अजीब सी कोई बात नहीं है।"

      उत्तर देंहटाएं
    23. अकबर ने बीरबल से कहा -'ऐसा भोज आयोजि‍त करो, सब प्रसन्‍न हो कर ही जाएं'
      भोज हुआ. अच्‍छा रहा. बस खुश थे. पर जाते जाते एक कह ही गया -'अकबर पागल है क्‍या, यूं ही इतना ख़र्चा कर दि‍या, उंह...'
      कि‍स कि‍स को जवाब देंगे.
      /:-)

      उत्तर देंहटाएं

    24. Anita Kumar
      23:36 (15 minutes ago)

      to me
      Ravindra ji
      namaskaar

      aap ke program ke charche khoob padhe...itne badhe lavel par itna achchaa program karne ke liye badhaai....suna hai usmein aap ne sabhi aaye mehmaano ko ek patrika di thi...mujhe is baat ki khabar dene wala toh achaanak is duniya ko hi chod kar chalaa gayaa....kya mein aap se us patrika ki ek copy bhejne ka anurodh kar sakati hun? agar bhijwaa sakein toh badhi kripaa hogi, bhejane ka jo kharch aayegaa woh mein dene ke liye tayyar hun
      dhanywaad

      anita

      उत्तर देंहटाएं
    25. भाई रवीन्द्र जी! मुझे उत्तर-प्रदेश की बारातों की याद आ रही है। लड़की वाले कितनी भी ख़ातिर कर डालें पर बाराती हैं कि नुक्ता-चीनी किये बिना नहीं रहते। आपने बड़ा आयोजन किया....कुछ त्रुटियों का होना स्वाभाविक है.....पर चिट्ठाकारों को भी चाहिये था कि यह पूरा कार्यक्रम था तो उन्हीं का....स्वयं उन्हें भी आगे आकर कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिये था। प्रमाणपत्रों में हस्ताक्षर के लिये यदि डॉक्टर ज़ाकिर अली रजनीश के नाम पर किसी को आपत्ति है तो उचित नहीं प्रतीत होता...ZAR की प्रतिभा और सेवाओं ने उन्हें इस योग्य बना दिया है कि वे प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर कर सकें। और अंत में यही कि यदि आपने अपना काम ईमानदारी से किया है तो विरोध और नुक्ता चीनी से व्यथित हुये बिना आगे बढ़ते रहिये .....चरैवेति..चरैवेति...

      उत्तर देंहटाएं
    26. रवींद्र जी,

      किसी भी लीक से हटकर काम करने पर आलोचना और समालोचना जरूर मिलती है . आयोजन इतना आसान नहीं होता है लेकिन जो कमियां होती हें वे हमें भविष्य के लिए एक सबक होती हें. सम्पूर्ण कोई भी नहीं होता है , इसलिए ऐसी प्रतिक्रियाओं के प्रति निस्पृह रहिये.

      उत्तर देंहटाएं
    27. मेरे विचार से यह सम्‍मेलन ब्‍लॉगिंग का महिमा मण्‍डन करने के लिये किया गया था, न कि ब्‍लॉगरों की अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग अलापने के लिये। अत: यदि कुछ आत्‍म-मुग्‍ध्‍ा ब्‍लॉगर इससे असंतुष्‍ट दिखाई पडते हैं तो इस अनदेखा और अनसुना कर देना चाहिये और सर्मपण के साथ साफ-सुथरी ब्‍लॉगिंग के विकास में लगे रहना चाहिये।

      उत्तर देंहटाएं
    28. परिकल्‍पना का यह प्रयास शुरू से लेकर अंत तक सराहनीय एवं श्रमसाध्‍य रहा है ... जिसके लिए आप एवं आपकी टीम बधाई की पात्र है ...आभार सहित शुभकामनाएं

      उत्तर देंहटाएं
    29. परिकल्‍पना सम्‍मान शुरू से लेकर अंत सराहनीय एवं श्रमसाध्‍य रहा है ... ऐसे कार्यक्रम का सफलता पूर्वक सम्‍पन्‍न होना अपने आप में एक उपलब्धि है ... ऐसी बातों के होने या ना होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता ... यह कार्यक्रम प्रतिवर्ष अपनी क़ामयाबी के चरम पर रहे यही शुभकामनाएं
      हैं ...
      सादर

      उत्तर देंहटाएं
    30. साहब लोगों की पोस्ट्स जिनका आपके ज़िक्र किया है केवल उनके मानसिक दिवालियेपन को दर्शाती हैं।

      इस आयोजन से हमें बहुत से लोगों का अवसर मिला उसके लिए आप,ज़ाकिर सर एवं सुमन सर धन्यवाद के पात्र हैं।

      सादर

      उत्तर देंहटाएं
    31. Krishna Kr. Yadav
      17:32 (3 minutes ago)

      to me
      रवीन्द्र प्रभात जी,

      पिछले दिनों संपन्न परिकल्पना सम्मान के आयोजन पर कुछेक लोगों द्वारा उठ रही बातों पर क्या कहें.बस
      बड़े-बुजुर्गों की कही एक बात याद आ रही है-'' पत्थर भी उन्हीं पेड़ों पर फेंके जाते हैं, जिन पर फल लदे होते हैं. ठूंठ पेड़ों पर कोई पत्थर नहीं फेंकता.''..जो बड़ी लकीर नहीं खींच सकते, वे दूसरों की बने लकीर को ही मिटा-मिटा कर छोटा करना चाहते हैं और एक दिन खुद ही मिट जाते हैं..ऐसे लोगों को अनावश्यक तवज्जो देने का कोई मतलब नहीं..आप अपनी राह चलें..फैसला तो वक़्त करेगा !!

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    32. ये दोनों सचमुच निर्लज्ज हैं । कसं खा चुके हैं की कभी नहीं सुधरेंगे । आप अपना काम करते जाइए ....इन्हें गंदगी फैलाने दीजिये । धीरे-धीरे ये पूरी तरह गंदे हो जाएँगे ।

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    33. यह पोस्ट भी तो बौखलाहट को सिद्ध करती है....उसी का प्रभाव है यह वक्तव्य...

      "मेरे विचार में उम्र का विद्वता से कोई सम्बंध नहीं होता। अगर उम्र ही विद्वता का पैमाना होती, तो आज हिमायल के पहाड़ संसार के सबसे आदरणीय और सम्माननीय होते।"

      ---मूर्खतापूर्ण कथन है..पोस्ट लेखक क्या हिमालय पहाड़ को सबसे उम्र दराज समझता है या सबसे अनादरणीय व असम्माननीय ..
      --निश्चय ही हिमालय संसार का सबसे आदरणीय व सम्माननीय पहाड़ है और युवा पहाड़ भी है...
      ---एक मज़दूर व विद्वान के सम्बन्ध में उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता.. परन्तु जब दो विद्वानों की बात होती है तो उम्र व अनुभव का विद्वता से सम्बन्ध है...
      --- कमेन्ट लिखने वालों को भी सोचना चाहिए कि जो आयोजन कर रहा है ( तथाकथित अपनी जेब के पैसे से) तो क्या मूर्ख है जो सर्टीफिकेट पर अपने को छोडकर किसी अन्य के हस्ताक्षर कराएगा...चेरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम ...

      ---वैसे कुछ शोध कर लेने से ( सब जानते हैं शोध कैसे होते हैं.??) या पैसे खर्च करके आयोजन कर लेने से कोई विद्वान नहीं होजाता...

      ----फिर भाई लोग सम्मान चाहे कोई भी दे सम्मान तो सम्मान है,उसका सम्मान करना चाहिए.. कुछ दे ही रहा है ..छीन तो नहीं रहा...

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    34. कल 15/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
      धन्यवाद!

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    35. Rama Dwivedi
      21:39 (12 hours ago)

      to me
      आदरणीय रवींद्र जी ,
      सादर नमन !
      आपका आयोजन बहुत सफल रहा इसके लिए आप और रजनीश जी बधाई के हक़दार हैं ...आपने मुझे भी विशेष अतिथि के रूप में मंच पर बिठाया इसके मै दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ |
      ...रमा द्विवेदी

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    36. पिछली टिप्पणी मे तारीख की गलत सूचना देने के लिये खेद है
      ----------------------------
      कल 16/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
      धन्यवाद!

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    37. रविंद्र भाई ,
      इस समारोह के बाद जैसी आशंका थी ठीक उसी तरह की पोस्टें निकल कर आईं और ये भी बताता चलूं कि भविष्य में हर सकारात्मक प्रयास को इस तरह की पोस्टों और विचारों से सामना करना ही होगा । द्विवेदी जी की बात से मैं भी सहमत हूं लेकिन ये भी जानता हूं कि जब घर फ़ूंक के कोई तमाशा देखता और फ़िर भी तमाशबीनों को ये कहते सुनता है कि मज़ा नहीं आया तो यही दुख क्रोध और फ़िर क्षुब्धता में बदल जाता है ।

      ये शब्दों और विचारों की दुनिया है , हमारा आपका कोई वज़ूद नहीं है इसलिए समय साक्षी रहा है और रहेगा , वो खुद तय कर देगा क्या उचित अनुचित है । मैं हमेशा ही ऐसे प्रयासों के पक्ष में रहा हूं और दृढता से रहा हूं । अच्छा है इस बहाने बहुत सी सूरतें सीरतें खुल कर देखने को मिलती हैं । आप निश्चिंत रहें हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं

      उत्तर देंहटाएं
    38. माननीय रविन्द्र जी,

      जब भी कोई कुछ अच्छा करता है तो कुछ लोग उसके विरोध में और निंदा में जरूर खड़े हो जाते हैं | यह बात हर कार्यक्रम - फिर चाहे निजी आयोजन हो या सामाजिक - लागू होती है | आप किसी की परवाह न करें और अपना यह अच्छा कार्य जारी रखें | इस बार चूँकि परिकल्पना सम्मान कार्यक्रम लखनऊ में था इस लिए उपस्थित न हो सका | पिछले साल जब दिल्ली में कार्यक्रम हुआ था तब मैं वहाँ था | उस बार भी कुछ लोगों ने गलत टिका-टिप्पणी की थी |

      जब हम सड़क पर चलते हैं तो अपनी गली के कुत्ते भी भौंकते हैं और कई तो झपट कर डराने की कोशिश भी करते हैं, पर क्या हम चलाना बंद कर देते हैं? नहीं न | हम भी घुडक कर चल देते हैं | कुछ देर में वे कुत्ते पीछे रह जाते हैं |

      आप ने अथक प्रयास से कार्यक्रम का आयोजन किया | मैं आपके प्रयास को देख कर आश्चर्य चकित रह जाता हूँ | इतने बड़े स्तर पर आयोजन करना कोई बच्चों का या हंसी खेल नहीं हैं | आपका हार्दिक साधुवाद और धन्यवाद |

      मैं तो बस इतना जानता हूँ कि आज ब्लोगिंग कर रहा हूँ तो बस आपके और माननीया रश्मि प्रभा जी के प्रोत्साहन से |

      आप अपना कार्य जारी रखें |

      शुभकामनाओं के साथ

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    39. आदरणीय रवीन्द्र जी अच्छाइयों और सुधार की प्रक्रिया का विरोध तो होता ही आया है अपनी हिंदी विश्व पटल पर छाये आइये कोशिश जारी रखें शास्त्री जी सम्माननीय हैं और अच्छे व्यक्तित्व के धनी हैं ग़लतफ़हमी में हो जाता है कभी कभी ऐसा ...
      अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है ...आइये गाते मुस्कुराते बढे चलें
      भ्रमर ५

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    40. आदरणीय रवीन्द्र जी अच्छाइयों और सुधार की प्रक्रिया का विरोध तो होता ही आया है अपनी हिंदी विश्व पटल पर छाये आइये कोशिश जारी रखें शास्त्री जी सम्माननीय हैं और अच्छे व्यक्तित्व के धनी हैं ग़लतफ़हमी में हो जाता है कभी कभी ऐसा ...
      अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है ...आइये गाते मुस्कुराते बढे चलें
      भ्रमर ५

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