समय का एक अंश मैं - रश्मि प्रभा , रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना पर पारम्परिक उत्सव की दुर्लभ छवियों के साथ उपस्थित हूँ ... तिल रखने की जगह नहीं, जैसे जैसे जहाँ तक संभव है मैं परिचय सूत्र जोडती हूँ . आसमान इन्द्रधनुषी रंगों से सजा है - देवता आशीर्वचन लिए पुष्प वर्षा कर रहे . ऋषि मुनिगण पवित्र तीर्थस्थलों के जल से आगंतुकों का अभिषेक कर रहे . धरती आसमान एक प्रतीत हो रहे - अद्भुत दृश्य है क्षितिज का . सारे भ्रम को परे कर सब एक जगह उल्लसित भाव लिए अपने भावों से उत्सव को यादगार बनाने की आंतरिक अभिलाषा लिए एकत्रित हैं ... 

कन्हैयालाल नंदन 

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए ...

कविता वाचक्नवी

प्रश्न गाँव औ' शहरों के तो 
हम पीछे सुलझा ही लेंगे 
तुम पहले कंधों पर सूरज 
लादे होने का भ्रम छोड़ो 

अनामिका किशोर 

सभागार की 
ये पुरानी दरी 
गालिब के 
किसी शेर के साथ 
बुनी गई होगी - 
कम से कम 
दो शताब्दी पहले ...

अज्ञेय 

वसन्त आया तो है
पर बहुत दबे-पाँव
यहाँ शहर में
हम ने उस की पहचान खो दी है
उसने हमें चौंकाया नहीं ...

जयशंकर प्रसाद 

बीती विभावरी जाग री !
          अम्बर पनघट में डुबो रही-
          तारा-घट ऊषा नागरी ।

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
          लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
          मधु मुकुल नवल रस गागरी


अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जो बहुत बनते हैं उनके पास से,
चाह होती है कि कैसे टलें।
जो मिलें जी खोलकर उनके यहाँ
चाहता है कि सर के बल चलें

अशोक चक्रधर
ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,
ग़म हैं हंसी के अंदर, परदे हटा के देखो ...


दीप्ति नवल 

अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक ...

गौतम राजरिशी

खुद से ही बाजी लगी है
हाय कैसी जिंदगी है ...

आरसी प्रसाद सिंह 

मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया ...

निशांत मिश्रा 

नहीं रखना चाहता याद,
अपने अतीत और गुजरे कल को,
पुन: तलाश करना चाहता हूँ,
वर्तमान मे
अपनी पहचान बनाने के लिए,
एक नाम की ...


इस्मत ज़ैदी

जब तुम ही नहीं हो तो ज़माने से मुझे क्या
ठहरे हुए जज़्बात में जाँ है भी नहीं भी ...

ओम निश्चल

मेघ का, मल्हार का
मौसम ठहर जाए,
कुछ करो-
यह प्यार का मौसम ठहर जाए ...

शमशेर बहादुर सिंह

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका ग़म क्या?
वह नहीं है ।
किससे लड़ना ?




पंकज सुबीर

टेक चुके हैं सब अपने घुटनों को
उठा हुआ नहीं आता नज़र
अब कोई भी सिर
रेहन रख दी गईं हैं 
लगभग सारी की सारी हड्डियां रीढ़ की 
और इसीलिये चल रहा है 
सब कुछ ठीक ठाक 


रघुवीर सहाय

जब किसी समाज में बार-बार कहकहे लगते हों
तो ध्यान से सुनना कि उनकी हँसी कहाँ ख़त्म होती है
उनकी हँसी के आख़िरी अंश में सारा रहस्य है




रंजना भाटिया

छुआ है अंतर्मन की गहराई से
कभी तुम्हारी गरम हथेली को
और महसूस किया है तब
बर्फ सा जमा मन
धीरे धीरे पिघल कर
एक कविता बनने लगता है

शशि पाधा

टूटे न विश्वास कोई
घेरे न अवसाद कोई
बाँधे न विराग कोई
गीत गा - 
राग भरा कोई गीत गा 


रचना श्रीवास्तव 
संघर्ष के चने चबाते 
दाँत कब 
असली से नकली हो गए 
पता न चला 

अब थोड़ी चाय कॉफ़ी हो जाये ....
फिर मिलवाती हूँ आपको जानी मानी हस्तियों से 
एक छोटे से मध्यांतर के बाद - 



मगर आप कहीं मत जाईएगा , क्योंकि -
चाय कॉफ़ी के साथ परिकल्पना ब्लोगोत्सव के मंच पर 
अरविंद श्रीवास्तव आपकी मुलाक़ात कराने जा रहे हैं 
हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कमल जी से  
बस एक किलिक की दूरी पर ........यहाँ किलिक करें 

34 comments:

  1. उत्‍सव की बेला ... और इतने सारे चेहरे कितना कुछ कहते हुए ..बहुत खूब ... बधाई आप सभी को इस प्रारंभ की ... !!!

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  2. बहुत खूबसूरत आयाम दे रही हैं आप परिकल्पना को

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  3. बहुत ही सुन्दर सफल आगाज एक से बढ़कर एक रचनायें पढने को मिली हैं, बधाई स्वीकारें

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  4. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति. निश्चिंत रूप से ये ब्लोगोत्सव आनंददायक है . आप सभी बधाई के पात्र है . मेरी शुभकामनाये .और आभार .

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  5. हमेशा की तरह ही ब्‍लोगोत्‍सव की खूबसूरत शुरूआत ..
    सफलतापूर्वक समापन के लिए अग्रिम शुभकामनाएं !!

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  6. बहुत खूब ! इतने खूबसूरत आगाज़ पर ढेरों बधाइयाँ ! और आने वाले पलों के लिए.. हार्दिक शुभकामनाएँ !:-)
    ~सादर !!!

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  7. बहुत अच्छा लगा इस उत्सव के आगाज के इन्द्रधनुषों का लुत्फ़ उठाना बहुत बढ़िया आप सभी को बधाई

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  8. आपके चयन एवं प्रस्‍तुति पर .....
    काश ! आप देख पाती फटे नैन खुले मुख ............. !!

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  9. इन्द्रधनुषी रंग सज गए परिकल्पना के आकाश पर...शानदार आगाज़...सफ़र जारी रहे...शुभकामनाएँ !!

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  10. आपके चयन को नमन.... बहुत सुन्दर...

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  11. स्वागतम शुभ स्वागतम ...
    अथ स्वागतम शुभस्वागतम ......
    आनंदमंगल मंगलम .....
    नित प्रियम भारत भारतम ....स्वागतम शुभ स्वागतम ....

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  12. जैसी कि मुझे उम्मीद थी , या शायद हर किसी को उससे भी सुन्दर आगाज |

    सादर

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  13. badhai , rashmi ji , behatarin moti , mujhe bahut anand aaya sabse mil kar inme se kai sunahe moti wah hai jinki mai fan hoon , maine bachpan se unhe padha hai :) unse milna aur padhna ...........ananddayak . best post i never seen. all the dimond are precious :)

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  14. सचमुच गरिमा से परिपूर्ण परिकल्पना का यह तीसरा कदम ।

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  15. .शानदार आगाज़....शुभकामनाएँ !!

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  16. डॉ रमा द्विवेदी

    बहुर ख़ूबसूरत आगाज ...अनंत शुभकामनाएँ .....

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  17. उत्सव की महकी महकी खुशबू बिखेर दी है आपने इतना सुन्दर गुलदस्ता बनाकर ।
    शुभकामनाये ।

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  18. उत्सव की महकी महकी खुशबू बिखेर दी है आपने इतना सुन्दर गुलदस्ता बनाकर ।
    शुभकामनाये ।

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  19. बहुत खूबशूरत सफल आगाज,,,बधाई रश्मी जी,,

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  20. सही ब्लेंड है नए पुराने जाने- माने और अब माने जाने वाले साहित्यकारों का .
    उत्फुल्ल कर देने वाला आगाज़ !

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  21. बहुत सुंदर सोच, बढिया प्रयास।

    अच्छी फसल के लिए अच्छे बीज की आवश्यकता होती है। रश्मि दी ने ये जिम्मेदारी संभाली है, जाहिर है ये उत्सव कामयाबी की शिखर पर पहुंचेगा।
    मेरी शुभकामनाएं..

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  22. परिकल्पना उत्सव के इन्द्रधनुषी आकाश पर अपना नाम देख कर चकित रह गई |" वसुधैव कुटुम्बकम " की भावना वाले वटवृक्ष की छांह में कई कल्पनाएँ साँसें लेंगी | धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ |

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