उत्सव का पहला दिन.......
आगे  बढ़ते हुये समापन करें 
उससे पहले आइए हम आपको लिए चलते हैं 
रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना के उस रंगमंच पर 
जहां वर्तमान के स्वर में 
अतीत के पन्ने मुखर होते नज़र आएंगे ,
और आप भी -
एक क्लिक के साथ झूमते हुये नृत्य मे निमग्न हो जाएँगे 
भारतीय पॉप के साथ गाते हुये .......
ॐ शांति ॐ .....

हम चाहें न चाहें वे किसी न किसी भाव में अपनी पहचान बता जाते हैं .
युगों की बात जब होती है तो सतयुग से आरम्भ होता है , वेद , उपनिषद का उल्लेख होता है , महाग्रंथों की चर्चा होती है .... तो जब साहित्य की बात होती है तो स्वतः तुलसीदास को
हम गुनगुनाने लगते हैं -
भज मन रामचरन सुखदाई॥
जिहि चरननसे निकसी सुरसरि संकर जटा समाई।
जटासंकरी नाम परयो है, त्रिभुवन तारन आई॥
जिन चरननकी चरनपादुका भरत रह्यो लव लाई।
सोइ चरन केवट धोइ लीने तब हरि नाव चलाई॥
सोइ चरन संत जन सेवत सदा रहत सुखदाई।
सोइ चरन गौतमऋषि-नारी परसि परमपद पाई॥
दंडकबन प्रभु पावन कीन्हो ऋषियन त्रास मिटाई।
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनक मृगा सँग धाई॥
कपि सुग्रीव बंधु भय-ब्याकुल तिन जय छत्र फिराई।
रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर परसत लंका पाई॥
सिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक सेष सहस मुख गाई।
तुलसीदास मारुत-सुतकी प्रभु निज मुख करत बड़ाई॥

..... भावों में डूबता मन कभी राममय कभी कृष्णमय होता जाता है और रसखान की चाह से नाता जोड़ता है ,

मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
माहिनि तानन सों रसखान, अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।
ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।
और सो रंग रह्यो न रह्यो, इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।

..... कभी गोपी बना मन सूरदास की भावनाओं में आलोड़ित हो ऊधो से कहता है ,

उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥ "

...... अमीर खुसरो के शब्द तरंगित होते हैं -

तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी ।
सब सखियन में चुनर मेरी मैली,
देख हसें नर नारी, निजाम...
अबके बहार चुनर मोरी रंग दे,
पिया रखले लाज हमारी, निजाम....
सदका बाबा गंज शकर का,
रख ले लाज हमारी, निजाम...
कुतब, फरीद मिल आए बराती,
खुसरो राजदुलारी, निजाम...
कौउ सास कोउ ननद से झगड़े,
हमको आस तिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम

... जयशंकर प्रसाद , रामधारी सिंह दिनकर , सुमित्रानंदन पन्त , महादेवी वर्मा , माखनलाल चतुर्वेदी , हरिवंश राय बच्चन , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना .......... अनगिनत नाम , अनेक पदचिन्ह - किसको भूलूँ किसे याद करूँ सी स्थिति होती है . ऐसे में सर्वेश्वर दयाल की ये पंक्तियाँ अपनी लगती हैं -
जड़ें कितनी गहरीं हैं
आँकोगे कैसे ?
फूल से ?
फल से?
छाया से?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है,
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।

जलहीन,सूखी,पथरीली,
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।................


.... कहानीकार , उपन्यासकार , कवि ....... वटवृक्ष से खड़े हैं , जिसकी भावनाओं की छत्रछाया में कई देवदार खड़े हैं , तो आइये आज के इस कार्यक्रम का समापन करते हैं ....
कल रविवार है यानि अवकाश का दिन इसलिए आप सबसे सोमवार की सुबह 10 बजे परिकल्पना के मंच पर मिलने के वादे के साथ  जाने की अनुमति लेती हूँ .............शुभ विदा ! 

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति , स्कूल के दिनों में इन सबको पढ़ा था |

    सूरदास का भ्रमर गीत आज भी मेरा सबसे पसंदीदा श्रृंगार रस का काव्य है |

    बहुत बहुत धन्यवाद |

    सादर

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  2. परिकल्पना के इस मंच पर कालजयी कवियों के साथ नवांकुरों की उपस्थिती अपने आप मे गरिमामय है । रश्मि जी आपने प्रभात की परिकल्पना को साकार रूप दे दिया ......आपका अवदान प्रशंसनीय है ।

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  3. जितनी भी प्रशंसा की जाये कम होगी, बधाइयाँ !

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  4. अनुपम,अद्वितीय और अतुलनीय प्रस्तुति ।

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  5. भूली-बिसरी चीजें फिर से ताजा हो गईं...
    बहुत बढ़िया...

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  6. बहुत मनमोहक एवं स्वागत योग्य प्रस्तुति !

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